Badrinath dham: 200 सालों से चली आ रही 'सेंगोल' जैसी व्यवस्था, जानिए रावल के साथ चलने वाली छड़ी की पंरपरा
उत्तराखंड में स्थित बद्रीनाथ में भी सेंगोल जैसी वस्था चली आ रही है। जिसे स्थानीय लोग छड़ी कहते हैं। ये छड़ी रावल के साथ चलती है। जो कि सोने की है। 1815 में टिहरी राजघराने ने तत्कालीन रावल को सौंपा था।

देश को नया संसद भवन मिलने के साथ ही राजदंड सेंगोल को लोकसभा में स्पीकर के पास स्थापित कर दिया गया है। सेंगोल को लेकर एक नई बहस छिड़ी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे कर्तव्य पथ, सेवा पथ और राष्ट्र पथ का प्रतीक माना है। साथ ही सेंगोल को सत्ता के हस्तातंरण का प्रतीक माना गया है। इसके बाद से देश भर में इस तरह की व्यवस्था को लेकर अब एक नई बहस शुरू हो गई है।
बद्रीनाथ में भी सेंगोल जैसी व्यवस्था
जानकारों की मानें तो उत्तराखंड में स्थित बैकुंठ धाम बद्रीनाथ में भी सेंगोल जैसी व्यवस्था चली आ रही है। जिसे स्थानीय लोग छड़ी कहते हैं। ये छड़ी रावल के साथ चलती है। जो कि सोने की है। 1815 में टिहरी राजघराने ने तत्कालीन रावल को उनकी शक्ति और सत्ता के प्रतीक के रूप में सौंपा था।
रावल के आवागमन पर हमेशा साथ रहते हैं धर्मदंड
बद्रीनाथ धाम के पूर्व धर्माधिकारी भुवन चंद्र उनियाल ने बताया कि बद्रीनाथ के रावल के साथ ये दंड हमेशा साथ चलते हैं। जो कि कपाट खुलने के साथ ही रावल के आवागमन पर भी हमेशा साथ रहते हैं। ये छड़ी धर्मदंड का प्रतीक है। जब भी रावल पूजन कार्य या किसी अनुष्ठान में शामिल होते हैं तो दो कर्मचारी हमेशा उनके आगे सोने के दंड लेकर चलते हैं। जिसे राजदंड या छड़ी भी कहते हैं। ये दंड सन 1815 में अंग्रेजों व टिहरी नरेश के बीच गढ़वाल राज्य का विभाजन के साथ ही राजघराने को सौंपा गया। टिहरी राजा ने बदरीनाथ की शासन व्यवस्था की जिम्मेदारी पुजारी रावल को दे दी। इसके लिए उन्हें राजदंड सौंपा गया। लेकिन इस राजदंड या छड़ी का इस्तेमाल धार्मिक काम के लिए की जाती रही है।
ब्रिटीश काल के पहले से राजघराने की धाम में पंरपरा
सन् 1815 से पूर्व बद्रीनाथ धाम की पूजा अर्चना और आर्थिक प्रबंध टिहरी राजा द्वारा स्वयं देखे जाते थे। राजा का यह समर्पण, पूर्वज कनक पाल की बद्रीश संवाद परम्परा उन्हें 'बोंलादा बद्री" बोला करते। 1860 के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन से खुद को अलग कर लिया। जिसके बाद टिहरी राज दरबार पुरानी परंपराओं के अनुसार बद्रीनाथ धाम की पूजा व्यवस्था और आर्थिकी का संचालन करने लगे। पौडी़ एक्सीलेंसी माल्कम हाल ने 6 सितंबर 1932 को बद्रीनाथ मंदिर का धार्मिक आर्थिक प्रबंध टिहरी राज दरबार को सुपुर्द करने का पत्र गवर्नर संयुक्त प्रांत को लिखा। जो स्वीकार कर लिया गया और बद्रीनाथ धाम का आर्थिक एवं धार्मिक प्रबंध टिहरी राजा को सौंप दिया गया।
1939 के मंदिर समिति नियम से "बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति " का गठन
1948 के बाद उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बद्रीनाथ धाम का प्रबंध स्वयं अपने हाथ में लिया लेकिन बद्रीनाथ मंदिर के धार्मिक प्रबंध, पूजा मुहूर्त और रावल की नियुक्ति के संबंध में टिहरी रियासत को प्राप्त अधिकारों को पूर्ववत संरक्षित रखा। 1939 के मंदिर समिति नियम से "बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति " का गठन किया गया लेकिन टिहरी राजवंश की परंपराएं बरकरार रखी गई हैं। बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने और बंद करने का मुर्हूत आज भी राज परिवार के द्वारा ही किया जाता है।
पुरोहित परिवार धार्मिक प्रबंधों की निगरानी करते
बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने में पहले राजा स्वयं मौजूद रहते थे लेकिन समय के साथ उनकी उपस्थिति कठिन हुई तो चांदपुर गढ़ी के पुरोहित परिवार नौटी जनपद चमोली के नौटियाल परिवार बद्रीनाथ मंदिर के कपाट खोलने में उपस्थित रहते हैं धार्मिक प्रबंधों की निगरानी करते हैं। रावल की नियुक्ति अब हालांकि रावल मंदिर समिति के कर्मचारी होते हैं लेकिन परंपरा से टिहरी के राजा रावल के परामर्श से उप रावल की नियुक्ति करते हैं।
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