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UP Panchayat Chunav:सपा को बढ़त और भाजपा को झटका, 2022 लिए क्या कहते हैं ये नतीजे ?

लखनऊ, 7 मई: उत्तर प्रदेश जब कोविड की दूसरी लहर की चपेट में बुरी तरह से आ चुका था, उसी दौरान राज्य में पंचायत चुनाव करवाए गए। इन चुनावों में यूपी की मुख्य विपक्षी सपा ने अच्छी कामयाबी हासिल की है, जबकि सत्ताधारी भाजपा को उसके अपने ही गढ़ो में जोरदार झटका लगा है। बसपा भी ग्रामीण यूपी में खुद को तीसरी शक्ति के तौर पर स्थापित करने में सफल रही है। जहां तक कांग्रेस की बात है तो प्रियंका गांधी वाड्रा की ट्विटर पॉलिटिक्स का रंग पूरी तरह से फीका नजर आया है और राज्य की ग्रामीण जनता सबसे पुरानी पार्टी को जरा भी भाव देने के लिए तैयार नहीं दिखी है। जिला पंचायत की 3,050 सीटों में से समाजवादी पार्टी को 782 सीटें मिली हैं, जबकि सत्ताधारी भाजपा सिर्फ 580 सीटें ही जीत सकी है। बीएसपी समर्थित उम्मीदवारों ने 336 सीटों पर कब्जा किया है। वहीं 1989 में राज्य की सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस 61 सीटों पर सिमट कर रह गई है। राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और पंचायत चुनावों के परिणाम को ग्रामीण यूपी की जनता के मूड को उसी का संकेत माना जा रहा है। लेकिन, क्या यह कह देना इतना आसान है? या फिर इसमें कुछ और भी संकेत छिपे हुए हैं, जिसे परखना बहुत जरूरी है।

क्या विधानसभा चुनावों के लिए है संकेत ?

क्या विधानसभा चुनावों के लिए है संकेत ?

उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव को भारतीय जनता पार्टी के लिए इसलिए झटका माना जा सकता है कि उसके समर्थित उम्मीदवार समाजवादी पार्टी से काफी कम सीटें जीत पाए हैं। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उससे बड़े झटका भगवा पार्टी के लिए यह है कि उसने अयोध्या-काशी-मथुरा की धरती पर भी विपक्ष से मात खाई है, जो कि उसके हिंदुत्व के एजेंडे की सबसे बड़ी खुराक रही है। लेकिन, नतीजों का दूसरा और बहुत ही हैरान कर देना वाला पहलू ये है कि पश्चिमी यूपी के इलाके में उसने विपक्ष की घेराबंदी को तोड़ दिया है। क्योंकि यह वही जाट लैंड का इलाका है जो कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान आंदोलन के दिग्गज नेताओं का गढ़ है। पंचायत चुनाव के परिणाम में एक और खास बात नजर आ रही है कि इसमें जीतने वाले 1,266 उम्मीदवार या तो निर्दलीय हैं या वह किसी भी पार्टी से संबंधित नहीं हैं। यही नहीं है, ये भी कहा जा रहा है कि जीतने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की बहुत बड़ी संख्या बीजेपी के ही बागियों की है और उनका दोबारा पार्टी में वापसी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

अवध का 'नरेश' कौन ?

अवध का 'नरेश' कौन ?

