यूपी में क्यों हो रहा है बिजली का निजीकरण, कर्मचारियों ने किया बड़ा खुलासा
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के पांच शहरों में बिजली कंपनी को प्राइवेट कंपनी के हाथों देने के सरकार के फैसले का सरकारी कर्मचारी जमकर विरोध कर रहे हैं। कर्मचारियों का दावा है कि सरकार ने बिजली कंपनी का निजीकरण करने का फैसला इसलिए लिया है क्योंकि बिजली विभाग में घाटे की वजह खुद सरकार है। यूपी सरकार के तमाम दफ्तरों, मंत्रियों, विधायकों का करीब 1000 करोड़ रुपए का बकाया है। बिजली कंपनी के निजीकरण के सरकार के फैसले के खिलाफ कर्मचारियों ने मोर्चा खोल दिया है।

कर्मचारी हड़ताल पर
कर्मचारियों ने सरकार के फैसले के खिलाफ आंदोलन का ऐलान कर दिया है। कर्मचारियों ने ऐलान किया है कि वह 9 अप्रैल से 72 घंटे काम करके अपना विरोध दर्ज कराएंगे। सरकार के फैसले के बाद से ही इन तमाम शहरों के बिजली कर्मचारी आंदोलन कर रहे हैं और उन्होंने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। कर्मचारियों का कहना है कि विभाग की इस दुर्दशा के लिए खुद सरकार जिम्मेदार है, लेकिन हमे इसका परिणाम भुगतना पड़ रहा है।

करोड़ों का बकाया
आंकड़ों के अनुसार लखनऊ स्थित सरकारी वीआईपी गेस्ट हाउस पर 26400000 रुपए, मल्टी स्टोर मंत्री आवास पर 14700000 रुपए, स्पीकर पर 1264000 रुपए, खेल मंत्री चेतन चौहान पर 1772000 रुपए, बिजली मंत्री श्रीकांत शर्मा पर 651000 रुपए, कृषि मंत्री पर 928000 रुपए, केशव प्रसाद मौर्या र 1080000 रुपए, सुरेश खन्ना पर 920000 रुपए, सतीश महाना पर 783000 रुपए, राजेश अग्रवाल पर 900000 रुपए बकाया है।

पूंजीपतियों के लिए हुआ फैसला
कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि बिजली कंपननी का निजीकरण पूंजीपतियों को लाभ पहु्ंचाने के लिए हो रहा है। ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे ने बताया कि 21 से 22 फरवरी को लखनऊ में हुई इंवेस्टर्स समिट में ही यह तय हो चुका था कि किस उद्योगपति को बिजली का काम देना है। मुझे खुद इस बात की जानकारी आला अधिकारियों ने दी थी। इससे साफ है कि यह सबकुछ उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है।
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