यूपी में कांग्रेस ने क्यों किया अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान, प्रियंका का मास्टरस्ट्रोक या बड़ी मजबूरी ?
लखनऊ, 15 नवंबर: उत्तर प्रदेश में 2022 में होने वाला विधानसभा चुनाव मल्टी-कॉर्नर होगा, यह बात तय हो चुकी है। सत्ताधारी बीजेपी का मुकाबला मुख्यतौर पर समाजवादी पार्टी (एसपी)-राष्ट्रीय लोक दल(आरएलडी) गठबंधन, बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और कांग्रेस के साथ होगा। बाकी कई सारी पार्टियां और गठबंधन अलग से किसी का समीकरण बनाने-बिगाड़ने का काम करेंगे। इसमें सबसे ताजा चर्चा कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान को लेकर हो रही है। क्योंकि, पार्टी संगठनात्मक तौर पर प्रदेश में बहुत ही कमजोर है। अलबत्ता पिछले कुछ महीनों में प्रभारी महासचिव प्रियंका गांधी ने स्थिति को जमीनी स्तर पर दुरुस्त करने की पूरजोर कोशिश की है। इसके अलावा उन्होंने वादों का पिटारा भी खोल रखा है और महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने की घोषणा करके मैदान में खुद को बनाए रखने वाला बड़ा कदम उठाया है। लेकिन, सवाल है कि अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान के पीछे पार्टी की रणनीतिक सोच है या फिर कोई बड़ी मजबूरी ?

कांग्रेस अकेले नहीं लड़ती तो विकल्प क्या था ?
प्रियंका गांधी वाड्रा ने रविवार को बुलंदशहर में ऐलान किया कि 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी और सभी 403 सीटों पर अपने उम्मीदवार देगी। सामने से तो 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देने की घोषणा के बाद यह उनका बहुत ही बोल्ड फैसला लगता है। लेकिन, इसके बैकग्राउंड में जाएं तो तस्वीर दूसरी कहानी बयां करती है। हाल तक खुद प्रियंका और यूपी चुनाव के ऑब्जर्वर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सभी विकल्प खुले होने की बात कर रहे थे। पार्टी महासचिव इमरान मसूद तो सपा से गठबंधन तक की पैरवी कर रहे थे। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार ने वन इंडिया से खास बातचीत में कहा है कि "अकेले चुनाव नहीं लड़ती तो क्या करती? जयंत चौधरी ने साफ मना कर दिया था। कांग्रेस अकेले चुनाव नहीं लड़ती तो उसके पास विकल्प क्या था?....इस ऐलान का कोई मतलब नहीं है.....किसके साथ लड़ती ?....विकल्प ही नहीं था.....नहीं घोषणा करती तो भी अकेले ही लड़ती....."
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प्रियंका खुद चुनाव लड़ने का ऐलान करें तो तस्वीर बदल सकती है
कांग्रेसियों की ओर से बार-बार संकेत दिया जाता रहा है कि पार्टी प्रियंका गांधी को प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर पेश कर सकती है। प्रेम कुमार कहते हैं कि, "योगी आदित्यनाथ खुद नहीं लड़ेंगे.....अखिलेश भी नहीं लड़ेंगे.....लेकिन अगर प्रियंका खुद चुनाव लड़ें तो वह पार्टी कैडर में जान फूंक सकती हैं। जिस तरह से 40 फीसदी सीट महिलाओं को देने का फैसला बोल्ड है, उसी तरह प्रियंका का खुद चुनाव मैदान में उतरना बोल्ड फैसला रहेगा। अगर वह खुद चुनाव नहीं लड़ेंगी तो इससे साफ लगेगा कि उनमें बेहतर विश्वास की कमी है।"

