बिहार के मुकेश सहनी की तरह ही हो सकता है यूपी में संजय निषाद का हश्र, ये है बीजेपी की मास्टर प्लानिंग

लखनऊ, 24 अगस्त: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है। चुनाव की आहट सुनाई देते ही छोटे छोटे दल भी अब अपनी पॉवर पालिटिक्स में जुटे हुए हैं। यूपी की निषाद पार्टी भी अपने आपको पूरे यूपी में होने का दावा ठोक रही है और उसने बीजेपी के सामने मजबूती से अपनी दावेदारी भी पेश की है। लेकिन क्या बीजेपी निषाद पार्टी को उतनी अहमियत देगी जितनी वो दावा कर रही है या फिर भजापा अपने उसी रणनीति पर आगे बढे़गी जो उसने बिहार में विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के अध्यक्ष मुकेश सहनी के साथ आजमाया था।

 उत्तर प्रदेश

दरअसल, यूपी में विधानसभा चुनाव में अभी लगभग सात महीने बाकी हैं उससे पहले ही भाजपा पर छोटी पार्टियों का दबाव बढ़ने लगा है। दबाव की राजनीति में अनुप्रिया पटेल की अपना दल तो सफल हो गई लेकिन निषाद पार्टी को उसके मनमुताबिक चीजें नहीं मिलीं। इसी को लेकर निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर संजय निषाद ने जब बीजेपी आलाकमान पर दबाव बनाया तो उनके साथ दिल्ली में बैठक हुई। बैठक में संगठन और सरकार दोनों के शीर्ष लोग मौजूद थे। बैठक में संजय निषाद को आश्वासन मिला था कि जल्द ही उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा। हालांकि बीजेपी के सूत्र बताते हैं कि संजय निषाद के साथ भी वही खेल हो सकता है, जो बिहार में मुकेश सहनी के साथ हुआ था।

निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने कहा,

''विधानसभा सीटों को लेकर भाजपा के साथ अगली बैठक में सब तय हो जाएगा। भाजपा के सामने हमने उतनी सीटों की डिमांड की है जितना हम जीत सकते हैं। उनको जो लगेगा वो फैसला करेंगे। यूपी में हम अपने सिंबल पर ही चुनाव लड़ेगे और बीजेपी के कुछ उम्मीदवारों को भी अपने सिंबल पर लड़ाएंगे। जहां हमारी स्थिति कमजोर होगी वहां हम बीजेपी के उम्मीदवार को उतारेंगे।''

संजय निषाद को मुकेश सहनी की तरह ही घेरना चाहती है

भाजपा के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि यह पार्टी को तय करना है कि निषाद पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी। अब वो खुद कह रहे हैं कि भाजपा के कई उम्मीदवार निषाद पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे तो उनकी इस बारे में संगठन के नेताओं से बात हुई होगी। बीजेपी के वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, '' आप संजय निषाद को मुकेश सहनी के साथ जोड़कर मत देखिए। बिहार की चुनावी गणित अलग थी यूपी की अलग है। यहां की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ा जाएगा। हां यह जरूर है कि कुछ सीटों पर हमारे उम्मीदवार उनके सिंबल पर लड़ेंगे लेकिन यह तो आपसी सहमति से तय होगा।''

भाजपा के सूत्रों की माने तो उसकी रणनीति यह है कि संजय निषाद को जो सीटें दी जांए उनमें ज्यादातर पर अपने उम्मीदवार उनके सिंबल पर उतारे जाएं। इससे निषाद पार्टी का लेबल भी रहेगा और निषाद समुदाय का वोट मिलने के साथ ही बीजेपी का वोट भी उन उम्मीदवारों को मिल जाएगा। हालांकि निषाद पार्टी के उम्मीदवारों पर बीजेपी का वोट ट्रांसफर होगा या नहीं इस सवाल पर भाजपा के रणनीतिकार चुप्पी साध जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि चुनाव नजदीक आते ही भाजपा के ऐसे उम्मीदवारों को निषाद पार्टी में शामिल कराया जाएगा जो उनके सिंबल पर चुनाव लड़ेगे।

बिहार में मुकेश सहनी को भाजपा ने दी थी 11 सीटें

बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने वीआईपी को अपने कोटे से 11 सीटें दी थी और मुकेश सहनी को विधान परिषद की सीट भी देने का वादा किया था। उन 11 सीटों में ज्यादतार सीटों पर बीजेपी ने ही अपनी रणनीति के तहत अपने उम्मीदवारों को ही चुनाव लड़वाया था। मुकेश सहनी के अलावा उनके तीन सगे संबंधी ही चुनाव में उतरे थे। नतीजा यह हुआ कि मुकेश सहनी खुद तो चुनाव हारे ही उनके जो उम्मीदवार मैदान में उतरे थे वो भी हार गए। लेकिन भाजपा ने जिन उम्मीदवारों को वीआईपी के कोटे से उतारा था उनमें चार लोग चुनाव जीतने में सफल हो गए। अब स्थिति यह है कि वो चार लोग मुकेश सहनी से ज्यादा बीजेपी के नेताओं की ही सुनते हैं।

योगी सरकार ने मुकेश सहनी को एयरपोर्ट से लौटा दिया था

इससे पहले, बिहार सरकार में मंत्री और विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुकेश सहनी भी यूपी की पालिटिक्स में उतरना चाहते थे। उन्होंने यूपी के 18 शहरों में फूलन देवी की प्रतिमा लगवाने का भी ऐलान किया था लेकिन जब वह बनारस एक कार्यक्रम में पहुंचे थे तो प्रशासन ने उन्हें एयरपोर्ट से ही बैरंग वापस लौटा दिया था। वह यूपी में भी अपनी पार्टी का विस्तार करना चाहते थे।

दरअसल यूपी में हाईकोर्ट ने किसी भी महापुरुष की मूर्ति स्‍थापित करने पर रोक लगा रखी है। इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए खुद यूपी सरकार ने ही अर्जी लगाई है, लेकिन उस पर अब तक कोई फैसला नहीं आया है। यूपी के से वापस लौटाए जाने के बाद सहनी ने योगी को लेकर तल्ख बयान दिए थे। एनडीए के गठबंधन में उनकी पार्टी को सम्मान नहीं मिल रहा है। लेकिन भाजपा ने उनके इस बयान पर ध्यान नहीं दिया था।

पार्टी टूटने का खतरा बना रहेगा

हालांकि राजनीतिक विश्वलेषकों की माने तो निषाद पार्टी को भाजपा अपनी पिच पर लाकर समझौता कराना चाहती है। जब भाजपा के ही उम्मीदवार निषाद पार्टी के सिंबल पर लड़ेगे तो यह तो खतरा बना ही रहेगा कि चुनाव में यदि भाजपा से बाहर गए उम्मीदवार ज्यादा जीत गए तो वहां भी भाजपा का ही पलड़ा भारी होगा और बीजेपी का आलाकमान अपने मनमुताबिक संजय निषाद को डील करेगा या फिर चुनाव के बाद पार्टी के टूटने का भी खतरा बना रहेगा।

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