देवस्थानम बोर्ड: भाजपा सरकार के दो मुख्यमंत्री, एक बन गए 'विलेन', दूसरे 'हीरो', जानिए कैसे
देवस्थानम बोर्ड: भाजपा सरकार के दो मुख्यमंत्री, एक बन गए 'विलेन', दूसरे 'हीरो',
देहरादून, 1 दिसंबर। उत्तराखंड में पहले भाजपा सरकार ने चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम पास करवाया और अब चुनाव से पहले अधिनियम को वापस ले लिया। साफ है कि अधिनियम से चुनाव में होने वाले नफा नुकसान को भाजपा अब समझ चुकी है। लेकिन अधिनियम से भाजपा सरकार के दो मुख्यमंत्रियों की छवि पर असर पड़ा है। पहले पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जिन्होंने अधिनियम पास करवाया, वो तीर्थ पुरोहित और पंडा समाज के बीच विलेन बन गए जबकि पुष्कर सिंह धामी जिन्होंने देवस्थानम बोर्ड को भंग करने का ऐलान किया, वो उन्हीं तीर्थ पुरोहितों की नजर में हीरो बन गए हैं।

प्रचंड बहुमत में लिया गया फैसला
उत्तराखंड में 2017 में प्रचंड बहुमत से भाजपा की सरकार बनी। हाईकमान ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम की कुर्सी सौंप दी। त्रिवेंद्र रावत ने प्रचंड बहुमत की सरकार में बड़े फैसले लिए। इसमें से एक था देवस्थानम बोर्ड। जो कि 20 साल में अब तक का सबसे बड़ा कदम बताया गया। लेकिन पंडा समाज इस कदम से सरकार के खिलाफ हो गए। तीर्थ पुरोहितों की अगुवाई में संत, समाज और स्थानीय लोग भी सरकार के खिलाफ विरोध में उतर आए। राज्य सरकार बिना तीर्थ पुरोहितों से संवाद किए ही बोर्ड को थोपने की कोशिश करने लगी। इस बीच कोविड संक्रमण से सरकार का ध्यान पूरा हेल्थ सिस्टम पर पड़ गया और देवस्थानम को लेकर सरकार का विजन कहीं नजर नहीं आने लगा। फिर चार धाम यात्रा भी प्रभावित हुई।

5 दिन में सीएम से लेकर सरकार दिखी एक्टिव
अब जैसे ही चुनाव नजदीक आया तो भाजपा ने अपने युवा चेहरे पुष्कर सिंह धामी को प्रदेश की सत्ता सौंप दी। जुलाई में सीएम बनते ही धामी ने देवस्थानम पर तीर्थ पुरोहितों की राय लेने और संवाद से फैसला लेने की बात कही। इसके बाद धामी ने एक हाइपावर कमेटी बना दी। कमेटी ने 2 माह तक रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंप दिया। इस बीच पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत का केदारनाथ में भारी विरोध हुआ। त्रिवेंद्र केदारनाथ के दर्शन तक नहीं कर पाए। सरकार को एहसास हो गया कि अब तीर्थ पुरोहितों को समझाना मुश्किल है। रिपोर्ट मिलते ही सीएम ने मंत्रीमंडल की उप समिति बनाकर रिपोर्ट का अध्ययन करने को कहा। समिति ने एक ही दिन में बोर्ड को भंग करने की सिफारिश कर दी। जिसके बाद सीएम को आधार मिल गया और देवस्थानम बोर्ड भंग हो गया। यह सब इतना तेजी से हुआ कि सरकार ने 5 दिन में बोर्ड को भंग करना उचित समझा।

तीर्थ पुरोहित और संतों ने पहनाया जीत का सेहरा
तीर्थ पुरोहितों ने राज्य सरकार का स्वागत करना शुूरू कर दिया। युवा सीएम को यशस्वी सीएम का आशीर्वाद मिल गया। इस तरह धामी पंडा समाज के बीच हीरो बन गए। इतना ही नहीं पूरे मुद्दे को हिंदुत्व का मुद्दा बनाते हुए संत समाज भी सीएम धामी को जीत का सेहरा पहनाने पहुंच गए। धामी के इस फैसले को पीएम मोदी के कृषि कानून बिल से जोड़ा जाने लगा। जिससे धामी को भी एक ठोस और बड़ा कदम लेने का साहस लेने वाले सीएम की उपाधि मिल गई। इस पूरे प्रकरण में भाजपा की पहले किरकिरी हुई, त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रचंड बहुमत का सहारा लेकर देवस्थानम बोर्ड को सही ठहराने की पूरी कोशिश की लेकिन धामी को इस बात का एहसास हो गया था कि अगर सत्ता में दोबारा आना है तो देवस्थानम को सुलझाना होगा, नहीं तो चुनाव में इसका नुकसान होगा। हालांकि ये बात अलग है कि सरकार अपने उस दावे को भूल गई जिसमें देवस्थानम को लाने से होने वाले फायदों को बताया जा रहा था। एक साल पहले जो देवस्थानम का मुद्दा तीर्थ पुरोहितों के हक में था, वो एक साल बाद कैसे तीर्थ पुरोहितों के गलत साबित हुआ। ये समझाने में भाजपा असफल हुई, जिस कारण भाजपा के दो मुख्यमंत्री अपने-अपने फैसले से एक दूसरे के विपरीत छवि बना चुके हैं।
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