यूपी चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी फिर पड़ गए हैं अकेले, क्यों नहीं मिल पाया अखिलेश-राजभर का साथ
लखनऊ, 14 दिसंबर। उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगी अधिकांश पार्टियों के गठबंधन का रुख स्पष्ट हो चुका है। भाजपा और सपा ने छोटे दलों के साथ गठबंधन किया है। वहीं बसपा चुनाव अकेले लड़ने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस को कोई गठबंधन पार्टनर नहीं मिल पाया है। यूपी चुनाव के तीन किरदार ऐसे हैं जो भले ही राजनीतिक ताकत में कम हों लेकिन सुर्खियों में रहते हैं। असदुद्दीन ओवैसी, चंद्रशखेर रावण और शिवपाल यादव। ओम प्रकाश राजभर ने इन सबके साथ मिलकर भागीदारी संकल्प मोर्चा बनाया था। बाद में ओम प्रकाश राजभर अखिलेश यादव के साथ गठबंधन में चले गए जिसके बाद यह मोर्चा अपना वजूद खो बैठा। अखिलेश ने ओवैसी के साथ गठबंधन करने से पहले ही मना कर दिया है। शिवपाल यादव का गठबंधन भी अभी तक किसी से नहीं हो पाया है लेकिन अखिलेश के साथ वे जाएंगे कि नहीं, अभी यह स्पष्ट नहीं है। 16 दिसंबर को फैसला लेने के लिए शिवपाल अपनी पार्टी की बैठक करने वाले हैं। उधर, आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर रावण भी गठबंधन के साथी की तलाश में हैं। असदुद्दीन ओवैसी के सामने संकट यह है कि 2017 का यूपी चुनाव उनकी पार्टी एआईएमआईएम ने अकेले लड़ा था लेकिन अधिकांश प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। वहीं, 2020 बिहार चुनाव में पांच सीटें जीतने के बाद ओवैसी के हौसले बुलंद हैं लेकिन उनको भी पता है कि यूपी में बिहार के सीमांचल जैसे समीकरण नहीं हैं। बहरहाल, ओवैसी इस बार के यूपी चुनाव में फिलहाल अकेले पड़ गए हैं। हलांकि वो अभी भी छोटे दलों के साथ गठबंधन कर 100 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं।
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मुस्लिम वोटबैंक: सपा क्यों नहीं करेगी ओवैसी से गठबंधन?
मुस्लिम-यादव वोटबैंक सपा का ऐसा मजबूत समीकरण है जिसके सहारे यह सत्ता में आती रही है। राम मंदिर निर्माण आंदोलन के दौरान 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश पुलिस को दिया था। इस घटना के बाद मुलायम को मौलाना मुलायम कहा जाने लगा था। इस घटना से मुलायम के पक्ष में मुस्लिम वोट गिरने लगे थे। 1992 में समाजवादी पार्टी बनाने के बाद मुलायम मुस्लिम-यादव वोटबैंक के सहारे ही सत्ता तक पहुंचते रहे। जब सपा की बागडोर अखिलेश के हाथ में आ गई तब भी यह माना जा रहा है कि भाजपा के विरोध में मुस्लिम वोट अखिलेश के साथ ही लामबंद होंगे क्योंकि साइकिल ही फिलहाल कमल को टक्कर देती दिख रही है। अखिलेश को यह भरोसा है कि मुस्लिम वोट उनके ही साथ है इसलिए वो इसकी साझेदारी किसी के साथ नहीं करना चाहेंगे। असदुद्दीन ओवैसी सपा के मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश करते रहे हैं और इस बार उन्होंने यह कोशिश और ज्यादा तेज कर दी है। भाषणों में वे मुस्लिमों को अपनी लीडरशिप बनाने की अपील करते नजर आ रहे हैं और कह रहे हैं कि 19 प्रतिशत मुस्लिम आबादी को अपनी हिस्सेदारी के लिए लड़ना चाहिए।

