जानिए, उत्तराखंड प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के कुर्सी संभालते ही सामने होंगी कौन सी 5 बड़ी चुनौतियां

सत्ता संभालते ही किन मसलों पर लेने होंगे फैसले

देहरादून, 2 मार्च। उत्तराखंड में 5वीं विधानसभा के लिए 14 फरवरी को मतदान सम्पन्न हो चुके हैं और अब 10 मार्च को ​रिजल्ट आने हैं जिसके बाद नई सरकार का गठन होगा। नई सरकार से उत्तराखंड के लोगों को खासा उम्मीदें हैं। ऐसे में नई सरकारक के गठन के साथ ही नए मुख्यमंत्री के सामने कई चुनौतियां भी खड़ी होने जा रही हैं। जिनका कुर्सी संभालते ही मुख्यमंत्री को सबसे पहले समाधान तलाशना होगा। आइए ऐसे 5 बड़े मुद्दों के बारे में जानते हैं जो कि नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती हो सकती हैं।

पुरानी पेंशन बहाली

पुरानी पेंशन बहाली

लंबे समय से कर्मचारी पुरानी पेंशन बहाली की मांग कर रहे हैं। धामी सरकार को चुनाव में जाने से पहले भी इस बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा। अब राजस्थान सरकार ने इसे लागू कर दूसरे राज्यों के लिए एक बड़ा चेलेंज खड़ा कर लिया है। अब कर्मचारी अभी से दबाव बनाने में जुटे है। नए मुख्यमंत्री के कार्यभार संभालते ही पुरानी पेंशन बहाली पर अपना विजन साफ करना होगा। जो कि इतना आसान नहीं लगता है। इस मुद्दे के साथ 80 हजार से ज्यादा कर्मचारी और उनके परिजन जुड़े हुए हैं।

पुलिस ग्रेड पे

पुलिस ग्रेड पे

वर्तमान मुख्यमंत्री और आने वाले मुख्यमंत्री के लिए पुलिस ग्रेड पे बड़ा चेलेंज बनकर रहा है और रहेगा। इस तरह पुलिस ग्रेड पे को लेकर सरकार को बड़ा निर्णय लेकर इस मुद्दे का समाधान तलाशना होगा। उत्तराखंड पुलिस में सबसे पहले वर्ष 2001 में भर्ती हुई थी। इस बैच के सिपाहियों को 20 साल की सेवा के बाद 4600 ग्रेड पे दिए जाने की बात कही गई थी। वर्ष 2021 में उन्हें बीस साल का समय हुआ तो सिपाहियों ने इसकी मांग शुरू की। धामी सरकार के एकमुश्त 2 लाख रुपए देने के निर्णय को भी पुलिसक​र्मियों के परिजनों ने मानने से इनकार कर दिया। जिसके बाद अब नई सरकार से पुलिसकर्मियों और उनके परिजनों को उम्मीदें जगी है।

गैरसेंण

गैरसेंण

उत्तराखंड की स्थायी राजधानी का मुद्दा 22 साल से लटका हुआ है। पहले गैरसेंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है। लेकिन अब घोषणा पत्र में सियासी दलों ने राजधानी बनाने का दांव चला है। अब देखना होगा कि नए मुख्यमंत्री और सरकार राजधानी के मुद्दे पर क्या निर्णय लेते हैं। जो कि आसान नहीं लगता है।

भू कानून

भू कानून

वर्तमान भाजपा सरकार के लिए भू कानून का मु्द्दा चुनाव में जाने तक टेंशन का कारण बना रहा। राज्य सरकार सख्त भू कानून बनाने का दावा तो करती रही लेकिन इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई। अब नए मुख्यमंत्री को भू कानून के मुद्दे पर ऐतिहासिक निर्णय लेना होगा। प्रदेश में लोग हिमाचल की तर्ज पर भू कानून चाहते हैं। ​वर्तमान में कोई भी पूंजीपति प्रदेश में कितनी भी जमीन खरीद सकता है। इसके तहत पहाड़ में उद्योग लगाने के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या उससे कोई भूमि खरीदेगा तो भूमि को अकृषि कराने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी होगी। इस कानून को बदलने की मांग चल रही है।

राज्य कर्मचारियों की मांगे

राज्य कर्मचारियों की मांगे

प्रदेश के ढ़ाई लाख से ज्यादा कर्मचारी चुनाव से पहले कर्मचारी समन्वय समिति बनाकर सरकार के सामने अपनी 14 सूत्रीय मांगो को रख चुके हैं। इसमें एसीपी बहाल करने के अलावा विभागों के एकीकरण और अन्य कई मांगे हैं। इस तरह से नई सरकार और नए मुख्यमंत्री के सामने राज्य कर्मचारियों को साधने की सबसे बड़ी चुनौती होगी। कर्मचारियों को खुश किए बिना कोई भी सरकार आसानी से नहीं चलाई जा सकती है। ऐसे में कर्मचारियों की बड़ी मांगों पर सरकार को तुरंत निर्णय लेना होगा।

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