जब रोजे की सहरी छोड़ भारत माता की रक्षा के लिए दौड़ा ये जांबाज, 4 आतंकियों को मार गिराया
रमजान की सहरी छोड़ कश्मीर में सीआरपीएफ की 45वीं बटालियन के शिविर पर आतंकी हमले को नाकाम करने वाले कमांडेंट इकबाल अहमद की आज पूरे देश में वाहवाही हो रही है।
इलाहाबाद। रमजान की सहरी छोड़ कश्मीर में सीआरपीएफ की 45वीं बटालियन के शिविर पर आतंकी हमले को नाकाम करने वाले कमांडेंट इकबाल अहमद की आज पूरे देश में वाहवाही हो रही है। इकबाल अहमद ने न सिर्फ अपने फौजी भाईयों की जान बचाई बल्कि कमांडेंट चेतन चीता पर हुए आतंकी हमले का भी बदला भी लिया। चार विदेशी आतंकियों को मार गिराने वाले जांबाज इकबाल अहमद के बारे में पढ़िए हमारी यह स्पेशल रिपोर्ट-

जब सहरी छोड़ आतंकियों से भिड़े इकबाल
इकबाल अहमद रोजा रखे हुये थे और नियमानुसार सुबह की सहरी का वक्त होने वाला था। इसी दरमियान कुत्तों की तेज आवाज सुनकर कमांडेंट इकबाल चौकन्ने हो गये। कुत्तों की आवाज अनहोनी की आशंका व्यक्त कर रही थी। इकबाल ने उस आवाज में छिपी दहशत को पहचान लिया और सहरी छोड़कर आवाज की ओर बढ चले। आतंकवादियों ने सीआरपीएफ के कैंप पर हमला किया था। फिदायीन हमला था । हमलावरों ने पहले संतरी पोस्ट को निशाना बनाकर फायरिंग की और दीवार से कूदकर कैंप के में घुसने का प्रयास किया। इकबाल शिविर के बाहर संदिग्ध हलचल व फायरिंग से सारा माजरा समझ चुके थे। कमांडेंट इकबाल ने अपने हमराहियों के साथ मोर्चा संभाल लिथा। इकबाल के साहस और कुशल नेतृत्व का ही नतीजा था कि जवाबी कार्रवाई में सुरक्षाबलों ने आतंकवादियों को मार गिराया और कमांडेंट इकबाल की सतर्कता व साहस से एक बड़ा फिदायीन हमला नाकाम कर दिया गया। इस मुठभेड़ में सीआरपीएफ के सभी जवान भी सुरक्षित रहे। इस तरह से सीआरपीएफ शिविर पर हमला करने आए चार आतंकियों को ढेरकर पूर्व कमांडेंट चेतन चीता पर हुए घातक हमले का भी बदला ले लिया गया।

इलाहाबाद के नैनी में घर
कमांडेंट इकबाल अहमद उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के रहने वाले हैं। संगम नगरी के नैनी में कमांडेंट इकबाल अहमद का घर है। 17 मार्च, 1970 को जन्मे इकबाल अहमद के पिता रेलवे में अधिकारी थे और मां एक गृहिणी। चार भाइयों में सबसे बड़े इकबाल को बचपन से ही फौजी वर्दी पहनने का शौक था। वह हमेशा घर में कहते उन्हें फौजी बनना है। इकबाल ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इकनॉमिक्स में एमए की डिग्री हासिल की। इकबाल का चयन सीआरपीएफ में 22 मई 1997 को हुआ। इकबाल अहमद की पत्नी डॉक्टर हैं जिससे इन्हें दो बेटी और एक बेटा है।

