Dehradun news: ऐतिहासिक झंडे जी मेला, जिनके नाम से प्रसिद्ध हुआ देहरादून, खास है इतिहास

झंडा मेला होली के पांचवें दिन देहरादून स्थित दरबार साहिब में झंडेजी के आरोहण के साथ शुरू होता है। श्री गुरु राम राय ने वर्ष 1676 में दून में डेरा डाला था। दून का नाम पहले डेरादून और फिर बाद में देहरादून पड़ा।

Dehradun Historical Jhande Ji Mela history flag hoisting March 12 birthday of Sikh Guru Ram Rai

देहरादून में झंडे जी मेले की तैयारियां जोरशोर से शुरु हो गई हैं। 12 मार्च को झण्डे जी आरोहण के साथ ही इस साल के लिए झण्डे जी मेले का शुभारंभ हो जाएगा। झंडा मेला प्रतिवर्ष होली के 5वें दिन बाद आयोजित होता है। जो कि सिक्ख गुरू रामराय के जन्म दिवस से शुरू होकर 15 दिनों तक चलता है। इसी दिन गुरूराम राय देहरादून आए थे। जो कि 1676 में देहरादून आए थे।​

अराईयांवाला, हरियाणा झण्डे जी का आरोहण किया गया

अराईयांवाला, हरियाणा झण्डे जी का आरोहण किया गया

दरबार साहिब में झंडा साहिब की विशेष पूजा अर्चना व अरदास के साथ इस साल की प्रक्रिया शुरू हो गई है। दरबार साहिब, देहरादून के सज्जादानशीन महंत देवेन्द्र दास महाराज के नेतृत्व में एक दल अराईयांवाला, हरियाणा के लिए रवाना हुआ, वहां पर झण्डे जी का आरोहण किया गया। दरबार साहिब से सौ सदस्यीय जत्था अराईंयावाला, हरियाणा के लिए रवाना हुआ। जत्था अराईयांवाला पहुंचा, जहां पूरे श्रद्धाभाव से पुराने झंडे जी को उतारा गया। दूध, दही, घी, मक्खन, गंगा जल और पंचगब्यों के साथ झण्डे जी को स्नान कराया गया। हज़ारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में 60 फीट ऊंचे झण्डे जी का आरोहण किया गया। इस अवसर पर संगतों को प्रसाद एवम् लंगर वितरित किया गया।

5 मार्च की शाम को पैदल संगत दरबार साहिब में पहुंचेगी

5 मार्च की शाम को पैदल संगत दरबार साहिब में पहुंचेगी

इससे पूर्व परंपरा के तहत 1 मार्च को दरबार साहिब केे पुजारी,दरबार साहिब देहरादून के सज्जादानशीन महंत देवेन्द्र दास महाराज का हुक्मनामा लेकर बड़ा गांव हरियाणा रवाना हुए थे। इसके बाद ही पैदल संगत देहरादून की ओर बढ़ना शुरू करती हैं। 4 मार्च को पैदल संगत का स्वागत श्री गुरु राम राय इंटर कॉलेज, सहसपुर में किया जाएगा। 5 मार्च को पैदल संगत देहरादून में प्रवेश करेगी। श्री दरबार साहिब प्रबन्धन व झण्डा जी मेला आयोजन समिति की ओर से कांवली गांव में संगत का जोरदार स्वागत किया जाएगा। 5 मार्च की शाम को पैदल संगत दरबार साहिब में पहुंचेगी। दरबार साहिब के सज्जादानशीन महंत देवेन्द्र दास महाराज की अगुआई में दरबार साहिब प्रबन्धन द्वारा पैदल संगत का भव्य स्वागत दर्शनी गेट पर किया जाएगा व पैदल संगत महंत देवेन्द्र दास महाराज से आशीर्वाद लेंगी।

1676 में दून में डेरा डाला था

1676 में दून में डेरा डाला था

झण्डा मेला आयोजन समिति के व्यवस्थापक के.सी. जुयाल ने जानकारी दी कि झण्डे जी मेले की तैयारियों में तेज़ी आ चुकी है। 9 मार्च से देश-विदेश की संगतों का दरबार साहिब पहुंचने का क्रम और तेज़ हो जाएगा। 11 मार्च को परंपरा के अनुसार पूरब की संगत की विदाई होगी। डा मेला होली के पांचवें दिन देहरादून स्थित दरबार साहिब में झंडेजी के आरोहण के साथ शुरू होता है। इस दौरान देश-विदेश से संगतें मत्था टेकने पहुंचती हैं। इस मेले में पंजाब, हरियाणा और आसपास के कई इलाकों से संगतें आती हैं। जो कि गुरूराम राय के भक्त होते हैं। श्री गुरु राम राय ने वर्ष 1676 में दून में डेरा डाला था। उनका जन्म 1646 में पंजाब के होशियारपुर जिले के कीरतुपर में होली के पांचवें दिन हुआ था। इसलिए दरबार साहिब में हर साल होली के पांचवें दिन उनके जन्मदिवस पर झंडा मेला लगता है। गुरु राम राय ने ही लोक कल्याण के लिए विशाल ध्वज को यहां स्थापित किया था।

जहां तक तीर गए उतनी जमीन पर संगत को ठहरने का हुक्म दिया

जहां तक तीर गए उतनी जमीन पर संगत को ठहरने का हुक्म दिया

देहरादून को द्रोणनगरी भी कहा जाता है। श्री गुरु राम राय ने अपनी तपस्थली बना लिया। गुरु राम राय महाराज सातवीं पातशाही (सिक्खों के सातवें गुरु) श्री गुरु हर राय के पुत्र थे। औरंगजेब गुरु राम राय के काफी करीबी माने जाते थे। औरंगजेब ने ही महाराज को हिंदू पीर की उपाधि दी थी। औरंगजेब महाराज से काफी प्रभावित था। छोटी सी उम्र में वैराग्य धारण करने के बाद वह संगतों के साथ भ्रमण पर चल दिए। वह भ्रमण के दौरान ही देहरादून आए थे। जब महाराज जी दून पहुंचे तो खुड़बुड़ा के पास उनके घोड़े का पैर जमीन में धंस गया और उन्होंने संगत को रुकने का आदेश दिया। अपने तीर कमान से महाराज जी ने चारों दिशाओं में तीर चलाए और जहां तक तीर गए उतनी जमीन पर अपनी संगत को ठहरने का हुक्म दिया। देहरादून पहुंचने पर औरंगजेब ने गढ़वाल के राजा फतेह शाह को उनका पूरा ख्याल रखने का आदेश भी दिया। उन्होंने यहां डेरा डाला इसलिए दून का नाम पहले डेरादून और फिर बाद में देहरादून पड़ गया। उसके बाद से आज तक उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के नाम से ही जानी जाती है।

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