UP Nikay Chunav: तीन दशकों से रहा है Agra Mayor Seat पर बीजेपी का कब्जा, क्या इस बार बदलेगा इतिहास
Agra Mayor Seat पर इस बार किस पार्टी को जीत मिलेगी। बीजेपी का परचम लहराएगा या विपक्ष के दांव से बीजेपी का किला धराशायी होगा। इसके जवाब के लिए आपको अभी इंतजार करना पड़ेगा।

Agra Mayor Seat: उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव का बिगुल बज गया है। निकाय चुनाव के पहले चरण का मतदान 4 मई को होना है। आगरा की मेयर सीट पर एक बार फिर महिला मेयर चुनी जाएगी। इस सीट के पिछले इतिहास पर गौर करें तो पिछले 32 सालों से बीजेपी का कब्जा है। तीन दशकों में यूपी में चाहे जिसकी सरकार रही हो लेकिन मेयर की कुर्सी पर बीजेपी के उम्मीदवार का ही कब्जा रहा है। अब देखना यह है कि क्या इस बार समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस बीजेपी के इस गढ़ में सेंध लगा पाएंगी या नहीं।
बीजेपी ने हेमलता दिवाकर तो बीएसपी ने लता बाल्मिकी पर लगाया दांव
सभी राजनीतिक दलों ने आगरा में मेयर प्रत्याशियों का ऐलान कर दिया है। बीजेपी ने जहां पूर्व विधायक हेमलता दिवाकर कुशवाहा पर दांव लगाया है। दो गुटों की लड़ाई में हेमलता की लॉटरी निकल गई थी और अंतिम दौर में उनका नाम शामिल किया गया था। हेमलता 2017 से 2022 तक विधायक भी रह चुकी हैं। वहीं बसपा ने लता बाल्मिकी को अपना उम्मीदवार बनाया है। लता बामसेफ की सक्रिय सदस्य मानी जाती हैं। बसपा के पैनल में महापौर के लिए दस नाम शामिल किए गए थे जिनमें बाल्मिकी को यह टिकट दिया गया।
कांग्रेस ने लता कुमारी तो सपा ने जूही प्रकाश को मैदान में उतारा
इसके अलावा कांग्रेस ने आगरा महापौर का टिकट लता कुमारी को दिया है। लता एक रिटायर्ड शिक्षक हैं और पांच लोगों की दावेदारी के बीच लता ने यह टिकट हासिल किया था। वहीं बीजेपी की प्रतिद्वंदी पार्टी समाजवादी पार्टी ने जूही प्रकाश को मैदान में उतारा है। 31 साल की जूही ने एमबीए किया है और पिछले कई सालों से वह पूर्व सीएम अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव की टीम से जुड़ी हुई हैं। वह सपा की अंबेडकर वाहिनी की पूर्व राष्ट्रीय सचिव भी हैं।
तीन दशकों से बीजेपी का है मेयर सीट पर कब्जा
रिकॉर्ड के मुताबिक, बीजेपी ने 1989 के बाद से ताज शहर में एक भी मेयर का चुनाव नहीं हारा है। उस समय बीजेपी के उम्मीदवार रमेशकांत लवानिया इस पद के लिए चुने गए थे। आगामी शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के बाद शहर को तीसरी महिला मेयर मिलनी तय है। राज्य सरकार की हाल ही में जारी अधिसूचना में आगरा मेयर सीट अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय की महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित की गई है।
आगरा में बीजेपी ने 1989 के बाद नहीं हारा चुनाव
दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी ने 1989 के बाद से ताज सिटी में एक भी मेयर का चुनाव नहीं हारा है। 1995 में एससी महिलाओं के लिए सीट आरक्षित होने के बाद, बीजेपी का एक प्रमुख दलित चेहरा और अब राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री बेबी रानी मौर्य आगरा की पहली महिला मेयर बनीं। राजनीतिक ऊंचाइयों पर उनका उदय तेजी से हुआ और बाद में वह राज्य महिला आयोग की सदस्य बनीं। वह उत्तराखंड का राज्यपाल बनीं। लेकिन कुछ महीनों के बाद वहां से हटने के बाद उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया था।
बेबीरानी मौर्य और अंजुला महौर रह चुकी हैं आगरा से मेयर
बेबीरानी ने हालांकि एत्मादपुर आरक्षित सीट से भाजपा उम्मीदवार के रूप में असफल चुनाव लड़ने के बाद उन्होंने 2022 में आगरा ग्रामीण विधानसभा सीट जीती। भाजपा के किशोरी लाल महोर ने 2000 में महापौर का चुनाव जीता था जब यह सीट अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थी। 2006 में एससी महिलाओं के लिए आरक्षण की वजह से भाजपा की अंजुला सिंह माहौर की जीत सुनिश्चित हुई। वह मेयर के रूप में शहर की प्रमुख बनने वाली दूसरी महिला बनीं थीं। पिछले चुनाव में 2022 में भाजपा के टिकट पर हाथरस विधायक सीट जीती। 2012 में इंद्रजीत आर्य तो 2017 में महापौर चुनाव में नवीन जैन को प्रसिद्धि मिली। पिछली बार आगरा मेयर की सीट को अनारक्षित रखा गया था।
विपक्ष का बिखराव बन सकती है बीजेपी की जीत की वजह
राजनीतिक विष्लेषक राजीव रंजन सिंह कहते हैं कि विपक्ष का फैलाव, भाजपा का मजबूत संचार नेटवर्क और डबल इंजन वाली सरकार के प्रचार ने भाजपा की राह आसान कर दी है। भगवा पार्टी की जीत की लकीर को तोड़ने के लिए विपक्ष को एकजुट होने की जरूरत है, जिसने पिछले तीन दशकों में न केवल सभी महापौर चुनाव जीते हैं बल्कि अनुसूचित जाति समुदाय से महिला नेतृत्व को सफलतापूर्वक विकसित किया है। बीजेपी ने जिस तरह से इस सीट पर तीस सालों से अपना दबदबा बना रखा है उसे हटाना आसान नहीं होगा और वह भी ऐसे समय में जब वो यूपी में सरकार चला रही है।












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