संकट में घिरी बीजेपी को बचाने के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संभाला मोर्चा?
राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि भाजपा ने ओबीसी समुदाय को मजबूत करने में सावधानी बरतने की कोशिश की, जो 2014 के बाद से भगवा संगठन के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनावी वोट बैंक रहा है।

देश में अगले साल आम चुनाव होने हैं। इस चुनाव से पहले अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए तरह तरह के बयान दिए जा रहे हैं। कुछ दिनों पहले रामचरितमानस को लेकर सपा के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने विवादित बयान देकर बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया था। बीजेपी इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोल पा रही थी। बीजेपी की मजबूरी को देखते हुए उसके मातृ संगठन आरएसएस को मोर्चा संभालना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने "पंडितों" वाला बयान देकर रामचरित मानस विवाद से ध्यान भटकाने की कोशिश की है ताकि ओबीसी के बीच बीजेपी के प्रति फैल रही नाराजगी को रोका जा सके।
स्वामी के बयान से बन रहे माहौल को कम करने की कोशिश
दरअसल, संघ ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का बयान कि जातिगत अंतर "पंडितों" द्वारा पैदा किए गए थे, कुछ और नहीं बल्कि "संत और समाज सुधारक" युगों से कहते आ रहे हैं। आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेडकर ने कहा कि भागवत ने अनिवार्य रूप से जातिगत मतभेदों को संदर्भित किया था जो समय के साथ बुद्धिजीवियों के एक वर्ग द्वारा बनाए गए थे।
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स्वामी ने अपने आलोचकों को दी भागवत की टिप्पणी पर सवाल उठाने की चुनौती
समाजवादी पार्टी के एमएलसी स्वामी प्रसाद मौर्य ने सोमवार को अपने आलोचकों को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी पर सवाल उठाने की चुनौती दी कि शास्त्रों का हवाला देकर पंडितों द्वारा प्रचारित जाति व्यवस्था झूठ थी। उन्होंने कहा, "उन्होंने (भागवत) जो कहा वह कोई नई बात नहीं थी...कोई विवाद नहीं होना चाहिए था...कई संत और समाज सुधारक अपनी शिक्षाओं में जातिगत भ्रम की ओर इशारा करते रहे हैं।" अंबेडकर ने कहा था कि भागवत द्वारा "पंडितों" के संकेत का अर्थ "ब्राह्मण" नहीं बल्कि "बुद्धिजीवी" है।
मोहन भावगत ने दिया था ये बयान
दरअसल, भागवत ने 5 फरवरी को मुंबई में गुरु रविदास जयंती मनाने के एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि नाम, क्षमता और सम्मान के बावजूद सभी लोगों को समान बनाया गया था, लेकिन "पंडितों ने जाति बनाई"। उन्होंने यह भी कहा था कि "पंडितों ने शास्त्रों के आधार पर जो कुछ भी कहा वह झूठ था"। आरएसएस प्रमुख के इस बयान ने उच्च जाति समूहों और राजनीतिक संगठनों के एक वर्ग के बीच गहन बहस छेड़ दी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने फौरन भागवत से सवाल किया कि 'जाति' और 'वर्ण' को लेकर उनकी क्या धारणा है।
राजनीतिक विशेषज्ञ मनीष हिन्दवी कहते हैं कि,
भागवत का यह बयान संभावित रूप से ब्राह्मणों और पिछड़ों के बीच जाति विभाजन के बीच उपजे विवाद को कम करने के उद्देश्य से दिया गया है। आप देखिए कि सारा खेल ओबीसी को लेकर ही लड़ा जा रहा है। ओबीसी को कोई नाराज नहीं करना चाहता है। संघ को पता है कि भागवत ने जो बयान दिया उससे यदि ब्राह्मण नाराज भी हो जाए तो उसे बाद में मना लिया जाएगा। ब्राह्मण यदि नाराज भी होगा तो कहां जाएगा अंत में वोट तो बीजेपी के साथ ही जाएगा। लेकिन यदि ओबीसी वोट बैंक एक बार खिसक गया तो फिर उसको वापस पाना आसान नहीं रह जाएगा।
ओबीसी वोट बैंक को लेकर सावधानी बरतने की कोशिश
हालांकि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, जिन्हें अक्सर भाजपा नेतृत्व में सबसे प्रमुख ओबीसी चेहरे के रूप में पेश किया जाता है, उन्होंने भागवत के अवलोकन को "मार्गदर्शन" (मार्गदर्शन) करार दिया था। राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि भाजपा ने ओबीसी समुदाय को मजबूत करने में सावधानी बरतने की कोशिश की, जो 2014 के बाद से भगवा संगठन के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनावी वोट बैंक रहा है। उन्हें उन ब्राह्मणों के साथ जो परंपरागत रूप से राम मंदिर आंदोलन के चरम पर होने के बाद से भाजपा के साथ रहे हैं।
हिन्दवी कहते हैं कि,
आप गौर करिए कि ओबीसी को साधने के लिए ही सुनियोजित तरीके से बीजेपी और संघ ने इसको यादव और गैर यादव में बांटने की कोशिश की। जिसमें वो सफल हुए। समाज में ये बात फैलाई गई कि ओबीसी में यादव ही एक ऐसा तबका है जो मलाई काट रहा है और बाकी गैर यादवों ओबीसी को कुछ नहीं मिल रहा है। इसी प्रचार के चलते धीरे धीरे गैर यादव ओबीसी समुदाय बीजेपी के साथ चला गया। अब यदि यह समाज एक बार फिर बीजेपी से खिसका तो उसके लिए 2024 की राह आसान नहीं रह जाएगी।












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