कैबिनेट फेरबदल से ठीक पहले राघव चड्ढा को HC से झटका, क्या मोदी सरकार में मंत्री बनने की राह होगी मुश्किल?
Raghav Chadha: भाजपा सांसद राघव चड्ढा को व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री हटाने की मांग से जुड़े मामले में दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ी राहत नहीं मिल सकी। अदालत ने उनकी उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें सभी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से संबंधित सामग्री हटाने की अपील की गई थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड में शामिल पांच दस्तावेजों में छेड़छाड़ की गई थी। इसी वजह से अदालत ने केवल उन पांच दस्तावेजों को हटाने का निर्देश दिया है।
वहीं, बाकी सामग्री को लेकर कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में वह न तो मानहानि करने वाली दिखाई देती है और न ही उससे व्यक्तिगत अधिकारों का ऐसा उल्लंघन होता है, जिसके आधार पर व्यापक अंतरिम राहत दी जा सके। अदालत ने यह भी माना कि किसी व्यक्ति के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। ऐसे में बिना पर्याप्त कानूनी आधार के सभी सामग्री हटाने का आदेश देना उचित नहीं होगा।

सभी कंटेंट हटाने की मांग पर कोर्ट ने लगाई रोक
राघव चड्ढा की ओर से दायर याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया था कि इंटरनेट और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सभी संबंधित सामग्री हटाने का आदेश दिया जाए। उनका कहना था कि इससे उनके व्यक्तिगत अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
लेकिन हाई कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर ऐसा कोई मजबूत कारण सामने नहीं आया है, जिससे सभी सामग्री को हटाने का निर्देश दिया जा सके। कोर्ट ने साफ किया कि हर ऑनलाइन सामग्री को केवल आपत्ति जताने के आधार पर हटाया नहीं जा सकता।
पांच छेड़छाड़ वाले दस्तावेज हटाने का निर्देश
हालांकि मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड की जांच में पाया कि पांच दस्तावेज ऐसे हैं, जिनमें छेड़छाड़ की गई थी। कोर्ट ने माना कि इस तरह के बदले हुए दस्तावेजों का सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहना उचित नहीं है। इसी कारण अदालत ने केवल उन्हीं पांच दस्तावेजों को हटाने का आदेश दिया। बाकी सामग्री को हटाने की मांग कोर्ट ने स्वीकार नहीं की।
मानहानि वाला कंटेंट नहीं माना
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्री पहली नजर में मानहानि करने वाली नहीं लगती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर ऐसा कोई व्यापक अंतरिम आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं है, जिसके तहत सभी संबंधित कंटेंट हटाने का निर्देश दिया जाए।
कोर्ट ने कहा कि किसी भी मामले में व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, दोनों को समान महत्व देना जरूरी है। इसलिए हर विवादित सामग्री पर तुरंत प्रतिबंध लगाना उचित नहीं माना जा सकता।
21 मई की सुनवाई में भी कोर्ट ने दिया था यही संकेत
इस मामले में अंतरिम रोक लगाने की अर्जी पर 21 मई को हुई सुनवाई के दौरान भी हाई कोर्ट ने शुरुआती टिप्पणी की थी। उस समय अदालत ने कहा था कि राघव चड्ढा की ओर से जिन सामग्रियों का हवाला दिया गया है, उनसे पहली नजर में व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन होता नहीं दिखता।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि संबंधित सामग्री अधिकतर राजनीतिक आलोचना जैसी प्रतीत होती है। इसलिए केवल आलोचनात्मक टिप्पणियों के आधार पर उन्हें हटाने का आदेश देना उचित नहीं होगा। अब अंतरिम आदेश में भी अदालत ने अपने उसी रुख को बरकरार रखा। कोर्ट ने सभी सामग्री हटाने की मांग खारिज कर दी, जबकि रिकॉर्ड में छेड़छाड़ किए गए पांच दस्तावेज हटाने के निर्देश जारी किए।
क्या कैबिनेट विस्तार पर पड़ेगा असर?
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित कैबिनेट विस्तार और फेरबदल को लेकर राजनीतिक गलियारों में लगातार चर्चाएं चल रही हैं। हाल के दिनों में भाजपा में शामिल हुए राघव चड्ढा का नाम भी पंजाब से संभावित नए चेहरों में चर्चा का विषय रहा है।
हालांकि, कोर्ट के इस फैसले के बाद अब राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या इससे उनकी संभावित दावेदारी पर कोई असर पड़ेगा। फिलहाल भाजपा या केंद्र सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है और न ही कैबिनेट विस्तार को लेकर किसी नाम की पुष्टि की गई है।
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