UP Election: करहल में एक लड़ाई लड़ी थी पृथ्वीराज चौहान ने, एक लड़ाई लड़ रहे अखिलेश
लखनऊ, 10 फरवरी। करहल, जिला मैनपुरी, उत्तर प्रदेश। करहल में एक लड़ाई लड़ी थी पृथ्वीराज चौहान ने। अब अखिलेश यादव भी 20 फरवरी को यहां एक लड़ाई लड़ेंगे। पृथ्वीराज चौहान ने संयोगिता के लिए युद्ध किया था। अखिलेश यादव राजनीति के लिए रणभूमि में हैं। अखिलेश यादव पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। करीब आठ सौ साल पहले करहल, भारत की करवट ले रही राजनीति का गवाह बना था।

संयोगिता के लिए पृथ्वीराज चौहान ने जयचंद से शत्रुता मोल ली थी। इस घटना ने पृथ्वीराज चौहान और दिल्ली के भविष्य को बदल दिया था। अखिलेश यादव इस लिए करहल से चुनाल लड़ रहे हैं ताकि वे उत्तर प्रदेश के सत्ता संग्राम में अपने पराक्रम को प्रमाणित कर सकें। क्या करहल में उनकी जीत से लखनऊ में सत्ता का स्वरूप बदलेगा ?

पृथ्वीराज चौहान और करहल
करहल विधानसभा क्षेत्र मैनपुरी जिले में है। मैनपुरी का सीमावर्ती जिला है कन्नौज। 12वीं शताब्दी में कन्नौज के राजा थे जयचंद। उनका शासनकाल 1170 से 1194 ईस्वी तक था। जयचंद को दो संतान थी। पुत्र हरिश्चन्द्र और पुत्री संयोगिता। दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान संयोगिता से प्रेम करते थे। जयचंद को ये बात पसंद नहीं थी। जयचंद ने संयोगिता के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था। भारत के वीर राजकुमारों को इस स्वयंवर में बुलाया गया था लेकिन पृथ्वीराज चौहान आमंत्रित नहीं थे। इस बात से नाराज हो कर पृथ्वीराज चौहान ने कन्नौज पर आक्रमण कर दिया। स्वयंवर स्थल को चारो तरफ घेर कर उन्होंने संयोगिता को बलपूर्वक उठा लिया। संयोगिता को लेकर पृथ्वीराज अपने सैनिकों के साथ दिल्ली लौटने लगे। जयचंद की सेना पृथ्वीराज का पीछा करने लगी। कन्नौज से निकल पृथ्वी राज चौहान मैनपुरी के करहल के पास पहुंचे थे। करहल में ही जयचंद की सेना ने पृथ्वीराज को घेर लिया। पृथ्वीराज के सेनापति मोटामल ने भांप लिया कि जयचंद की विशाल सेना के सामने उनके मुट्ठीभर सैनिक टिक नहीं सकते। तब मोटामल ने पृथ्वीराज चौहान के सलाह दी कि वे संयोगिता को यहां से लेकर चुपचाप निकल जाएं। मोटामल जयचंद के सैनिकों से मुकाबला करने लगे और पृथ्वीराज संयोगिता को लेकर दिल्ली कूच कर गये। करहल की लड़ाई में मोटामल वीरगति को प्राप्त हुए। दिल्ली पहुंचने पर पृथ्वीराज चौहान को जब ये बात मालूम हुई तो वे बहुत दुखी हुए। पृथ्वीराज ने शहीद मोटामल की याद में करहल में एक मंदिर का निर्माण कराया। मोटामल मंदिर आज भी करहल में मौजूद है। यहां होली के बाद दो दिनों तक प्रसिद्ध मेला लगता है।

