पूर्व सीएम हरीश रावत ने बयान से खेली चाल, यूसीसी के जरिये बीजेपी में असंतुष्टों को ऐसे चिढ़ाया

उत्तराखंड यूनिफाॅर्म सिविल कोड बिल विधानसभा से पारित हो गया है। जो कि कुछ समय बाद संवैधानिक अनुमति के बाद लागू हो जाएगा। ऐसे में यूसीसी को लेकर अब सियासत भी शुरू हो गई है। भाजपा इसे महिलाओं के पक्ष में बताकर जनता के बीच में जाने की तैयारी में है। वहीं कांग्रेस इसे भाजपा का चुनाव से पहले दूसरे मुद्दों से भटकाने का काम बता रही है।

Harish rawat: Former CM said a big thing change of leadership through Uniform Civil Code, know the political meaning

इस बीच पूर्व सीएम और कांग्रेस नेता हरीश रावत का कहना है कि यूसीसी को लेकर भाजपा का लक्ष्य है राज्य में उपलब्ध विहीन सरकार को लोकसभा चुनाव में जनता के बीच जाने और अपनी पीठ ठोकने का एक मुद्दा मिल गया है। हरदा ने यूसीसी के बहाने भाजपा में असंतोष को हवा देेने वालों पर भी तंज कसा है।

हरदा ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए लिखा कि अब धामी उत्तराखंड भाजपा के एक क्षत्र नेता के रूप में स्थापित हो गये हैं। अब उम्मीद की जा सकती है कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की आशा लगाए हुये लोग अब खट्टे अंगूर कहकर यूसीसी का ढोल पीटने में लग जाएंगे। कहा कि उत्तराखंड को क्या मिला, क्या इस विधेयक के पारित होने से लड़के.लड़कियों के सामने जो बेरोजगारी का प्रश्न है उसका कुछ समाधान निकलेगा। निरंतर बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार क्या नियंत्रित होगा। क्या आटा, दाल, चीनी, सब्जी कुछ सस्ती होंगी। महिलाओं और दलित वर्ग पर हो रहे अत्याचार क्या रूकेंगे।

हरीश रावत मानते हैं कि यूसीसी से दूसरे मुददे अब गौण हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड विधानसभा और विपक्ष के पास लोकसभा चुनाव से पहले एक सशक्त अवसर था, जब अंकिता हत्याकांड में अंकिता की माता द्वारा इंगित वीआईपी को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने का और महिला अत्याचार, राज्य की कानून व्यवस्था के परिपेक्ष में सवाल खड़े करने का, उद्यान और कृषि विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर हाईकोर्ट द्वारा सीबीआई के जांच के आदेश दिए जाने तथा खनन को लेकर सरकार पर सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट की तर्कपूर्ण टिप्पणी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में आ रही निरन्तर गिरावट आदि कई मुद्दे थे।

उन्होंने कहा कि सरकार ने बड़ी कुशलता से जनता के इन मुद्दों को कॉमन सिविल कोड की आड़ में ओझल कर दिया गया है। हरदा ने आशंका जताई कि इस विधेयक के जल्दी बाजी में पारण से हमारी पारिवारिक व्यवस्था में जो प्रेम और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित होती है उसमें तनाव बढ़ेंगे। पहले से छोटी हो रही खेती की जोतें और छोटी होंगी, मायके की संपत्ति पर लड़की को अधिकार जताने के लिए ससुराल में बहू के ऊपर दबाव बढ़ेंगे।

कहा किलड़के, लड़कियों सहित राज्य के नागरिकों को जो बाहर रह रहे हैं कानून के दोहरेपन का सामना करना पड़ेगा। हमारे राज्य की 13.14 प्रतिशत हिस्से को यह शिकायत करने का अवसर मिलेगा कि हमसे पूछा ही नहीं गया। हमारे वैत्यिक कानूनों में हस्तक्षेप कर दिया गया। उनमें बदलाव लाया गया। जब चुनाव का शोर थम जायेगा तो आप पायेंगे कि आप और उत्तराखंड इस बिल के पारण के बाद एक कदम पीछे हुआ है।

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