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अंदरूनी कलह में BSP ने एक दशक में खोए कई ब्राह्मण चेहरे, 2022 में होगी मायावती की सोशल इंजीनियरिंग की परीक्षा

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लखनऊ, 6 सितम्बर: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती की बदलती रणनीति का संकेत था जब पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद सतीश चंद्र मिश्रा ने उत्तर प्रदेश के 60 जिलों में 'प्रबुद्ध विचार गोष्ठी (प्रबुद्धों का सम्मेलन)' आयोजित करने का फैसला किया था। इनमें से पहला 23 जुलाई को अयोध्या में आयोजित किया गया था। अंतिम 7 सितंबर को लखनऊ में आयोजित किया जाएगा और मायावती द्वारा संबोधित किए जाने की संभावना है। हालांकि इन सम्मेलनों के बीच सवाल यह खड़ा हो रहा है कि ब्राह्मणों को एकजुट करने के लिए पूरे प्रदेश में प्रबुद्ध विचारगोष्ठियों का आयोजन करने वाली बसपा अपने ब्राह्मण नेताओं को क्यों नहीं सहेज पायी।

मायावती

उत्तर प्रदेश में 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। उस सरकार में बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्रा के साथ कई बड़े ब्राह्मण चेहरे थे जो यूपी के हर इलाके से आते थे। इनके बसपा में रहने की वजह से मायावती को काफी फायदा हुआ लेकिन जैसे ही 2012 में मायावती सत्ता से बाहर हुईं उसके बाद से ही एक एक कर सभी ब्राहम्ण नेताओं ने बसपा का दामन छोड़ दिया। इस क्रम में केवल सतीश मिश्रा ही बचे रह गए और अब वही बसपा की प्रबुद्ध विचारगोष्ठियों की कमान थामे हुए हैं।

वर्तमान कैबिनेट मंत्री और पूर्व सांसद ब्रजेश पाठक कभी मायावती के खास रहे
उत्तर प्रदेश के वर्तमान कानून मंत्री ब्रजेश पाठक एक समय बसपा के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और मायावती के खास हुआ करते थे। बसपा ने उन्हें राज्यसभा भी भेजा था। लेकिन अंदरुनी कलह के चलते उन्होंने 2016 में बसपा का साथ छोड़ दिया था। कुछ समय बाद वह बीजेपी में शामिल हो गए थे। बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें लखनऊ सेंट्रल से टिकट दिया था और वो चुनाव जीत गए। पार्टी में पकड़ होने की वजह से उन्हें पहली बार ही मंत्री पद से भी नवाजा गया। आज वो लखनऊ और मध्य यूपी के लिए भाजपा के बड़े ब्राह्मण चेहरे बन चुके हैं।

ब्रजेश पाठक

पूर्व मंत्री ददन मिश्रा व रामवीर उपाध्याय का भी बहुत बड़ा कद था
बसपा की सरकार में मंत्री रहे ददन मिश्रा भी मायावती के खास रहे। उन्होंने बसपा की लंबे समय तक सेवा की थी। ददन मिश्रा 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ही छोड़ चुके थे। वह भाजपा में शामिल हो गए थे। लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें श्रावस्ती से टिकट पकड़ा दिया और वो चुनाव जीतकर सांसद बन गए। बसपा की अंदरुनी राजनीति के वह भी शिकार हुए थे और उन्हें बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल होना पड़ा था। ददन के अलावा मायावती की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे रामवीर उपाध्याय पश्चिमी यूपी में बसपा के बड़े ब्राह्मण चेहरा थे। आपसी खींचतान के चलते मायावती ने रामवीर उपाध्याय को पाटी से निकालदिया था। हालांकि रामवीर ने बसपा से अलग होने के बाद किसी पार्टी का दामन नहीं थामा।

विद्यांत कॉलेज के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मनीष हिन्दवी कहते हैं कि,

'' बसपा पर सतीश मिश्रा की छाप पड़ चुकी है या यूं कह लीजीए कि बसपा पर सतीश मिश्रा हावी होते जा रहे हैं। एक तरफ तो सारे बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए। उनके बाद दूसरा कोई बड़ा चेहरा नहीं है पार्टी में जो उनके खिलाफ आवाज उठाए। आने वाले दिनों में बसपा की रणनीति, नीति और कार्यक्रमों में पूरी तरह से सतीश मिश्रा की छाप दिखती नजर आएगी। वहीं दूसरी ओर भाजपा पूरी प्लानिंग के साथ पार्टी और सरकार में भी जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर चालें चल रही है। भाजपा की नजर ओबीसी और अपर कास्ट पर पर है। इसीलिए उनके वोट प्रतिशत में भी खासा इजाफा हुआ है।''

प्रयागराज में राकेशधर त्रिपाठी, प्रतापगढ़ में शिव प्रकाश मिश्रा सेनानी थे बसपा के नेता
यूपी के पूर्व केबिनेट मंत्री राकेशधर त्रिपाठी भी मायावती की सरकार में मंत्री रहे। उन्हें भी प्रयागराज इलाके में बसपा ब्राह्मण चेहरे के तौर पर इस्तेमाल कर रही थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने भदोही से उन्हें टिकट दिया था लेकिन वो चुनाव हार गए। बाद में बसपा की अंदरुनी कलह के चलते उन्हें भी मायावती ने पार्टी से निकाल दिया था। हालांकि बसपा से निकाले जाने के बाद अभी तक उन्होंने कोई पार्टी ज्वाइन नहीं की है। इसी तरह प्रतापगढ़ जिले में बसपा शिव प्रकाश सेनानी को एक ब्राह्मण चेहरे के तौर पर उभारा था। मिश्रा ने कुंडा के बाहुबली विधायक राजा भैया के खिलाफ भी चुनाव लड़ा था। बाद में मिश्रा ने बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था।

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English summary
There will be one percent behavior in the examination of Brahmins, Maya's social action will be done in 2022.,
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