मुलायम सिंह का करहल कनेक्शन
आधुनिक करहल का मुलायम सिंह यादव के जीवन से गहरा जुड़ाव है। मुलायम सिंह यादव का पैतृक गांव सैफई इटावा जिले में है। इटावा भी मैनपुरी का सीमावर्ती जिला है। सैफई से करहल की दूरी मात्र करीब 5 किलोमीटर है। मुलायम सिंह यादव ने करहल के जैन इंटर कॉलेज से पढ़ाई की है। 1959 में उन्होंने इंटर की परीक्षा पास की थी। 1963 में मुलायम सिंह यादव को करहल इंटर कॉलेज में ही सहायक शिक्षक की नौकरी मिल गयी। तब उनका वेतन था 120 रुपये महीना। 1967 में वे राजनीति में आये और जसवंत नगर से संसोपा के टिकट पर विधायक चुने गये। अब 2022 में मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव करहल से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने करहल को सबसे सुरक्षित सीट मान कर ही यहां से किस्मत आजमायी है। करहल में करीब 1 लाख 44 हजार यादव वोटर हैं। इनकी तादात कुल वोटरों का 38 फीसदी है। इस सीट पर समाजवादी धारा के दल का दबदबा रहा है। मौजूदा विधायक सोबरन सिंह 2007,2012 और 2017 में यहां से लगातर तीन बार सपा के टिकट पर जीते हैं। सोबरन सिंह ने 2002 में पहली बार भाजपा के लिए करहल सीट जीती थी।

करहल में अखिलेश को टक्कर दे रहे भाजपा के एसपी सिंह बघेल
करहल मैनपुरी जिले में है और मुलायम सिंह यादव मैनपुरी के मौजूदा सांसद हैं। इसलिए कुछ लोग करहल में अखिलेश की जीत का दावा कर रहे हैं। करहल में अखिलेश यादव को टक्कर देने के लिए केन्द्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल मैदान में उतरे हैं। वे अभी आगरा से सांसद हैं। एसपी सिंह बघेल उत्तर प्रदेश पुलिस में दारोगा पद पर बहाल हुए थे। फिर वे मुलायम सिंह यादव के सुरक्षा दस्ते में शामिल हुए। इसके बाद वे कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते गये। एक दारोगा से केन्द्रीय मंत्री बनने तक का सफर, उनकी क्षमता को साबित करता है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आप पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को करहल सीट (यादव बहुल) पर टक्कर दे पाएंगे ? तो उन्होंने जवाब दिया, क्या आप करहल में पहले से सपा उम्मीदवार की जीत तय मान रहे हैं ? अगर ऐसा दावा कर रहे हैं तो यह जनता का अपमान होगा । क्या राजशाही है कि राजा का बेटा ही राजा बनेगा ? अब विजेता का फैसला ईवीएम से होगा जिसका बटन जनता दबाएगी। मैं मुलायम सिंह जी के साथ रहा। लेकिन कभी निजी फायदे के लिए काम नहीं किया। भाजपा ने करहल चुनाव को गंभीरता से लिया है। एक केन्द्रीय मंत्री को विधानसभा चुनाव में उतार कर पार्टी ने यह संदेश दिया है कि वह यहां से चुनाव जीतना चाहती है। जब अमेठी में राहुल गांधी का किला ढह सकता है तो करहल में सपा का किला क्यों नहीं ढह सकता? क्या मुलायम जी के परिवार के लोग चुनाव नहीं हार रहे ? 2019 में डिंपल यादव कन्नौज से चुनाव हार गयी। बदायूं में धर्मेंद्र यादव और फिरोजबाद में अक्षय यादव हार गये थे। 2009 में जिस फिरोजबाद सीट पर अखिलेश यादव जीते थे वहां चार महीने बाद हुए उपचुनाव में डिंपल यादव हार गयीं थीं। जब मुलायम सिंह यादव की बहू और भतीजे चुनाव हार सकते हैं तो उनके पुत्र क्यों नहीं हार सकते ? राजनीति में कोई अपराजेय नहीं है।
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