अगर यूपी के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के चुनाव परिणामों का उसी आधार पर विश्लेषण करें तो तस्वीर कुछ ज्यादा साफ हो सकती है। अवध की 760 जिला पंचायत की सीटों में से सपा 213 सीटें जीत गई है यानी यहां की 28.03 फीसदी सीटों पर उसका कब्जा हुआ है। भाजपा उससे करीब 10 फीसदी सीटें पीछे है। पार्टी यहां सिर्फ 139 सीटें जीती है (18.29%)। बसपा को 63 (8.29%) और अन्य को 326 (43.42%) सीटें मिली हैं। साफ है कि सपा ने बीजेपी को उसके गढ़ में भी मात दी है। प्रियंका गांधी वाड्रा को प्रदेश की प्रभारी महासचिव बनाने के बाद अगर कांग्रेस को किसी क्षेत्र से सबसे ज्यादा उम्मीद हो सकती थी तो वह यही क्षेत्र था, जिसे नेहरू-गांधी परिवार का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन, पार्टी ने सिर्फ 2 फीसदी सीटें (15 सीट) लेकर अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर दिया है। वैसे कांग्रेसी आलाकमान को यह जरूर समझा सकते हैं कि इस 2 फीसदी के आंकड़े को प्रदेश के लगभग सभी 6 क्षेत्रों में उन्होंने कहीं पर भी कमजोर नहीं पड़ने दिया है! अब अवध क्षेत्र के तीन जिला पंचायतों का रिजल्ट देख लेते हैं। मसलन, अयोध्या में जिला पंचायत की 40 सीटों में से बीजेपी को सिर्फ 8 सीटें मिली हैं, जहां बन रहे भव्य राम मंदिर की बदौलत वह अखंड भारत बनाने का सपना बुनती आई है। जबकि, सपा को 24 और बसपा को 4 सीटें मिली हैं। 4 सीटों पर निर्दलीयों को जीत मिली है। रायबरेली, जहां से सोनिया गांधी सांसद हैं, वहां का प्रदर्शन कांग्रेस के दरबारियों को निजी तौर पर चुभ सकता है। जिला पंचायत की 52 में से 27 सीटों पर बीएसपी जीती है तो बीजेपी और एसपी ने 9-9 सीटें जीती हैं। कांग्रेस 7 पर ही सिमट गई है। पड़ोस की अमेठी में जहां पर राहुल गांधी को हराकर स्मृति ईरानी सांसद बनी थीं, वहां 36 में से बीजेपी को सिर्फ 8 सीटें मिली हैं और सपा 9 पर जीतने में सफल रही है। बीएसपी को 3 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली हैं और 14 अन्यों के खाते में गई हैं।

पूर्वांचल में कैसा रहा चुनाव परिणाम ?

पूर्वांचल में कैसा रहा चुनाव परिणाम ?

अगर पूर्वांचल की बात करें तो यहां का परिणाम लखनऊ से दिल्ली तक बीजेपी को परेशान करने वाला है। क्योंकि, गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ है तो काशी ना सिर्फ हिंदुत्व का सबसे बड़ा प्रतीक है, बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन, पूर्वांचल के 878 जिला पंचायत सीटों में से 202 (23%) पर सपा समर्थित उम्मीदवारों का कब्जा हो गया है तो 426 (48.52%)सीटें निर्दलीयों या अन्य उम्मीदवारों के खाते में गई हैं। बीजेपी सिर्फ 134 (15.26%) सीट जीत सकी है और बीएसपी को 95 (10.82%) सीटें मिली हैं। जहां तक गोरखपुर जिला पंचायत की बात है तो यहां की 68 सीटों में से 20 सीट जीतकर बीजेपी यह सोचकर राहत महसूस कर सकती है कि सपा को सिर्फ 19 सीटें ही मिली हैं। 26 पर निर्दलीयों, 2 पर बीएसपी और 1 पर कांग्रेस का कब्जा हुआ है। लेकिन, बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी का परिणाम भगवा दल को निराश करने वाला है। यहां कि कुल 40 जिला पंचायत सीटों में से पार्टी सिर्फ 7 सीटें ही जीत सकी है, जबकि सपा 15 सीटें जीतकर सबसे आगे रही है। बीएसपी को 5 और निर्दलीयों को 8 सीटें मिली हैं। वहीं आजमगढ़ में जहां से पूर्व सीएम अखिलेश यादव सांसद हैं, वहां उनकी पार्टी अपनी विरोधियों से आगे रही है। यहां की कुल 84 सीटों में से सपा को 25 और बीएसपी को 14 सीटें मिली हैं। वहीं बीजेपी सिर्फ 10 सीटें ले पाई है। हालांकि, यहां भी अन्यों का ग्राफ ज्यादा बड़ा है और उनके खातों में34 सीटें गई हैं।

