GST: आलू तो बिकेगा उसी रेट पर लेकिन टिक्की हो गई है महंगी

क्यों न किसान भी अपना आलू पकाकर बेचे, अपने टमाटर का सॉस बनाए और गेहूं को आटा भी वही बनाए।

इलाहाबाद। देश में जीएसटी टैक्स प्रणाली से नए युग की शुरुआत हुई तो हम भी जीएसटी का फायदा नुकसान जानने पहुंचे। फाफामऊ सब्जी मंडी में कुछ दुकानों पर हमने आलू व कुछ अन्य सब्जियों के दाम पता किए तो पता चला जो 30 जून को रेट था वही रेट है। कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। ये सोचकर अच्छा लगा कि चलो महंगाई नहीं बढ़ी। हमने फिर सिविल लाइंस की ओर रुख किया। यहां सुभाष चौराहे के पास एक बड़ा रेस्टोरेंट है और ये रेस्टोरेंट उत्तर भारत की मशहूर आलू की टिक्की को बेहतर तौर पर परोसने के लिए जाना जाता है। एक सामान्य प्लेट की कीमत 50 रुपए है। जबकि कई वैरायटी में ये महंगा होता चला जाएगा। हमने आज नई कीमत पूछी तो बताया गया कि 9 रुपए बढ़े हुए थे। यानी अब 59 रुपए की एक प्लेट पड़ी।

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संचालक से पूछा गया कि आलू के दाम में तो कोई मंहगाई नहीं आई। फिर 9 रुपए क्यों बढ़ा दिए। दुकानदार ने कहा अजी ये जीएसटी का असर है। हमने भी थोड़ा घुमाया कि भाई हम किसान के घर से हैं। हमसे तो आलू वही रेट पर खरीदा गया है। फिर क्या पकाकर बेचने पर महंगी हो गई। दुकानदार बोला जी ऐसा ही समझिए। जो नियम हमे बताया गया है। उसके मुताबिक हम जब टिक्की बेचेंगे तो टैक्स जोड़कर वो इतने में ही पड़ेगी। रेस्टोरेंट में चाउमीन, बरगर, डोसा आदि पर भी महंगा हो गया है। ये जीएसटी का प्रभाव है। दुकानदार ने आगे खुद तर्क दे दिया। अब भाई साहब टमाटर तो आप से ही खरीदते हैं। दाम वही है पर सॉस का दाम बढ़ गया है। अजी ये तो ठीक है जैम और सूप पर भी 18% टैक्स होगा। चाउमीन के चटकारे में भी ज्यादा दाम चुकाने होंगे।

मन में ऐसे ही सवाल आया क्यों न किसान भी अपना आलू पकाकर बेचे। अपने टमाटर का सॉस बनाए। गेहूं को आटा बनाकर बेचे। कम से कम कुछ दाम तो जादा मिलेगा। हालांकि सरकार ने हरी सब्जी को टैक्स मुक्त रखा है लेकिन ये सब्जी अगर किसान की उपज से रूप बदल कर किसी कंपनी का उत्पाद हो गई हैं तो खुद किसान को ही पहले की अपेक्षा अधिक पैसे में खरीदने पड़ेंगे।

फौरी तौर पर समझ ये आया कि आलू से लेकर तमाम तरह की फसल उगाने वाले किसानों को कोई फायदा नहीं होगा। अलबत्ता उनसे उपज खरीदने के बाद उत्पाद के रूप में खरीदने पर ज्यादा पैसे चुकाने होंगे। सवाल वही साहब की आखिर कर्ज में डूबा किसान ऐसे कैसे बाहर आएगा। आप किसान से गेहूं पुराने रेट में ही खरीदेंगे लेकिन गेहूं से बना बिस्किट महंगा बिकेगा। आलू को कौड़ी के दाम खरीदेंगे लेकन चिप्स के दाम महंगे होंगे। सोंचने वाली बात तो ये है कि फर्टिलाइजर जो कि पहले 0-8 फीसदी के स्लैब में था अब 12 फीसदी के टैक्स स्लैब में होगा। यानी फर्टिलाइजर के मूल्य में 5-7% वृद्धि होगा।

आखिर इसका बोझ किस पर आएगा। अगर यही हाल रहा तो किसान तो खेती करने से रहे। धीरे-धीरे उनका किसानी से मन विमुख होता जाएगा। फिर न गर्म टिक्की मिलेगी न कच्ची आलू। किसान का फल तो नो टैक्स यानी सस्ते पर जूस बनकर आएगा तो 12% टैक्स। किसान बाग से शहद बेंचे तो सस्ता और उसे बाबा जी किसान को बेचेंगे तो महंगा। पनीर तैयार करे किसान तो साधारण दाम। पैकेट वाली खरीदे तो आसमान छूते दाम। फिलहाल अभी बाजार में टहल रहा हूं, देख रहा हूं। समझने समझाने का दौर भी शुरू होगा पर पहले ज्ञान सुझावन टैक्स से और ज्ञान ले लिया जाए।

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