Dudhwa Tiger Reserve के बफर जोन में 25 गिद्धों की मौत का खुला राज, 'कार्बोफ्यूरान' निकला कातिल
Uttar Pradesh Dudhwa Tiger Reserve 25 Vultures Death IVRI Report: उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर जोन में अप्रैल 2026 में हुई 25 गिद्धों की सामूहिक मौत का रहस्य सुलझ गया है। बरेली स्थित इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IVRI) की लैब रिपोर्ट ने पुष्टि कर दी है कि मौत का कारण कार्बोफ्यूरान नाम का अत्यंत विषैला कीटनाशक है, जिसे स्थानीय स्तर पर फ्यूराडान के नाम से जाना जाता है। यह घटना वन्यजीव संरक्षण के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गई है क्योंकि गिद्ध लुप्तप्राय प्रजाति हैं और पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण सफाईकर्मी माने जाते हैं।
7 अप्रैल 2026 को लखीमपुर खीरी जिले के भीरा रेंज अंतर्गत सेमराई (या सिमरिया) गांव के खेतों में 25 गिद्धों और कई कुत्तों के शव बरामद किए गए थे। कुछ गिद्धों को जिंदा लेकिन बेहोशी की हालत में बचाया गया। अब IVRI रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह सेकेंडरी पॉइजनिंग (दूसरे स्तर का जहर) का मामला था।

IVRI Report क्या कहती है?
IVRI के वैज्ञानिकों ने गिद्धों, कुत्तों के अंदरूनी अंगों (viscera) और घटनास्थल से बरामद चावल के नमूनों का विष-विश्लेषण (toxicological analysis) किया। रिपोर्ट में पाया गया कि सभी नमूनों में कार्बोफ्यूरान की घातक मात्रा मौजूद थी।
दुधवा बफर जोन की उप निदेशक कीर्ति चौधरी ने रिपोर्ट की पुष्टि करते हुए कहा, 'हमारा शुरुआती शक सेकेंडरी पॉइजनिंग का था, IVRI रिपोर्ट ने उसे साबित कर दिया। नमूनों में कार्बोफ्यूरान पाया गया जो गिद्धों की मौत का मुख्य कारण है।'
पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. दया शंकर ने बताया कि शवों में कोई संक्रमण या बैक्टीरिया नहीं मिला, जबकि कार्बोफ्यूरान की मात्रा अत्यधिक थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट (Post-mortem Report) रिपोर्ट और लैब टेस्ट दोनों ने जहर की पुष्टि की।
What Is Carbofuran, and why is it so dangerous?
कार्बोफ्यूरान एक कार्बामेट समूह का कीटनाशक है जो फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह बेहद तेज असर वाला जहर है, इतना कि छोटी मात्रा भी पक्षियों, स्तनधारियों और यहां तक कि इंसानों के लिए घातक साबित हो सकती है।
भारत में इसकी बिक्री और उपयोग पर कई प्रतिबंध हैं, फिर भी ग्रामीण इलाकों में अवैध रूप से उपलब्ध है। किसान अक्सर इसे चावल या अन्य चारे में मिलाकर आवारा कुत्तों या जंगली जानवरों को मारने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ कि जहर मिला चारा कुत्तों ने खाया, उनके शवों को गिद्धों ने खाया और वे भी मारे गए।
घटना का क्रम को समझें..
- 7 अप्रैल: गांववासी ने खेत में गिद्धों को गिरते और मरते देखा।
- वन विभाग की टीम पहुंची, शव बरामद किए।
- 6 गिद्धों को बचाया गया (उनका इलाज चल रहा था)।
- नमूने IVRI भेजे गए।
- मई 2026 में रिपोर्ट आई, कार्बोफ्यूरान पुष्टि।
संजय पाठक (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण में सदस्य सचिव) और बहराइच DFO सुंदरेश की टीम ने गांववालों और कीटनाशक विक्रेताओं से पूछताछ की। प्रारंभिक जांच में भी शक्तिशाली कीटनाशक का शक जताया गया था।
गिद्धों का पारिस्थितिकी में महत्व
गिद्ध भारत के 'प्राकृतिक सफाईकर्मी' हैं। एक गिद्ध प्रति दिन 1 किलो से ज्यादा सड़ते मांस खा सकता है। वे जानवरों की लाशों को साफ करके बीमारियां (जैसे एंथ्रेक्स, प्लेग) फैलने से रोकते हैं। 1990 के दशक में भारत में गिद्धों की संख्या में 99% की गिरावट आई थी, मुख्य कारण था- 'डाइक्लोफेनाक (पशुओं की दवा)'।
हिमालयन ग्रिफॉन गिद्ध (Gyps himalayensis) बड़े आकार के होते हैं और हिमालय से तराई क्षेत्रों में आते हैं। वे Wildlife Protection Act 1972 की Schedule-1 में हैं और IUCN की Critically Endangered श्रेणी में।
क्यों हुआ यह हादसा? संभावित कारण
- आवारा कुत्तों की समस्या: किसान फसलों की सुरक्षा या पशुधन बचाने के लिए जहर का सहारा लेते हैं।
- अवैध कीटनाशक: प्रतिबंध के बावजूद आसानी से उपलब्ध।
- जागरूकता की कमी: ग्रामीण क्षेत्रों में जहर के पर्यावरणीय प्रभाव की समझ कम।
- बफर जोन की संवेदनशीलता: दुधवा टाइगर रिजर्व के आसपास कृषि क्षेत्र होने से वन्यजीव और इंसानी गतिविधियों का टकराव बढ़ा।
वन विभाग की कार्रवाई
- उच्च स्तरीय जांच टीम गठित।
- गांववालों के साथ बैठकें, जागरूकता कार्यक्रम।
- कीटनाशक विक्रेताओं पर नजर।
- गिद्ध बचाव और पुनर्वास प्रयास।
वन विभाग ने चेतावनी दी है कि ऐसे जहर का इस्तेमाल गैरकानूनी है और इसमें शामिल लोगों पर Wildlife Protection Act और अन्य कानूनों के तहत सख्त कार्रवाई होगी।
भारत में गिद्ध संरक्षण की चुनौतियां
भारत में 9 प्रजातियों के गिद्ध हैं, जिनमें से कई critically endangered हैं। BNHS, Vulture Conservation Breeding Centres (पिन्नौर, गोरखपुर आदि) और CMS Vulture Action Plan जैसे प्रयास चल रहे हैं। फिर भी पेस्टिसाइड पॉइज़निंग, इलेक्ट्रिक तारों से टकराव, शिकार और हेल्सी फूड की कमी जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।
IVRI रिपोर्ट ने दुधवा की घटना को स्पष्ट कर दिया है, लेकिन असली चुनौती जड़ से समस्या हल करने की है। यदि हम गिद्धों जैसे प्रजातियों को बचाना चाहते हैं तो जहर पर अंकुश, जागरूकता और सतत विकास जरूरी है। वन विभाग, NGO और स्थानीय समुदाय को मिलकर काम करना होगा, वरना आसमान में गिद्धों की उड़ान हमेशा के लिए कम होती जाएगी।













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