अकेले चुनाव लड़ने में कांग्रेस का क्या फायदा ?
दरअसल, अभी तक उत्तर प्रदेश में जो चुनावी परिस्थितियां बन रही हैं, उससे यही बात निकलकर आ रही है किही सपा-रालोद, बसपा या कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन सबका मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के साथ ही है। राजनीतिक एक्सपर्ट कुमार का मानना है कि "सबने जांच करके देख लिया है। बीजेपी से मुकाबले के लिए उन्हें लगता है कि मल्टी-कॉर्नर फाइट में ही सर्वाइव कर पाएंगे। भले ही सब अलग-अलग चुनाव लड़ें, लेकिन सीटों के हिसाब से एक-दूसरे को भाजपा के खिलाफ समर्थन दे सकते हैं।" उन्होंने यह भी कहा है कि "भले ही 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की बात कही जा रही हो, लेकिन कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा 70 सीटों पर ही फोकस करेगी और अधिकतम 30 सीटों पर ही मजबूती से लड़ेगी।" उनका अंदाजा है कि "कांग्रेस को इस चुनाव से इतना तो जरूर फायदा मिलेगा कि अभी जो उसका वोट करीब 6 फीसदी के करीब है, वह बढ़कर 10-12 या 15 फीसदी तक जा सकता है।" यानी भले ही इस चुनाव में कांग्रेस को इस फैसले से कोई फायदा ना मिले, भविष्य में अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास जरूर मिल सकता है।

गठबंधन में चुनाव लड़ने पर क्या हुआ ?
उत्तर प्रदेश में 1989 के बाद से कांग्रेस के पास अपना कोई बड़ा जनाधार नहीं बचा है। उसने दो-दो बार 1996 (बसपा) और 2017 (सपा)में गठबंधन करके भी देख लिया, लेकिन पार्टी को खास फायदा नहीं मिला। 2017 के यूपी चुनाव में अखिलेश यादव और राहुल गांधी की चुनावी मित्रता को खूब भुनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन 114 सीटों पर लड़कर भी कांग्रेस को 7 सीटें ही मिलीं और 29 पर जमानतें जब्त हो गईं। उसे सिर्फ 6.25% वोट मिले। 1996 में पार्टी 126 सीटों पर लड़ी थी और उसके 33 उम्मीदवार जीते थे और 20 पर जमानतें जब्त हुई थीं। उस चुनाव में उसे 8.35% वोट मिले थे। जबकि, 2012 में इसे 11.65% और 2007 में 8.61% वोट मिले थे।

प्रियंका गांधी का राजनीतिक कद तय होगा
वैसे प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में पहली बार सक्रिय नहीं हुई हैं। जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो पिछले लोकसभा चुनावों में उन्हें पूर्वी यूपी की जिम्मेदारी देकर आजमा चुके हैं। रायबरेली में सोनिया गांधी ने जरूर अपने प्रतिष्ठा बचा ली, लेकिन राहुल अमेठी की अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। तब प्रियंका के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया पश्चिमी यूपी की कमान संभालने के लिए भेजे गए थे। इस बार यूपी में कांग्रेस को अपने दम पर जिंदा करने का पूरा दारोमदार प्रियंका गांधी के खुद अपने कंधों है। पार्टी लेफ्ट फ्रंट के साथ पश्चिम बंगाल का चुनाव लड़ी तो भी खाता नहीं खोल पाई और बिहार में महागठंबधन तोड़कर उपचुनाव में अकेले दांव लगाया तो जमानत भी नहीं बचा पाई। इसलिए यूपी चुनाव का परिणाम कांग्रेस का भविष्य तो तय करेगा ही, खुद प्रियंका के राजनीतिक वजूद के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण साबित होगागा।
कांग्रेस अकेले चुनाव नहीं लड़ती तो उसके पास विकल्प क्या था?....इस ऐलान का कोई मतलब नहीं है.....किसके साथ लड़ती ?....विकल्प ही नहीं था.....नहीं घोषणा करती तो भी अकेले ही लड़ती.....प्रेम कुमार, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक












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