उत्तर प्रदेश के नतीजे आखिर क्यों नई राजनीति और नए मतदाताओं की सोच को दर्शाते हैं?
पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन का फायदा उसे जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मिलेगा। इसके साथ-साथ राज्यसभा का गणित भी इन नतीजों से काफी कुछ बीजेपी के पक्ष में जाएगा।
नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का आंकलन करें तो नरेंद्र मोदी की बीजेपी ने दो राज्यों उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड में बड़ी जीत दर्ज करते हुए, सत्ता पर कब्जा जमाया। मणिपुर में भी बीजेपी पहली बार सरकार बनाने के खेल में शामिल दिख रही है। वहीं गोवा में भी हालात ज्यादा अलग नहीं है, यहां भी सरकार बनाने की रेस में कहीं न कहीं बीजेपी शामिल है। पंजाब की बात करें तो वहां बीजेपी सीधे टक्कर में न होकर जूनियर पार्टनर थी। यहां अकाली दल मुख्य रुप से आगे थी, बीजेपी उसके साथ गठबंधन में शामिल थी।
यूपी चुनाव के नतीजों का प्रभाव
कुल मिलाकर पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन का फायदा उसे जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मिलेगा। इसके साथ-साथ राज्यसभा का गणित भी यूपी-उत्तराखंड के नतीजों से काफी कुछ बीजेपी के पक्ष में जाएगा। इसके साथ-साथ 2019 में होने वाले अगले संसदीय चुनाव में भी उसे इसका फायदा मिलेगा। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के कई मायने हैं। पार्टी ने यूपी की 403 विधानसभा सीट में से 80 फीसदी सीटों पर कब्जा किया है। यूपी का सियासी गणित समझा जाए तो ये केवल एक राज्य नहीं है यहां क्षेत्रीय दलों का अच्छा असर है, हालांकि इस चुनाव में क्षेत्रीयता की झलक देखने को नहीं मिली।

कैसे बदला वोटरों को मिजाज
यूपी को भारत का गढ़ कहा जाता है। भारतीय राजनीति से जुड़ी मुख्य फॉल्टलाइन इस प्रदेश में नजर आती है, इसमें जाति, वर्ग और समुदाय के मुद्दे भी शामिल हैं। ये ऐसी जमीन है जिसने कई राष्ट्रीय आंदोलनों और ट्रेंड्स का गवाह बना है। यहां 1960 के मध्य तक कांग्रेस मजबूत थी। इसके बाद कांग्रेस विरोधी ताकतें मजबूत हुई, इनमें समाजवादी नेता भी शामिल हैं। इसके बाद यहां गैर-कांग्रेसी सरकारों का दौर आया। 1980 में कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में आई। इस बार मुकाबला ज्यादा रोमांचक था, इस दौर में किसान राजनीति और जाति के आधार के वोटों को बंटवारा देखने को मिला।

बीजेपी पर इस बार जनता ने जताया भरोसा
1990 की बात करें तो उस समय राष्ट्रीय तौर पर तीन मुद्दे सामने नजर आ रहे थे- मंडल, मंदिर और मार्केट। ये कुछ ऐसे अहम मुद्दे थे जो उस दौर उभरते दिखाई दे रहे थे। 90 के दशक में इनके उभरने से टकराव नजर आया, इस सीधा असर राजनीतिक विखंडन का कारण बना, इसने मतदाताओं और राज्य की पार्टी प्रणाली पर भी असर डाला। 10 साल में उत्तर प्रदेश ने चार चुनाव देखे, इस दौरान आठ सरकारों का गठन हुआ। इतना ही नहीं इस दौर में तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लगा।

लगातार तीसरी बार यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार
इस पूरे घमासान और अस्थिर सरकार का दौर पहली बार तब खत्म हुआ जब 2007 में यूपी के मतदाताओं ने खंडित जनादेश न देकर एक ही दल पर भरोसा जताया। बीएसपी उस समय मजबूत बनकर उभरी। मायावती के नेतृत्व में बीएसपी अकेली मजबूत पार्टी बनकर उभरी। 1985 के बाद पहली बार प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। इसके बाद 2012 में एक बार फिर से एक दल को बहुमत मिला। समाजवादी पार्टी ने इस बार बहुमत हासिल किया।

