UP: 2024 से पहले दलित एजेंडे को धार देगी अखिलेश-जयंत-चंद्रशेखर की तिकड़ी, महू से दिया सियासी संदेश
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव शुक्रवार को जब अम्बेडकर की जन्मस्थली महू पहुंचें तो उनके साथ उनके सहयोगी जयंत और चंद्रशेखर रावण भी नजर आए। इस तिकड़ी ने एक बड़ा सियासी संदेश देने की कोशिश की है।

Samajwadi Party chief Akhilesh Yadav Mhow Visit: उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। 2024 से पहले यूपी के निकाय चुनाव को एक लिटमस टेस्ट के तौर पर भी देखा जा रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के चीफ अखिलेश यादव जब 14 अप्रैल को इंदौर के महू में बाबा साहब अम्बेडकर की जन्मस्थली पहुंचे तो अखिलेश के साथ दलित नेता चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण और राष्ट्रीय लोकदल के चीफ जयंत चौधरी भी साथ में मौजूद थे। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इस तिकड़ी का एक साथ मिलना यह बताता है कि तीनों मिलकर 2024 से पहले दलित एजेंडे को धार देने की कवायद में जुटेंगे।
अखिलेश-चंद्रशेखर-जयंत का एक साथ दिखना नए समीकरण के संकेत
यूपी में निकाय चुनाव के बीच अंबेडकर की जन्मस्थली पर तीनों का एक साथ दिखना नए सियासी समीकरण के संकेत है। पश्चिमी में दलित वोटों को साधने की कवायद में अब ये तीनों मिलकर जुटेंगे। ऐसा माना जाता है कि पश्चिम के कई जिलों में चंद्रशेखर की अपनी फैन फालोइंग है जिसका लाभ अखिलेश को मिल सकता है। निकाय चुनाव में यदि ये तिकड़ी सफल रही तो अगले साल होने वाले 2024 के आम चुना में ये तीनों पश्चिम में बीजेपी के साथ ही बसपा के लिए बड़ी मुश्किल पैदा कर सकते हैं।
अखिलेश के महू दौरे को क्यों अहमियत दे रहे राजनीतिक थिंकर
हालांकि यूपी में अखिलेश के महू दौरे को राजनीतिक विश्लेषक अहमियत दे रहे हैं। एक राजनीतिक विष्लेषक राजीव रंजन सिंह कहते हैं कि संदेश न केवल शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए बल्कि 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए भी स्पष्ट है। इस बार, SP-RLD गठबंधन में चंद्रशेखर रावण शामिल रहेंगे, जो विशेष रूप से पश्चिम यूपी और पूरे राज्य में दलितों को जोड़ने के लिए अभियान चलाएंगे। इधर सपा के रणनीतिकार वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को लोहिया और अम्बेडकर के अनुयायियों को एक बार फिर साथ लाने के लिए अनुकूल सामाजिक माहौल के रूप में देख रहे है। उन्हें विश्वास है कि उनके प्रयासों के पहले से बेहतर परिणाम मिलेंगे।
दलितों से कनेक्ट होने के तीन प्रयास कर चुकी है सपा
समाजवादी पार्टी के नेता प्रोफेसर सुधीर पंवार कहते है कि, ''इस तरह के तीन प्रयास अतीत में किए गए हैं। पहला प्रयास 1956 में किया गया था जब भीमराव अंबेडकर और राम मनोहर लोहिया ने सामाजिक न्याय के लिए मिलकर काम करने के लिए एक बैठक की योजना बनाई थी। हालांकि, बैठक होने से पहले ही अम्बेडकर का निधन हो गया। 1992 में कांशीराम और मुलायम सिंह यादव एक हो गए। तीसरा प्रयास तब किया गया जब अखिलेश यादव ने मायावती के साथ गठबंधन किया। इस बार अंतर यह है कि अधिकांश दलितों का बसपा से मोहभंग हो यगा है। ''
2024 से पहले दलित वोट बैंक साधने की मची होड़
दरअसल दलितों के भीतर मायावती की पकड़ ढ़ीली होते देख सभी पार्टियों ने इस वोट बैंक को अपने पाले में लाने की कवायद तेज कर दी है। बीजेपी के अलावा कांग्रेस ने भी इस उद्देश्य से दलित नेता बृजलाल खाबरी को प्रदेश की कमान सौंपी है। इसके बाद अखिलेश ने भी अपनी रणनीतिक में चंद्रशेखर को शामिल किया है। संभवतः यह सपा उसी रणनीति का एक हिस्सा है जिसे 2021 में तैयार किया गया था जब अंबेडकर जयंती पर सपा प्रमुख ने बाबासाहेब वाहिनी के नाम से एक अलग शाखा बनाई थी।
सधी हुई रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे अखिलेश
दलितों के बीच पैठ बनाने की कवायद के तहत ही पार्टी मुख्यालय में दलित आइकन रहे नेताओं को श्रद्धांजलि देने का सिलसिला शुरू हुआ और बाद निर्देश दिया गया कि इस तरह के आयोजन जिला इकाइयों में भी किए जाएं। दलितों के बीच बड़ा संदेश देने के लिए ही अखिलेश ने अयोध्या के विधायक और दलित नेता अवधेश कुमार को राष्ट्रीय महासचिव के रूप में नियुक्त किया और विधानसभा में ठीक बगल में एक सीट हासिल दिलवाई। इसके बाद अखिलेश का रायबरेली में कांशीराम की प्रतिमा का अनावरण करना भी इसी रणनीति का हिस्सा था।












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