दूसरे चरण में मतदान प्रतिशत घटने के क्या है मायने, जानिए क्या है पिछले चुनावों का ट्रेंड

लखनऊ, 15 फरवरी: उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण का मतदान 9 जिलों की 55 विधानसभा सीटों पर 62.82 प्रतिशत मतदान हो चुका है यह पिछले विधानसभा चुनाव में हुए मतदान से करीब सात फीसदी कम है। लेकिन 3 मुस्लिम बहुल सीटों पर 72 फीसदी से ज्यादा वोटिंग हुई। यानी औसत से करीब 11 फीसदी ज्यादा वोट पड़े हैं। पिछले चुनाव में इन 55 सीटों पर 65.53 फीसदी वोटिंग हुई थी। पहले चरण में भी पिछले चुनाव की तुलना में 3 फीसदी कम मतदान हुआ था। लेकिन पहले चरण में भी कई मुस्लिम बहुल सीटों पर औसत से करीब 10-11 फीसदी ज्यादा वोट पड़े। चुनाव विश्लेषक अब यह अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कम मतदान किसके लिए फायदेमंद है और किसके लिए हानिकारक है।

मतदान

मामूली बढोत्तरी से बदल जाता है सियासी समीकरण

दरअसल यूपी में वोटिंग के प्रतिशत में मामूली बढ़ोतरी से सत्ता का समीकरण बदलने का इतिहास रहा है। पिछले दो चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने से सत्ता परिवर्तन को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में चुनावी ऊंट किस तरफ बैठने वाला है। 2017 में दूसरे चरण में इन 55 सीटों पर 65.53 फीसदी वोटिंग हुई थी। 2012 में इन 55 सीटों पर 65.17 फीसदी वोट पड़े थे. 2012 की तुलना में 2017 में मतदान में लगभग 0.36 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

पिछले तीन चुनावों में इन 55 सीटों के परिणामों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि जब भी वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई है, उस समय के विपक्षी दलों ने लाभ हुआ। 2012 में सपा को 29 और 2017 में बीजेपी को यहां 33 सीटें मिली थीं। इन 55 सीटों पर इस बार 3 फीसदी वोटिंग घटी है. पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक इस बार मुख्य विपक्षी दल यानी सपा गठबंधन को काफी फायदा होता दिख रहा है।

मुस्लिम

55 सीटों पर 18 सीटों पर 40 से 55 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं

दूसरे चरण में जिन नौ जिलों में 55 सीटों पर 62.82 फीसदी मतदान हुआ है. इन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका है। पिछली बार यानि 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने मुस्लिम उम्मीदवारों की आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते 38 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन को 17 सीटें मिली थीं। सपा को 15 और कांग्रेस को दो सीटें मिलीं। बसपा और रालोद का खाता भी नहीं खुला था, इस बार भी इन 55 सीटों पर सपा गठबंधन के 19, बसपा के 23, कांग्रेस के 21 और ओवैसी की पार्टी के 19 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में हैं।

चार पार्टियों ने मिलकर 77 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे

चारों पार्टियों के 77 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में होने से माना जा रहा था कि इससे बीजेपी को फायदा होगा। क्योंकि 24 सीटों पर मुस्लिम वोट पाने के लिए मुस्लिम उम्मीदवारों के बीच जोरदार संघर्ष चल रहा है. 11 सीटों पर दो उम्मीदवार, 9 सीटों पर तीन और चार सीटों पर चार मुस्लिम उम्मीदवार आमने-सामने हैं। इस बार इन सीटों पर किसका पलड़ा भारी होगा, चुनाव विश्लेषक इसे वोटिंग प्रतिशत और मुस्लिम वोटरों के रुझान के हिसाब से आंकने की कोशिश कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक कुमार पंकज कहते हैं कि दरअसल, इन 55 सीटों पर 18 सीटों पर 40 से 55 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। इनमें से 8 सीटें ऐसी हैं जहां 55 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं, जबकि 10 सीटों पर 40-50 फीसदी के बीच मुस्लिम वोटर हैं। बाकी 37 सीटों पर जीत-हार के आंकड़े हिंदू वोटर तय करते हैं।

2012 और 2017 में गणित कैसे बदल गया

2012 में यूपी में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ समाजवादी पार्टी की सरकार बनी थी। तब सपा ने इन 55 में से 40 सीटों पर जीत हासिल की थी. बसपा, जो उस समय मुख्य विपक्षी दल थी, ने इन 55 में से 8 सीटों पर जीत हासिल की थी, और भाजपा ने केवल 4 सीटें जीती थीं। कांग्रेस के खाते में 3 सीटें थीं. 2017 में बीजेपी ने इन 55 में से 38 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि 2012 में उसे सिर्फ 4 सीटें ही मिली थीं। यानी उन्हें 33 सीटों का फायदा हुआ था. 2017 में इस क्षेत्र में सपा को 24 सीटों का नुकसान हुआ था। बसपा को 8 और कांग्रेस को एक सीट का नुकसान हुआ था। सपा को यहां 55 में से 15 और कांग्रेस को मिलीं थी।

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