UP लोकसभा उपचुनाव: कैसे सपा के गढ़ में सेंध लगाने की भाजपा ने कर ली है तैयारी? जानिए
लखनऊ,6 जून: यूपी में लोकसभा की दो सीटों पर उपचुनाव होने हैं। यह दोनों सीट पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जीती थी। लेकिन, बदले माहौल में भाजपा को कम से कम आजमगढ़ को लेकर कुछ उम्मीदें नजर आ रही हैं और सपा ने उम्मीदवार तय करने में जितनी माथापच्ची की है, उसका भी यही कारण माना जा रहा है। आइए जानते हैं कि ऐसा क्या हुआ है कि बीजेपी को इस बार सपा के गढ़ में सेंध लगा देने की उम्मीद पैदा हुई है। बीते विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी कहीं भी रेस में नहीं दिखी थी, लेकिन आजमगढ़ सीट पर इसबार उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आजमगढ़ सपा को क्यों दे रहा है टेंशन ?
उत्तर प्रदेश की आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा सीटों पर 23 जून को उपचुनाव होने हैं। दोनों ही सीटें समाजवादी पार्टी की गढ़ हैं और दोनों पर उसी का कब्जा भी है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी इन दोनों ही क्षेत्रों की विधानसभा सीटों पर सपा ने अपनी साइकिल बिना रुकावट दौड़ाई है। लेकिन, फिर भी बदले हालातों में भाजपा ने खासकर आजमगढ़ से इस बार उम्मीदें लगा रखी हैं। भाजपा की रणनीति की एक वजह है कि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को आजमगढ़ से उम्मीदवार तय करने में काफी समय लगा है। सपा के समीकरण को दबाव में लाने में बसपा सुप्रीमो मायावती का खास रोल है, जिन्होंने उपचुनावों की घोषणा से काफी पहले ही प्रभावशाली मुस्लिम चेहरे शाह आलम गुड्डू जमाली को यहां से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था।

बसपा ने बढ़ा दी है अखिलेश की चिंता!
विधानसभा चुनावों से पहले गुड्डू जमाली ने टिकट नहीं मिलने की वजह से सपा छोड़ दी थी। उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम से भाग्य भी आजमाया लेकिन, नाकाम रहने के बाद बीएसपी में वापस लौट गए। समाजवादी पार्टी के एक नेता ने नाम नहीं बताने की गुजारिश करते हुए कहा है, 'उनको (आलम) उतारकर बीएसपी प्रमुख (मायावती) मुस्लिम वोट बांटना चाहती हैं.....जो बीजेपी के हित में है, जिसने फिर से भोजपुरी गायक दिनेश यादव निरहुआ को उतारा है।'

भाजपा को इस बार यादव उम्मीदवार पर पूरा भरोसा
2014 में आजमगढ़ लोकसभा सीट से प्रचंड मोदी लहर के बावजूद सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव चुनाव जीते था। तब गुड्डू जमाली ने बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था। 2019 में मुलायम मैनपुरी चले गए और आजमगढ़ से उनके बेटे अखिलेश यादव मैदान में उतरे। अखिलेश को यहां मुलायम से भी बड़ी जीत मिली और वे 60% वोटों के साथ संसद पहुंचे। जबकि, उनके खिलाफ चुनाव लड़े बीजेपी प्रत्याशी निरहुआ को 35.1% हासिल हुए। यानी भाजपा ने काफी सोच-समझकर फिर से निरहुआ पर दांव लगाया है, जो कि यादव तो हैं ही, आलम की उम्मीदवारी की वजह से पार्टी को उनसे इस बार उम्मीदें बढ़ गई हैं।

आजमगढ़ और रामपुर सीट रही है सपा की गढ़
सपा ने बीते विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र की 10 विधानसभा सीटों में सभी जीती हैं। इसलिए भाजपा इस बार बदले जमीनी समीकरण में इसको काफी प्राथमिकता दे रही है। एक बीजेपी नेता ने नाम नहीं जाहिर होने का अनुरोध कर कहा है, 'हम निरंतर विश्लेषण करते हैं कि कहां हम कमजोर हैं और कहां बेहतर करने की संभावना है। यह प्रक्रिया चलती रहती है, लेकिन अगर आप इतना पूछ रहे हैं ,तो हां आजमगढ़ उन सीटों में से है, जहां हम अपना प्रदर्शन सुधारना चाहते हैं; और इस उपचुनाव में हम अपना अवसर तलाशना चाहते हैं। ' आजमगढ़ में यादव, मुसलमान और दलित मतदाताओं की तादाद काफी अच्छी-खासी है और इनका वोट चुनाव को प्रभावित करने में सक्षम है।

रामपुर में आजम का ही चलेगा ?
वहीं रामुपर समाजवादी पार्टी के दिग्गज आजम खान का गढ़ है, जिन्होंने जेल से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद यहां की लोकसभा की सदस्यता छोड़ी है। बीएसपी ने यहां से अपना कोई उम्मीदवार नहीं दिया है और चुनाव के जानकार इसका आजमगढ़ के समीकरण से भी नाता जोड़ रहे हैं। लेकिन, बीजेपी ने यहां घनश्याम लोदी पर दांव लगाया है, जो कि आजम के पुराने भरोसेमंद रह चुके हैं। लोदी को भी विधानसभा चुनावों से पहले सपा से निकाल दिया गया था। रामपुर सीट से समाजवादी पार्टी ने आसिम रजा पर दांव लगाया तो आजमगढ़ से मुलायम परिवार के धर्मेंद्र यादव को टिकट दिया है।












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