निचले दोआब सपा का शानदार प्रदर्शन

निचले दोआब सपा का शानदार प्रदर्शन

प्रदेश के निचले दोआब का इलाका मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है और पंचायत चुनावों में भी उसकी छाप स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ी है। यहां कि 386 जिला पंचायत सीटों में से सपा 140 (36.27%) सीटें जीती है। वहीं बीजेपी सिर्फ 66 सीटों (17.1%) पर ही जीत दर्ज कर पाई है। बीएसपी को 27 सीटें (6.99%) मिली हैं, लेकिन निर्दलीयों का जलवा यहां भी कायम है। वो 146 (37.82%) सीटें जीतने में सफल रहे हैं। अगर एक दशक पहले तक की बात करें तो पूर्वांचल और निचले दोआब में बीएसपी ही समाजवादी पार्टी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होती थी। इस इलाके का इटावा मुलायम परिवार का गृह जिला है और पंचायत चुनाव में उसका प्रभाव भी पूरी तरह से दिख रहा है। यहां कि 24 सीटों में से 18 पर सपा समर्थक उम्मीदवारों को जीत मिली है। बीजेपी-बीएसपी तो एक-एक सीट ले भी पाई है, लेकिन कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला है। अन्यों के कब्जे में सिर्फ 4 सीटें गई हैं। हालांकि यहीं कि जिस मैनपुरी सीट से मुलायम सांसद हैं, वहां की 30 में से सपा सिर्फ 16 ही जीती है। बीजेपी ने 8 तो अन्यों ने 5 सीटें जीत हैं। यहां कांग्रेस को भी एक सीट मिली है। इसी तरह से कन्नौज जिला परिषद (कुल 28 सीट) में भी सपा और निर्दलीय उम्मीदवारों को बराबर सीटें मिली हैं और बीजेपी उनसे काफी पीछे रह गई है। सपा-निर्दलीय को 10-10, बीजेपी को 6 और बीएसपी को 2 सीटें मिली हैं। कन्नौज लोकसभा सीट भी मुलायम परिवार की सीट मानी जाती है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सुब्रत पाठक ने उनकी बहू डिंपल यादव को यहां हरा दिया था।

रोहिलखंड में कड़ी लड़ाई, सपा फिर भी आगे

रोहिलखंड में कड़ी लड़ाई, सपा फिर भी आगे

रोहिलखंड का परिणाम भी सपा के लिए अच्छी खबर लेकर आया है। यहां की 356 सीटों में से सपा को 99 (27.81%) सीटें मिली हैं। इसके अलावा बीजेपी को 84 (23.6%), बीएसपी को 38 (10.67%) और निर्दलीयों को 127 (35.67%) सीटें मिली हैं। कांग्रेस यहां किसी तरह 8 सीटें ले पाने में कामयाब रही है। हालांकि, यहां के रामपुर जिला पंचायत के परिणाम पर नजर डाल लेना दिलचस्प है, जहां से दिग्गज सपाई और जेल में बंद मुस्लिम नेता आजम खान सांसद हैं। यहां कि 34 जिला पंचायत सीटों में से एसपी को 11, बीजेपी को 7, निर्दलीयों को 11, कांग्रेस को 3 और बीएसपी को 2 सीटें मिली हैं।

बुंदेलखंड में सपा पर भाजपा को बढ़त

बुंदेलखंड में सपा पर भाजपा को बढ़त

बुंदेलखंड में जिला पंचायत की 148 सीटें हैं। उनमें से बीजेपी ने 38 (25.68%), एसपी ने 33 (22.3%), बीएसपी ने 26 (17.57%) और निर्दलीयों ने 45 (33.11%) सीटें जीती हैं। यहां पर कांग्रेस को 2 सीटें मिली हैं। बुंदेलखंड वही इलाका है, जहां के विकास के लिए यूपी सरकार के साथ-साथ केंद्र की मोदी सरकार ने भी पूरा जोर लगाया है और कई परियोजनाएं दी हैं।