आतंकवाद के खिलाफ पहली पोस्टिंग
बात 1997-98 की है। उन दिनों आतंकवाद अपने उफान पर था, आए दिन कहीं न कहीं आतंकी हमले सुनाई देते रहते थे। उसी समय ट्रेनिंग पूरी करते ही इकबाल अहमद को आतंकवाद के खिलाफ पहली पोस्टिंग मिली। यह पोस्टिंग थी कश्मीर के अनंतनाग जिले में सीआरपीएफ की 89वीं वाहिनी में। 1998 में अपनी पहली ऑपरेशनल ड्यूटी के दौरान ही इकबाल का साहस नजर आने लगा था। दक्षिण कश्मीर में हुए कई आतंकरोधी अभियानो में इन्होंने हिस्सा लिया और आतंकियों को धूल चटाई।

गुजरात दंगा संभालने पहुंचे
इकबाल की कश्मीर से बाहर पहली पोस्टिंग वर्ष 2000 में मिली। सबसे पहले उन्हे पूर्वात्तर भारत के नगालैंड, त्रिपुरा जैसे आतंकग्रस्त इलाके में भेजा गया। अपनी ड्यूटी निभाने के दौरान ही वर्ष 2002 में गुजरात में दंगा हुआ। तब इकबाल को दंगा पीड़ित इलाकों में स्थिति को संभालने के लिये भेजा गया और उन्होंने बखूबी अपनी ड्यूटी निभायी। गुजरात दंगे की आंच धीमी हुई तो इकबाल अहमद को नक्सलियों से मोर्चा लेने की जिम्मेदारी दी गई। इकबाल सबसे पहले झारखंड पहुंचे और कई नक्सल विरोधी अभियान का सफल संचालन किया। इसी दौरान ओडिसा में भी उनकी पोस्टिंग हुई।

तबाह कर दिया आतंकियों का नेटवर्क
वर्ष 2011 में इकबाल अहमद को वापस कश्मीर घाटी बुलाया गया। कश्मीर के बेहद संवेदनशील इलाके बांदीपोर में वह जगह-जगह तैनात किये जाते रहे। तब इकबाल ने जमीनी स्तर पर आतंकवादियों के नेटवर्क को उखाड़ना शुरू किया। 2011 से 2015 के बीच बांदीपोर का शायद ही कोई ऐसा इलाका रहा हो जहां इकबाल अहमद की टीम ने आतंकियों में दहशत न पैदा की हो। आतंकियों का जमीनी नेटवर्क यहां से लगभग खत्म हो गया था। अपने आतंकरोधी अभियानों में इकबाल ने कई नामी आतंकियों को मार गिराने में अहम भूमिका निभाई।

बिना हिंसा के कराया चुनाव
यह इकबाल का ही कौशल था कि घाटी के इस इलाके में जब 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुये तो बिना हिंसा के संपन्न हुये। लेकिन इसके पीछे की वजह साफ थी। बांदीपोर इलाके में चार साल तक इकबाल ने अपना खुद का नेटवर्क इतना मजबूत बना लिया था कि पल पल की खबरे पहुंचने लगी थी। जिसके चलते यहां आतंकी गतिविधियां नाममात्र रह गई थी। चुनाव संपन्न कराने पर इकबाल अहमद को सम्मानित भी किया गया था ।

चेतन चीता घायल हुये तो वापस आये कश्मीर
14 फरवरी 2017 को 45वीं वाहिनी के कमाडेंट चेतन चीता आतंकियों से मुकाबला करते हुए जख्मी हो गये। तब फिर से इस बटालियन के लिये किसी जांबाज और इलाके की नस पहचानने वाले फौजी की जरूरत हुई। अधिकारियों की जुबान पर पहला नाम कमांडेंट इकबाल अहमद का ही था। लेकिन 2015 से इकबाल अहमद का तबादला एक बार फिर नक्सल प्रभावित राज्य उड़ीसा में हो गया था और वह वही अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। लेकिन अब फिर से कश्मीर घाटी के बांदीपोर में इकबाल अहमद का बुलावा हुआ और इन्हे बुलाकर चेतन चीता के स्थान पर 45वीं वाहिनी की कमान सौंपी दी गई।












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