इस्लामिक NATO के जवाब में Israel का नया दांव! बनाया Hexagon of Alliance, कौन-कौन से देश हुए शामिल?
Hexagon Of Alliance: इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बहुत दिनों से इस्लामिक NATO बनने की चर्चा से परेशानी में थे। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि उन्होंने इसका तोड़ निकाल लिया है। इसके लिए वह एक नए ग्रुप को लाए हैं जिसे उन्होंने "Hexagon of Alliance" नाम दिया। इस गुट में इज़राइल, भारत और ग्रीस को प्रमुख साझेदार देशों के रूप में देखा जा रहा है। नेतन्याहू के मुताबिक यह पहल पश्चिम एशिया और आसपास के क्षेत्रों में बढ़ती अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए तैयार की गई है। उनका मानना है कि यह नेटवर्क भविष्य में एक तरह के सुरक्षा कवच की भूमिका निभा सकता है।
इज़राइल बनना चाहता है इस गुट का केंद्र
नेतन्याहू की योजना के मुताबिक इज़राइल इस पूरे नेटवर्क का केंद्रीय देश होगा। वहीं भारत को इसमें सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार माना गया है। इसके अलावा ग्रीस और साइप्रस जैसे देश भी इस प्रस्तावित ढांचे का हिस्सा हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ अरब और एशियाई देशों को भी इस नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। नेतन्याहू का कहना है कि यह गठबंधन केवल सैन्य सहयोग पर आधारित नहीं होगा, बल्कि साझा मूल्यों, तकनीकी सहयोग और आर्थिक साझेदारी पर भी आधारित रहेगा।

क्या है इस्लामिक NATO?
यह पहल किसी एक दिन में तैयार नहीं हुई है। इसके पीछे पिछले कुछ सालों में बदलते क्षेत्रीय हालात भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र ने एक अलग सुरक्षा और रक्षा सहयोग ढांचा विकसित किया है, जिसे कई विश्लेषक अनौपचारिक रूप से "इस्लामिक नाटो" कहकर संबोधित करते हैं। बताया जाता है कि सितंबर 2025 में इन देशों के बीच एक रक्षा समझौता भी हुआ था।
कट्टरपंथियों का मुकाबला करना चाहते हैं नेतन्याहू
नेतन्याहू का मानना है कि क्षेत्र में उभर रहे नए गुटों और सुरक्षा चुनौतियों का जवाब केवल सैन्य ताकत से नहीं दिया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया है कि इस नए गठबंधन का मकसद उन "कट्टरपंथियों" का मुकाबला करना है, जिन्हें वे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा मानते हैं। इसमें शिया और सुन्नी दोनों प्रकार के कट्टरपंथी गुटों के खिलाफ रणनीतिक सहयोग की बात कही गई है। विश्लेषकों के मुताबिक यह इज़राइल की व्यापक और अधिक आक्रामक क्षेत्रीय रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह खुद को एक बड़े क्षेत्रीय आयोजक और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है।
भारत की भूमिका क्यों है सबसे अहम?
भारत को इस प्रस्तावित नेटवर्क में सबसे महत्वपूर्ण देशों में गिना जा रहा है। इसकी एक बड़ी वजह भारत और इज़राइल के बीच पिछले कुछ सालों में मजबूत हुए रक्षा और तकनीकी संबंध हैं। भारत लंबे समय से इज़राइल का सबसे बड़ा रक्षा खरीदार देशों में शामिल रहा है। दोनों देशों के बीच रक्षा तकनीक, ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में गहरा सहयोग देखने को मिला है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत और इज़राइल के रिश्ते और मजबूत हुए हैं। हालांकि इसके बावजूद भारत ने अब तक किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से दूरी बनाए रखी है। नई दिल्ली लगातार अपनी "Strategic Autonomy" यानी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर कायम रही है और किसी एक ब्लॉक या खेमे का हिस्सा बनने से बचती रही है।
ग्रीस और साइप्रस भी हैं इस रणनीति का हिस्सा
भारत के अलावा ग्रीस भी इस प्रस्तावित नेटवर्क में एक महत्वपूर्ण भागीदार माना जा रहा है। इज़राइल, ग्रीस और साइप्रस के बीच 2016 में एक त्रिपक्षीय सहयोग ढांचा बनाया गया था। यह ढांचा ऊर्जा, सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग के कई क्षेत्रों में काम करता है। ग्रीस और इज़राइल के संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। इसी का उदाहरण 2025 में हुआ एक बड़ा रक्षा समझौता है, जिसके तहत ग्रीस ने इज़राइल से लगभग 760 मिलियन डॉलर के रॉकेट सिस्टम खरीदे थे। इससे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और गहरा हुआ है।
इस योजना के सामने हैं कई बड़ी चुनौतियां
हालांकि "Hexagon of Alliance" सुनने में काफी महत्वाकांक्षी लगता है, लेकिन इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां भी मौजूद हैं। सबसे महत्वपूर्ण चुनौती भारत की स्थिति को लेकर है। भारत के केवल इज़राइल से ही नहीं, बल्कि ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों से भी मजबूत संबंध हैं। ऐसे में भारत किसी ऐसे गठबंधन का हिस्सा बनने से बच सकता है, जो किसी दूसरे क्षेत्रीय गुट के खिलाफ दिखाई दे। विश्लेषकों का मानना है कि भारत अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना चाहता है और किसी भी विरोधी खेमे में शामिल होने से पहले बहुत सावधानी बरतेगा।
ग्रीस भी बदल रहा है अपना रुख
इस योजना के सामने एक और चुनौती ग्रीस की विदेश नीति है। हाल के सालों में ग्रीस और तुर्की के बीच रिश्तों में कुछ सुधार देखने को मिला है। ऐसे में ग्रीस भी किसी ऐसे गठबंधन का हिस्सा बनने में सतर्क रह सकता है, जो क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता हो। इसके अलावा कई विशेषज्ञ नेतन्याहू द्वारा किए गए क्षेत्रीय वर्गीकरण पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका मानना है कि पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति को केवल कुछ गुटों में बांटकर नहीं देखा जा सकता।
भविष्य का फैसला सदस्य देशों के हाथ में
फिलहाल "Hexagon of Alliance" एक महत्वाकांक्षी रणनीतिक विचार के रूप में सामने आया है। लेकिन इसका भविष्य पूरी तरह उन देशों के फैसलों पर निर्भर करेगा जिन्हें इसमें शामिल करने की कोशिश की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे ढांचे की सफलता या असफलता काफी हद तक भारत के रुख पर निर्भर करेगी। अगर भारत सक्रिय भूमिका निभाता है तो यह नेटवर्क अधिक प्रभावशाली बन सकता है। वहीं अगर भारत दूरी बनाए रखता है तो इस योजना की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं।
फिलहाल यह साफ है कि नेतन्याहू एक नया क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा तैयार करना चाहते हैं, लेकिन इसे वास्तविकता में बदलना आसान नहीं होगा। यह एक महत्वाकांक्षी पहल जरूर है, लेकिन इसके सामने कूटनीतिक, राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर कई कठिन चुनौतियां मौजूद हैं।
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