किसान आंदोलन के गढ़ में बीजेपी सभी पार्टियों से आगे

किसान आंदोलन के गढ़ में बीजेपी सभी पार्टियों से आगे

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पड़ने वाले ऊपरी दोआब का इलाका कृषि कानूनों के खिला में चल रहे राजनीतिक रूप से संवेदनशील किसान आंदोलन का केंद्र बना हुआ है। यहीं से जाकर राकेश टिकैत दिल्ली से सटे यूपी बॉर्डर पर आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं। लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से किसानों के विरोध के बावजूद बीजेपी ने यहां सभी दलों पर बढ़त पाने में सफलता पा ली है। जबकि, टीवी डिबेट में आने वाले कई राजनीतिक विश्लेषकों को लगता था कि भाजपा का तो इस क्षेत्र में सूपड़ा ही साफ होने वाला है। सबसे बड़ी बात ये है कि यहां से आया चुनाव परिणाम बीजेपी विरोधियों के लिए ही नहीं किसान आंदोलन की अगुवाई करने वाले किसान नेताओं के लिए भी बहुत बड़ा झटका साबित हो रहा है। इस इलाके के गौतम बुद्ध नगर, हापुड़, बागपत, बुलंदशहर से सहारनपुर तक से किसान आंदोलन को हवा मिली है। लेकिन, पंचायत चुनाव का परिणाम अलग ही तस्वीर पेश कर रहा है। यहां कि 522 जिला पंचायत की सीटो में से बीजेपो को 119 (22.8%) सीटें मिली हैं। वहीं सपा को 95 (18.20%), बीएसपी को 87(16.67%) और निर्दलीयों को 196 (40.8%) सीटें मिली हैं। कांग्रेस ने 2 फीसदी(8 सीट) प्रदर्शन वाला हिसाब यहां भी बरकरार रखा है।

इस क्षेत्र के अलग-अलग इलाकों के परिणामों को देखने से काफी कुछ संकेत मिल रहा है। मसलन, इसको देखकर लगता है कि पश्चिमी यूपी में जाटव वोट बैंक पर मायावती का दबदबा अब भी कायम है। मथुरा जैसे बीजेपी के गढ़ में भी वह उससे आगे निकली है और 33 में से 13 सीटों पर कब्जा किया है। बीजेपी को 8 और एसपी को सिर्फ 1 सीट मिली है। 11 सीटें निर्दलीयों को मिली हैं और कांग्रेस खाता भी नहीं खोल सकी है। सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील और किसानों के लिए अहम मुजफ्फरनगर की 43 में से 13 सीटों पर बीजेपी जीती है और बीएसपी को 3 सीटें मिली हैं। वहीं निर्दलीयों का 27 सीटों पर कब्जा हुआ है। यहां सपा और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला है। मतलब साफ है कि यूपी के ग्रामीण वोटरों के मूड से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को बहुत बड़ी सबक लेने की जरूरत है। लेकिन, विपक्षी दलों के लिए भी ज्यादा गदगद होने का कारण नहीं है, क्योंकि यह बहुत ही लोकल स्तर पर लड़े जाने वाले चुनाव हैं, जहां दलों पर व्यक्तिगत हित और छवि ज्यादा भारी पड़ती है। (आंकड़ों का स्रोत- सी वोटर)

रसगुल्ले बांटने पर फंस गए, दो गिरफ्तार

रसगुल्ले बांटने पर फंस गए, दो गिरफ्तार

बता दें कि यूपी में चार स्तरीय पंचायत निकायों के चुनाव करवाए गए हैं- ग्राम पंचायत, ग्राम प्रधान, ब्लॉक पंचायत और जिला पंचायत। हालांकि, यह चुनाव पार्टियों ने अपने चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़े हैं, लेकिन अपने समर्थक उम्मीदवारों के पक्ष में खुलकर प्रचार किया है और उसे मैनेज भी किया है। उधर यूपी पंचायत चुनाव के दौरान कोरोना नियमों की जिस तरह से उम्मीदवारों और उनके समर्थकों ने कई बार धज्जियां उड़ाईं, परिणाम आने के बाद भी उसका सिलसिला थमा नहीं है। बुधवार को कुछ ऐसा ही देखने को मिला हापुड़ में, जहां पुलिस ने 20 किलो रसगुल्ले के साथ दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया। उनपर आरोप है कि वह कोविड नियमों को ताक पर रखकर पंचायत चुनाव जीतने की खुशी में भीड़ इकट्ठा कर रसगुल्ले बांट रहे थे। इन पर सीआरपीसी की धारा 144 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

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