इस दांव से खिला यूपी में कमल
अब मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने जिस तरह से कमाल दिखाया, ये यूपी की जनता के पक्ष को दर्शाने के लिए काफी है। इस चुनाव से साफ हो जाता है कि यूपी जनता कि सोच क्या है? यूपी एक नए फेज की राजनीति का गवाह बनता दिख रहा है जहां मंडल और मंदिर तो है लेकिन ये पूरी तरह से परिभाषित नहीं है। मोदी के नेतृत्व पर विश्वास करते हुए लोगों को उम्मीद है कि इस बार बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार अहम फैसले लेगी। प्रदेश के विकास में कदम बढ़ाएगी। बीजेपी को भी इस जीत के लिए मिशन 2017 के लिए लंबी तैयारी करनी पड़ी है। प्रदेश में जाति और संप्रदाय का गणित बहुत मजबूत है, पार्टी ने इसमें सेंध की योजना बनाई वो बेहद कठिन थी। हालांकि पार्टी ने अपने विचारों और अंदाज से इसे अपने हक में कर लिया। बीजेपी ने यूपी में खेल वही खेला जो इससे पहले तक चला आ रहा था हालांकि उनकी रणनीति थोड़ी अलग थी।

बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग से दूसरे दल हुए चित
पार्टी ने जातीय गणित को देखते हुए उम्मीदवारों का चुनाव किया। इसमें गैर-यादव ओबीसी के साथ-साथ सवर्णों, ब्राह्मण और ठाकुर को साथ जोड़ा। पार्टी ने 2014 की तर्ज पर ही एक बार फिर से हिंदुत्व का मुद्दा बुलंद किया। पार्टी की ओर से एक भी टिकट मुस्लिम उम्मीदवार को नहीं दिया गया। इस चुनाव में योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं को अपना खेल खेलने की खुली छूट दी गई। इनमें गोरखपुर के सांसद के एंटी रोमियो स्क्वैड से लेकर लव जिहाद जैसे मुद्दे और जातीय ध्रुवीकरण को पूर्वी यूपी में खासतौर से उछाला गया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने खुद कसाब और अवैध बूचड़खाने बंद करने और मोदी के कब्रिस्तान के बदले श्मशान वाला बयान पार्टी के पक्ष में गया।

केंद्र सरकार के कार्यों को भुनाने की कोशिश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र में तीन साल के करीब सरकार चला चुके हैं। मोदी के नेतृत्व में सरकार ने कई अहम योजनाएं जैसे गरीबों के लिए जन-धन अकाउंट खुलवाना, उज्ज्वला योजना के तहत बीपीएल लिस्ट में आने वाले लोगों को फ्री गैस कनेक्शन देना जैसी योजनाओं ने बीजेपी के लिए यूपी में रास्ता बनाया। जिस समय देश में नई तकनीक काम कर रही हो तो इससे जुड़ने के लिए लोग भी जल्द ही इसमें शामिल होने लगे। बीजेपी के लिए दूसरा फायदा नोटबंदी से मिला। इस फैसले का सीधा असर लोगों को हो, इसके लिए खुद प्रधानमंत्री मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ इसे जंग के तौर पर पेश किया। उन्होंने इस फैसले को देश के हित में बताया। पीएम मोदी ने इस कदम को अमीर-गरीब की 'बराबरी' के तौर पर पेश किया।

कहां फेल हुई सपा-बसपा
इसके साथ-साथ पीएम मोदी और अमित शाह ने एक सुर अखिलेश यादव और मायावती के कार्यों पर निशाना साधते हुए इसे जाति और धर्म विशेष से जोड़ दिया। इस मुद्दे का असर जनता पर सीधे हुए। अखिलेश यादव के विकास का मुद्दा हो या फिर मायावती के दौर में कार्यों को जाति विशेष के कार्य से जोड़ा गया। जिसका फायदा बीजेपी को मिला। सवाल ये भी है कि आखिर मोदी सफल क्यों रहे जबकि उनके विरोधियों को करारी हार का सामना करना पड़ा? सपा और बसपा एक दूसरे से ये सवाल जरूर पूछते नजर आएंगे। मोदी की जीत एक ऐसे नेता की जीत को दर्शाती है जो कभी थकता नजर नहीं आता है। वो ऐसे नेता हैं जो लगातार अपने सियासी खेल को साधने में जुड़े रहते हैं।












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