हजारों पेड़ों को बचाने के लिए उत्तराखंड का चिपको आंदोलन, पेड़ों पर मौली बांधकर रक्षा का संकल्प, पढ़िए पूरी खबर
पेड़ों को बचाने के लिए समाजसेवी संगठन आए आगे, मौली बांधकर कर रहे संकल्प
देहरादून, 28 सितंबर। उत्तराखंड में एक बार फिर पेड़ों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन शुरू हो गया है। सोशल मीडिया के जरिए जो मुहिम छेड़ी वो अब सड़क पर दिख रही है। जोगीवाला से सहस्त्रधारा चौराहे तक रिंग रोड के विस्तारीकरण का काम शुरू होने से पहले पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले तमाम सामाजिक संगठन पेड़ों के काटे जाने के विरोध कर रहे हैंं। इस कार्य में 2200 पेड़ को काटने के लिए चिहिृनत करने की बात सामने आई है। जिसके विरोध में देहरादून के दर्जन भर से अधिक संगठन एकजुट होकर विरोध कर रहे हैं। खास बात है कि इस आंदोलन में जहां महिलाएं और बुजुर्ग हैं तो आंदोलन को समर्थन देने के लिए युवा और स्कूल के छात्र भी आगे आए हैं जिन्होंने पेड़ों पर मौली बांधकर पेड़ों को बचाने का संकल्प लिया। आंदोलनकारियाें का कहना है कि पेड़ोंं को बचाने का आंदोलन जारी रहेगाा
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18 सितंबर से शुरू हुआ आंदोलन
सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून की इरा चौहान ने बताया कि उन्हें कहीं से इस बारे में जानकारी मिली कि सरकार पर्यटकों की सुविधा के लिए पेड़ काटने जा रहे हैं। तो उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर इस आंदोलन को शुरू किया। 18 सितंबर को सोशल मीडिया पर इसको लेकर एक पोस्ट शेयर किया गया। जिसका रिस्पांस मिलते ही इसे टि्वटर पर आंदोलन के तौर पर लाया गया। देखते ही देखते इसमें 20 आर्गेनाइजेशन जुड़ गए। 26 सितंबर को चिपको मूवमेंट किया गया। जिसमें सभी लोगों का भारी समर्थन मिला।

वोट उसे जो पेड़ बचाएगा
इरा चौहान का कहना है कि 11 मिनट की डिस्टेंस कम करने के लिए हम क्या 11 हजार पेड़ काटेंगे। ये सही नहीं है, साथ ही जब हम सांस ही नहीं ले पाएंगे तो पर्यटक क्यों आएंगे। उनका कहना है कि देहरादून का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। ऐसे में हम सबने ठाना है कि हम पेड़ों की आवाज बनेंगे। चुनावी साल है तो वोट उसको जो पेड़ बचाएगा। हमारा मकसद
एक बार शोर मचाकर हल्ला नहीं करना है। इस बात पर गंभीरता से हम प्लानिंग कर रहे हैं।

क्या था पहाड़ का चिपको आंदोलन
26 मार्च 1974 को ही उत्तराखंड में 27 महिलाओं ने पेड़ों को बचाने के लिए उनसे लिपटकर चिपको आंदोलन चलाया था। जो अपने में एक तरह का अनोखा प्रदर्शन था। यह आंदोलन वास्तव में पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए उत्तराखंड के चमोली जिले के जंगलों में हुआ। गौरा देवी के नेतृत्व में 27 महिलाओं के समूह के द्वारा पेड़ों की कटाई बचाने के प्रयास किया। इस आंदोलन का उदे्श्य व्यवसाय के लिए हो रही वनों की कटाई को रोकना था और जब स्थानीय महिलाओं के समूह ने इसके लिए पेड़ों पर चिपक कर अपना विरोध प्रदर्शन किया तो देशभर में हलचल मच गई। इस आंदोलन के जरिए स्थानीय लोग वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा कटाई का विरोध कर पेड़ों पर अपना परंपरागत अधिकार जता रहे थे। आंदोलन में भारी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया था। आंदोलन की शुरूआत 1970 में मशहूर पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा, गोविंद सिंह रावत, चंडीप्रसाद भट्ट और गौरा देवी के नेतृत्व में हुई थी।












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