ओवैसी के साथ जाने से सपा को नहीं, एआईएमआईएम को होता फायदा
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में ऐसा देखने को मिला है कि छोटी पार्टियां बड़ी पार्टियों के साथ गठबंधन कर फायदे में रहती है। हलांकि बड़ी पार्टियों को भी गठबंधन का फायदा मिलता है लेकिन बाद में यही छोटी पार्टियां उनके लिए चुनौती बन जाती हैं। ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और संजय निषाद की निषाद पार्टी इसके बड़े उदाहरण हैं। सपा का साथ लेकर निषाद पार्टी आगे बढ़ी और भाजपा के पाले में जाकर सपा के लिए चुनौती बन गई। वहीं सुभासपा भाजपा के साथ मिलकर आगे बढ़ी लेकिन अब वो अखिलेश के साथ जाकर भाजपा के लिए चुनौती बन गई है। यही हाल अपना दल (एस) जैसे दलों का भी है। लेकिन यह होने के बाद भी भाजपा और सपा जाति आधारित छोटे दलों के साथ गठबंधन में है। ओवैसी का मामला धर्म से जुड़ा है। अगर सपा ओवैसी के साथ गठबंधन करती तो बड़ी पार्टी के वोटबैंक का फायदा एआईएमआईएम को मिलता। लेकिन सपा के हिंदू और मुस्लिम दोनों वोटबैंक पर इसका असर पड़ जाता। सपा को वोट करने वाले हिंदू वोटर खफा हो सकते थे। सपा खुद ही अपने वोटबैंक में सेंध लगवाने का जोखिम नहीं लेगी। यही नहीं, एआईएमआईएम अगर यूपी में मजबूत हुई तो इसका सीधा नुकसान सपा को ही होगा। पहले कयास लगाए जा रहे थे कि गठबंधन होगा लेकिन इन सब अटकलों पर अखिलेश ने खुद ही विराम लगा दिया। ओम प्रकाश राजभर को गठबंधन के लिए सपा जैसी बड़ी पार्टी मिली तो ओवैसी का साथ तो छूटना ही था। वो कहने लगे कि ओवैसी 100 सीटों पर चुनाव लड़ने का सपना छोड़ दें।

रैलियों में ओवैसी के निशाने पर अखिलेश और सपा
यूपी चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी अब रैलियों में अखिलेश यादव और सपा पर लगातार हमला बोल रहे हैं। कानपुर की रैली में असदुद्दीन ओवैसी ने बाबरी मस्जिद विध्वंस का जिक्र करते हुए कहा कि इसके मुलजिमों को कोर्ट ने छोड़ दिया जिनके सामने मस्जिद को गिराया गया था। कहा कि मैंने संसद में पूछा कि सीबीआई ने इसके खिलाफ अपील क्यों नहीं की, किसने तोड़ा बाबरी मस्जिद को...क्या सपा, बसपा या कांग्रेस का कोई नेता यह बोल सका। ओवैसी ने अखिलेश पर निशाना साधते हुए कहा कि आजम खान जेल में हैं तो अखिलेश क्यों बाहर हैं? जनसभा में ओवैसी ने कहा- मुसलमानों, तुम मोदी से डरते हो या अल्लाह से, अल्लाह से प्यार करते हो या अखिलेश से। सीएए-एनआरसी मुद्दे को भी ओवैसी उठा रहे हैं। ओवैसी के भाषण से साफ होता है कि वे मुसलमानों को अपने पक्ष में लामबंद करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। ओवैसी ने यहां तक कहा कि उत्तर प्रदेश का उपमुख्यमंत्री मुसलमान को होना चाहिए। ओवैसी फैक्टर का अगर यूपी चुनाव पर असर हुआ तो इसका सीधा नुकसान सपा को ही होगा और भाजपा फायदे में रहेगी।












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