Teachers Day : पत्रकार से टीचर बने Shivendra Singh की बच्चों से अजब दोस्ती की गजब कहानी
उन्नाव , 4 सितम्बर। शिक्षण संस्थानों की दशा व दिशा सुधारने के लिए सबसे पहले जरूरी है कि बच्चों का स्कूल में ठहराव सुनिश्चित हो। उनकी स्कूल आने में दिलचस्पी पैदा हो। टीचर से उनका खास जुड़ाव हो। फिर उनका पढ़ाई में मन लगाना तो ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। यही स्ट्रेटेजी यूपी के शिवेंद्र सिंह बघेल ने अपनाई जो काम भी कर गई। नतीजा यह रहा है कि कभी महज 36 बच्चों से आबाद रहने वाले सरकारी स्कूल में नामांकन 207 तक पहुंच गया। 5 सितम्बर 2022 को शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके आपको शिवेंद्र सिंह बघेल की पूरी कहानी जरूरी जाननी चाहिए।

शिवेंद्र सिंह बघेल की कहानी
नामी अखबार से पत्रकारिता छोड़ सरकारी स्कूल में टीचर बने शिवेंद्र सिंह बघेल की कहानी प्रेरणादायी है। इन्होंने स्कूल से मुंह मोड़ने वाले बच्चों में भी पढ़ने, लिखने और खेलने की रुचि पैदा कर दी। इसके लिए शिवेंद्र सिंह ने पहले बच्चों को दिल से समझा और फिर दिमाग लगाया। देखते ही देखते शिवेंद्र सिंह बघेल और स्कूली बच्चों के बीच पक्की दोस्ती हो गई। इसकी एक बानगी तब भी देखने को मिली जब शिवेंद्र का ट्रांसफर हुआ और बच्चे इनके गले लिपटकर फूट फूटकर रोने लगे थे।

टीचर शिवेंद्र सिंह बघेल का इंटरव्यू
वन इंडिया हिंदी से बातचीत में शिवेंद्र सिंह बघेल बताते हैं कि 7 सितम्बर 2018 को इन्होंने उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में प्राइमरी स्कूल के असिस्टेंट टीचर पद पर ज्वाइन किया। पहली बार में चंदौली जिले के चकिया ब्लॉक के गांव रतीगढ़ स्थित कम्पोजिट विद्यालय में पढ़ाने का अवसर मिला। ज्वाइनिंग के बाद शिवेंद्र सिंह बघेल ने देखा कि पहाड़ी इलाके के इस स्कूल में नामांकन तो ज्यादा है लेकिन बच्चे कम आते हैं। सबसे पहले इसी समस्या के समाधान की दिशा में कदम बढ़ाए।

रोज सुबह घर घर जाकर बच्चों को स्कूल लाए
शिवेंद्र सिंह रोज सुबह अपने साथ शिक्षकों के साथ बच्चों के घर जाने लगे। कई बच्चे खेतों में काम करते तो कई गांव के चौक में खेलते मिलते। शिवेंद्र सिंह इन बच्चों को उसी हाल में बस इनके बस्ते व कॉपी किताबों के साथ स्कूल ले आते। स्कूल में ही नहलाते। दंत मंजन करवाते। कपड़े बदलवाते। पहले बच्चों से उनकी खूबियों आदि के बारे में चर्चा करते। हंसी मजाक करते। उनके खेलते। ये सब इसलिए ताकि बच्चे व शिक्षक के बीच की दूरियां कम हो जाए और हुई भी।

बाल मेला कभी नहीं भूल पाएंगे बच्चे
30 वर्षीय शिक्षक शिवेंद्र सिंह के प्रयासों का नतीजा यह रहा कि बच्चों को घर से ज्यादा स्कूल अच्छा लगने लगा। शनिवार को नो बैग डे का तो उनको बेसब्री से इंतजार रहता था, क्योंकि इस दिन पढ़ाई नहीं बल्कि खेलकूद की एक्टिविटी होती थी, जिन्हें बच्चे खूब एंजॉय करते। बाल मेला भी बच्चे कभी नहीं भूल पाएंगे। यही वजह है कि स्कूल में नामांकन 207 तक पहुंचा और 200 बच्चे हाजिर भी होने लगे। सुबह टीचर शिवेंद्र सिंह को स्कूल पहुंचता देख बच्चे खेत खलिहान और खेलकूद छोड़ खुद ही स्कूल आने लगे।
जब ट्रांसफर पर रोने लगे बच्चे
2018 से 2022 तक रतीगढ़ के स्कूल में पोस्टेड रहे। इसी साल 12 जुलाई को शिवेंद्र का ट्रांसफर हरदौई में हो गया। शिवेंद्र यहां से रिलीव होकर जाने लगे तो बच्चे का स्नेह उमड़ पड़ा। बच्चे इनके लिपटकर रोने लगे। दिल को छू लेने वाले इस वाक्ये के वीडियो भी सोशल मीडिया में खूब वायरल हुए। शिवेंद्र कहते हैं कि ट्रांसफर पर मेरी आंखें भर आई थी, लेकिन ट्रांसफर के आदेश मानना भी जरूरी है। मुझे खुशी इस बात की है कि मैं बच्चों में पढ़ने के प्रति रुचि पैदा करने में सफल रहा। यह प्रयास दूसरे स्कूलों में भी जारी रहेगा।

अब वीडियो कॉल पर करते हैं बात
शिवेंद्र सिंह बघेल बताते हैं कि रतीगढ़ से भले ही ट्रांसफर हो गया हो, मगर ना बच्चे मुझे भूल पा रहे हैं और ना मैं उनको। आज भी रोजाना दोपहर ढाई से तीन बच्चे तक बच्चों के साथ वीडियो कॉल पर बात करता हूं। आठवीं कक्षा के छात्र अंगद, छठी कक्षा की छात्रा शालू, सोनाली व चौथी कक्षा के धनंजय समेत कई बच्चे दोपहर दो बजे स्कूल से घर आकर अपने परिजनों के मोबाइल से वीडियो कॉल पर बात करते हैं। बच्चे अपनी पढ़ाई और खेलकूद की गतिविधियों के बारे में चर्चा करते हैं।

पत्नी दिव्या ने किया सपोर्ट
शिवेंद्र सिंह की शादी दिव्या सिंह से हुई। दिव्या निजी बैंक में काम करती हैं। पहले शिवेंद्र और दिव्या बनारस में रहते थे। यहां से रतीगढ़ स्कूल 60 किलोमीटर था। शिवेंद्र रोजाना बाइक से आना जाना करते थे। शिवेंद्र कहते हैं कि स्कूल के बच्चों से दोस्ती में उनकी पत्नी का भी सपोर्ट रहा। पत्नी ने बच्चों से बातचीत, मोटिवेशन व बाल मेला समेत कई अच्छे आइडिए दिए।

दादा अंग्रेजों के जमाने के टीचर रहे
बता दें कि शिवेंद्र मूलरूप से यूपी के उन्नाव जनपद के शुक्लागंज के रहने वाले हैं। इनके पिता यादवेंद्र सिंह बघेल शुक्लागंज के सरस्वती शिशु मंदिर से रिटायर हुए हैं। दादा सुखदेव बघेल भी टीचर थे, जो साल 1947 में रिटायर हुए थे। मां शिला देवी हाउसवाइफ हैं। बड़ा भाई उपेंद्र सिंह बिजनेसमैन व भारतेंदु सिंह पीएनबी में सीनियर मैनेजर हैं।
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