UP Election 2027 में मुफ्त राशन योजना फिर बनेगी BJP का चुनावी गेम चेंजर? विपक्ष की क्या है काउंटर स्ट्रैटेजी
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में साल 2027 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2027) की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। BJP ने जहां अपनी सांगठनिक टीम में बड़ा फेरबदल और बूथ स्तर पर कमेटियों को मजबूत कर तीसरी बार सत्ता में आने के लिए ताकत झोंक दी है। वहीं समाजवादी पार्टी अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ मैदान में डटी है।

इस हाई-प्रोफाइल सियासी मुकाबले के बीच एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है- क्या साल 2022 के विधानसभा चुनाव की तरह, इस बार भी सत्तारूढ़ दल को 'मुफ्त राशन योजना' का बंपर राजनीतिक लाभ मिलेगा? क्या 'राशन' एक बार फिर उत्तर प्रदेश में 'शासन' की चाबी बनेगा? आइए इसे बेहद आसान भाषा में समझते हैं।
BJP Free Ration Scheme: 2022 में 'फ्री राशन' ने कैसे पलटी थी बाजी?
आपको याद होगा साल 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव में कैसे 'मुफ्त राशन योजना' (प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना) BJP के लिए सबसे बड़ा 'गेम चेंजर' साबित हुई थी। तब पूरे देश में कोविड महामारी का प्रभाव था और लोग अपने काम से वापस घर की ओर लौट आए थे। कोरोना काल में शुरू हुई इस योजना ने जाति और धर्म को किनारे कर BJP के लिए एक नया वोटबैंक तैयार किया, जिसे राजनीति में 'लाभार्थी वर्ग' कहा गया।
नमक का कर्ज और महिला वोटर का मिला साथ
मुफ्त गेहूं, चावल के साथ-साथ तेल, नमक और दालों के पैकेट ने सीधे गरीब परिवारों की रसोई को छुआ। चुनावों के दौरान ग्रामीण इलाकों में 'नमक का कर्ज चुकाएंगे, भाजपा को लाएंगे' जैसे नारे गूंजे। इसने महिला वोटरों को रिकॉर्ड संख्या में सत्ता पक्ष की ओर मोड़ा और योगी सरकार की प्रचंड बहुमत के साथ दोबारा वापसी कराई।
UP Election 2027 में क्या फिर दिखेगा राशन का जलवा?
2027 के चुनाव आठ महीने ही दूर हैं, ऐसे में मुफ्त राशन योजना अभी भी जमीन पर उतनी ही सक्रिय है। हाल ही में योगी सरकार ने जून के राशन वितरण की तारीख बढ़ाकर 15 जून की थी ताकि कोई भी गरीब छूटे नहीं। इसके साथ ही सरकार ने 'वन नेशन वन राशन कार्ड' और राशन प्रणाली को ATM की तरह हाईटेक बनाने के लिए 25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के 'Sarthak PDS' सिस्टम को मंजूरी दी है।
लेकिन, क्या यह 2027 में भी वैसा ही करिश्मा कर पाएगी? राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस बार राह 2022 जैसी आसान नहीं है, जिसके पीछे कुछ मुख्य कारण हैं:
1. विपक्ष की काट और 'Counter Narrative'
2022 में विपक्ष मुफ्त राशन की काट नहीं ढूंढ पाया था। लेकिन 2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस (INDIA गठबंधन) ने इसे लेकर अपनी रणनीति बदल दी है। विपक्ष अब जनता के बीच जाकर यह नैरेटिव सेट कर रहा है कि सरकार पांच किलो मुफ्त राशन देकर युवाओं से 'रोजगार का हक' छीन रही है। विपक्ष 'राशन नहीं, नौकरी चाहिए' और 'पेपर लीक' जैसे मुद्दों को हवा दे रहा है।
2. 'एंटी-इन्कंबेंसी' और महंगाई का असर
2022 में मुफ्त राशन नया-नया था और महामारी के संकट के बाद लोगों के लिए बहुत बड़ी राहत था। अब 2026-2027 आते-आते लोग इसके आदी हो चुके हैं। ऐसे में मुफ्त राशन से मिलने वाली खुशी पर अब महंगाई (रसोई गैस, कारों के बढ़े दाम, टैक्स) और बेरोजगारी की चर्चाएं भारी पड़ने लगी हैं।
3. 'जातीय समीकरण' बनाम 'लाभार्थी कार्ड'
यूपी की राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों (Caste Equations) पर घूमती है। सपा का 'PDA' कार्ड इस समय बीजेपी के 'लाभार्थी' (Ration Card Holders) कार्ड को सीधी टक्कर दे रहा है। बीजेपी ने भी इसी तोड़ के लिए हाल ही में यूपी संगठन में सभी छह क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदलकर जाति और क्षेत्र का नया संतुलन बिठाया है।
UP Chunav में राशन फायदा तो देगा, लेकिन सिर्फ इसके भरोसे जीतना मुश्किल
इसमें कोई दो राय नहीं है कि उत्तर प्रदेश के करीब 15 करोड़ लाभार्थी आज भी हर महीने कोटे की दुकान पर जाकर मुफ्त अनाज ले रहे हैं। यह एक ऐसा सीधा जुड़ाव है जो चुनाव के दिन ग्रामीण इलाकों और गरीब बस्तियों में सत्तारूढ़ दल को एक मजबूत मनोवैज्ञानिक बढ़त देता है।
हालांकि, 2027 का चुनाव केवल राशन पर नहीं, बल्कि 'रोजगार, कानून व्यवस्था, पेपर लीक और जातीय गोलबंदी' के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। मुफ्त राशन निश्चित तौर पर बीजेपी के वोट बैंक की नींव को मजबूत रखेगा, लेकिन सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए उसे युवाओं की नाराजगी दूर करने और विपक्ष के 'PDA' चक्रव्यूह को भेदने के लिए और भी कई बड़े सियासी तीर चलाने होंगे।














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