नगर निकाय एवं लोकसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर नहीं लड़ना चाहती RLD ? समझिए इसकी वजहें

लखनऊ, 23 सितंबर: उत्तर प्रदेश में नगर निकाय का चुनाव और लोकसभा 2024 का चुनाव राष्ट्रीय लोकदल (Rashtriya Lok Dal) समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के साथ मिलकर नहीं लड़ना चाहता है। आरएलडी के सूत्रों का दावा है कि आरएलडी के स्थानीय स्तर के नेता निकाय चुनाव और लोकसभा चुनाव सपा के साथ लड़ने के पक्षधर नहीं है। आरएलडी के नेताओं की माने तो अखिलेश के साथ नगर निगम का चुनाव लड़ना काफी मुश्किल है क्योंकि स्थानीय स्तर पर सीटों का तालमेल बैठ पाना काफी मुश्किल है। रही बात लोकसभा चुनाव की तो उसमें भी आरएलडी सपा के साथ जाएगी या नहीं यह अभी तय नहीं हो पाया है।

पश्चिम में यादवों की संख्या काफी कम

पश्चिम में यादवों की संख्या काफी कम

आरएलडी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने दावे के साथ कहा कि संगठन के नेता और पदाधिकारी सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के पक्ष में नही है। इसकी कई वजहें हैं उनमें से एक ये है कि पश्चिम में यादव वोटर नहीं है जिनपर सपा का एकाधिकार माना जाता है। वहीं दूसरी ओर जाट समुदाय में भी सपा की अच्छी पकड़ नहीं है। पश्चिम में अखिलेश के साथ लड़ने का कोई फायदा नहीं मिलेगा क्योंकि यहां किसी तरह का सहयोग सपा करने की स्थिति में नहीं है।

अगड़ी जातियों में अखिलेश का विरोध रालोद के लिए मुश्किल

अगड़ी जातियों में अखिलेश का विरोध रालोद के लिए मुश्किल

आरएलडी के सूत्रों की माने तो जिस तरह से गैर यादव ओबीसी और अगड़ी जातियों में अखिलेश का विरोध है और उनको लेकर नाराजगी है वह भी एक बड़ी वजह है। पदाधिकारियों की माने तो अखिलेश के साथ लड़ने में पार्टी को फायदा कम नुकसान ज्यादा है। हालांकि नगर निकाय और लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर चुनाव लड़ने को लेकर कोई फैसला नहीं लिया गया है लेकिन अंदरखाने की यह बात चर्चा का विषय बनी है कि सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से क्या फायदा होगा। उल्टे अगड़ी जातियों के विरोध का सामना करना पड़ेगा।

मुसलमान भी अखिलेश से नाराज हैं

मुसलमान भी अखिलेश से नाराज हैं

अखिलेश के साथ मिलकर चुनाव न लड़ने की एक वजह मुस्लिम वोटर भी हैं। आरएलडी के नेताओं का मानना है कि मुसलमानों के बीच अब पहले की तरह अखिलेश को लेकर स्वीकार्यता नहीं है। आजम के आने से कुछ राहत जरूर है लेकिन इसका पश्चिम में कोई असर पड़ने की संभावना कम ही है। मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा तबका कांग्रेस का रुख कर सकता है। इसको देखते हुए आरएलडी बड़े ही सधे अंदाज में आगे बढ़ना चाहती है। आरएलडी को पता है कि यदि मुस्लिम साथ नहीं आए तो फिर अखिलेश के साथ मिलकर लड़ने का कोई फायदा नहीं है। उल्टे अन्य जातियां पार्टी से दूर चली जाएंगी।

निकाय चुनाव में निचले स्तर पर कैसे बनेगा सीटों का तालमेल

निकाय चुनाव में निचले स्तर पर कैसे बनेगा सीटों का तालमेल

आरएलडी के एक पदाधिकारी ने बताया कि दरअसल सबसे बड़ी वजह सीटों के तालमेल को लेकर है। निचले स्तर पर इस बात का विरोध ज्यादा है कि अखिलेश के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से कई सीटों पर पार्टी को समझौता करना पड़ेगा। हालांकि इसको लेकर अंतिम फैसला राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ही लेंगे लेकिर पार्टी के अंदरखाने नगर निगम और स्थानीय निकाय की सीटों को लेकर जो इनपुट मिल रहे हैं उनको सुलझाना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।

रालोद ने सपा के साथ मिलकर लड़ा था विधानसभा का चुनाव

रालोद ने सपा के साथ मिलकर लड़ा था विधानसभा का चुनाव

उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में सपा ने आरएलडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। आरएलडी ने आठ सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि उसने 33 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। विधानसभा चुनाव के बाद सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने वादे के तहत जयंत चौधरी को राज्यसभा का टिकट भी दे दिया। अखिलेश के इस बड़े फैसले के बाद अब जयंत को कोई फैसला लेने से पहले दस बार सोचना पड़ेगा। हालांकि कुछ पदाधिकारियों ने यह भी बताया कि दरअसल पश्चिम में सीटों का गणित कैसे सुलझेगा यह बड़ा सवाल है लेकिन निकाय चुनाव में इसका हल बैठकर निकाल लिया जाएगा।

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