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मुलायम सिंह यादव पड़े अकेले, अखिलेश के साथ गए पुराने करीबी

लंबे समय तक मुलायम का साथ देने वाले नेता, मंत्री और विधायक अब पाला बदलकर अखिलेश के साथ खड़े हैं।

दिल्ली। रविवार को मुलायम सिंह यादव के हाथों से समाजवादी पार्टी का कंट्रोल अखिलेश यादव ने अपने हाथों में ले लिया। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पार्टी के अंदर इस बड़े तख्तापलट के बाद सपा को स्थापित करनेवाले मुलायम अब अकेले पड़ गए हैं। उनके जो भी करीबी थे उन्होंने पाला बदल लिया और वे अखिलेश यादव के साथ चले गए हैं। अखिलेश यादव के साथ सपा के स्पेशल नेशनल कन्वेंशन में मंच जो मौजूद थे, वे कभी मुलायम के साथ थे। सपा के सह संस्थापक रेवती रमन सिंह, वाइस प्रेसिडेंट किरणमय नंदा, पार्टी जनरल सेक्रेटरी और राज्यसभा एमपी नरेश अग्रवाल और कई मंत्री, विधायक, मुलायम परिवार के कई सदस्य, जिन्होंने लंबे समय तक मुलायम सिंह को सहयोग दिया, वे सभी अखिलेश यादव के पक्ष में खड़े होकर स्पेशल नेशनल कन्वेंशन में मौजूद थे। Read Also: अखिलेश ने बुलाई सपा विधायको की बैठक, कर सकते हैं बड़ा ऐलान

सपा में मुलायम अलग-थलग

सपा में मुलायम अलग-थलग

रविवार को मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी में अलग-थलग पड़ गए। उनसे मिलने सिर्फ कुछ नेता पहुंचे। मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति जो मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक के नजदीकी माने जाते हैं, पार्षद आशु मलिक, राज्य सभा सांसद बेनी प्रसाद वर्मा, शिवपाल यादव और उनके सहयोगी मुलायम के साथ थे। किरमणमय नंदा को पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुलायम लेकर आए थे और उनको पार्टी में दूसरे सबसे ऊंचे पद पर उन्होंने बिठाया था। किरणमय नंदा ने ऐन वक्त पर मुलायम का साथ छोड़ दिया जबकि लंबे समय तक वे नेताजी का गुणगान करते रहे और उनको राजनीति में अपनी प्रेरणा बताते रहे। अखिलेश के साथ जाने के अपने स्टैंड का बचाव करते हुए नंदा ने कहा कि आने वाले विधानसभा चुनाव में सपा के सामने बड़ी चुनौती है और जनता में पार्टी को लेकर किसी तरह के कंफ्यूजन की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए, इसलिए वे और अन्य वरिष्ठ नेता अखिलेश की लीडरशिप में भरोसा जता रहे हैं।

अखिलेश के पार्टी कन्वेंशन में मौजूद मुलायम के सहयोगी

अखिलेश के पार्टी कन्वेंशन में मौजूद मुलायम के सहयोगी

किरणमय नंदा ने कहा, 'अखिलेश राष्ट्रीय नेता हैं और हरेक राज्य की जनता उनको जानती है। मैं नेताजी को नहीं छोड़ सकता। पार्टी को जब वे स्थापित कर रहे थे तबसे मैं उनके साथ हूं। कुछ लोग नेताजी को भड़काकर पार्टी के खिलाफ साजिश कर रहे हैं इसलिए अखिलेश को पार्टी का प्रेसिडेंट बनाना जरूरी था।' मुलायम के आदेश के विरुद्ध जाकर उनके क्षेत्र आजमगढ़ से आनेवाले दो मंत्री बलराम यादव और दुर्गा प्रसाद यादव भी अखिलेश यादव के साथ कन्वेंशन में मौजूद थे। राज्यसभा सांसद और पूर्व खजांची चंद्रपाल सिंह यादव भी मंच पर मौजूद रहे वहीं बेसिक शिक्षा मंत्री अहमद हसन जिनको मुलायम पुलिस विभाग से राजनीति में लेकर आए थे, वे भी अखिलेश की ताजपोशी का समर्थन करने के लिए वहां थे।

अखिलेश का साथ क्यों दे रहे मुलायम के वफादार?

अखिलेश का साथ क्यों दे रहे मुलायम के वफादार?

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता उदय प्रताप सिंह जिन्होंने मुलायम को कॉलेज में पढ़ाया था और जो अखिलेश सरकार में मंत्री के रैंक पर हैं, वे भी कन्वेंशन में मौजूद थे। अखिलेश ने बलराम यादव को कैबिनेट से हटा दिया था जब उन्होंने जून में कौमी एकता दल के पार्टी में विलय की बात छेड़ी थी, बाद में उनको फिर से मंत्री बनाया गया जब सपा के संसदीय बोर्ड ने विलय को कैंसिल कर दिया। बलराम यादव अखिलेश के साथ क्यों गए, इसके बारे में बताते हुए एक सपा नेता कहते हैं, ''बलराम के बेटे संग्राम आजमगढ़ के अतरौलिया से विधायक हैं और उनका भविष्य अखिलेश यादव पर टिका है।' संग्राम का नाम 2017 के चुनाव में अखिलेश की कैंडिडेट्स लिस्ट में शामिल है।

मुलायम के कुनबे के कई सदस्य कर रहे अखिलेश को सपोर्ट

मुलायम के कुनबे के कई सदस्य कर रहे अखिलेश को सपोर्ट

मुलायम के पारिवारिक सदस्यों में बदायूं के सांसद धर्मेंद्र यादव, रामगोपाल यादव के बेटे व फिरोजाबाद से सांसद अक्षय यादव, मैनपुरी के सांसद तेज प्रताप यादव और इटावा जिला पंचायत के प्रेसिडेंट अंशुल यादव, अखिलेश यादव के साथ पार्टी कन्वेंशन में मौजूद थे। डिंपल समेत घर की किसी भी महिला ने कन्वेंशन में शिरकत नहीं की। शिवपाल यादव के बेटे आदित्य ने पिता का साथ दिया और वे कन्वेंशन से दूर मुलायम सिंह यादव के आवास में उनके साथ रहे। बाद में मुलायम ने इस कन्वेंशन को असंवैधानिक बताया। पार्टी कन्वेंशन में मौजूद पूर्व विधायक ब्रज मोहन यादव ने कहा, 'पिछले कुछ दिनों में सबको पता चल गया है कि जनता, विधायक और कार्यकर्ताओं का समर्थन किनके साथ है। अखिलेश को लोग पार्टी प्रेसिडेंट के तौर पर बहुत दिनों से देखना चाहते थे। सपा को लोग गुंडों और माफियाओं की पार्टी कहते थे, अखिलेश ने पार्टी को इस पहचान से मुक्त किया है। साइकिल चुनाव चिह्न रहेगा या नहीं, यह बड़ा मसला नहीं है क्योंकि अखिलेश खुद पार्टी सिंबल बन चुके हैं।'

क्या मुलायम की सहमति से अखिलेश बने पार्टी चीफ?

क्या मुलायम की सहमति से अखिलेश बने पार्टी चीफ?

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