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Premanand ji maharaj: कितने पढ़े-लिखे हैं प्रेमानंद जी महाराज, कैसे बन गए संन्यासी? जानें सबकुछ यहां

Premanand ji maharaj: देश में यदि अभी सबसे अधिक किसी संत की चर्चा हो रही है तो वह हैं वृंदावन वाले प्रेमानंद जी महाराज। राधारानी की भक्ति में लीन रहने वाले प्रेमानंद महाराज का दर्शन पाने के लिए सड़कों पर लंबी लाइन लगी रहती है। प्रेमानंद महाराज का उपदेश सुनने के लिए भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली से लेकर कई सांसद, नेता और अभिनेता आ चुके हैं। प्रेमानंद महाराज 17 साल से बिना किडनी के जी रहे हैं। यह भी लोगों को हैरान करता है। तो चलिए आज हम आपलोगों को बताएंगे कि प्रेमानंद महाराज कितने पढ़े लिखे हैं? वह संन्यासी कैसे बन गए?

कितने पढ़े लिखे हैं प्रेमानंद जी महाराज
बता दें कि प्रेमानंद महाराज (premanand ji maharaj)का जन्म अखरी गांव, सरसोल ब्लॉक, कानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था उनका परिवार बहुत साधारण था इसलिए उनका बचपन बहुत ही साधारण रूप से बीता। उनके पिता भी बेहद धार्मिक प्रवृति के इंसान थे। वह खेती करने के साथ-साथ भगवान की बहुत अधिक पूजा करते थे। प्रेमानंद महाराज की पढ़ाई की बात करें तो वह पांचवीं कक्षा से ही अध्यात्म की तरफ जुड़ गए थे। जब वे 9 वी कक्षा में आए तब उन्होंने ईश्वर की खोज करने के लिए आध्यात्मिक जीवन जीने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। इसके लिए वह मोह माया के साथ-साथ सब कुछ त्यागने को तैयार थे। उन्होंने अपनी मां को अपने निर्णय के बारें में बताया। 13 वर्ष की उम्र में महाराज जी ने एक दिन मानव जीवन जीने के पीछे की सच्चाई जानने के लिए अपना घर छोड़ दिया।

Premanand ji Maharaj Education

अधिकांश समय गंगा के तट पर बीताते थे
संन्यासी के रूप में उनका अधिकतर समय गंगा नदी के किनारे बीतता था। ज्यादा समय गंगा नदी के साथ बिताने से उन्होंने गंगा नदी को अपनी दूसरी मां के रूप में स्वीकार कर लिया। वे खाना, मौसम और कपड़े की परवाह किये बिना ही वाराणसी और हरिद्वार नदी के घाटों पर घूमते रहे। वह भोजन के लिए 15 से 20 मिनट बैठते थे यदि कहीं से भोजन आ जाता तो कर लेते नहीं तो गंगाजल पीकर उपवास कर लेते थे।

वृंदावन कैसे पहुंचे प्रेमानंद महाराज?
प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Maharaj) के वृंदावन पहुंचने की दिलचस्प कहानी है। दरअसल, एक दिन एक अपरिचित संत उनसे मिलने आए और उन्होंने श्री चैतन्य लीला और रात्रि में रासलीला मंच में आने के लिए आमंत्रित किया। लेकिन प्रेमानंद महाराज उस समय उस संत को नहीं पहचानते थे तो जाने से इनकार कर दिया। फिर वह संत काफी आग्रह करने लगे फिर प्रेमानंद महाराज तैयार हो गए और चैतन्य लीला और रासलीला देखने गए पहुंच गए। यहां समय बीताने के बाद वह यहीं रम गए। एक महीने बाद जब आयोजन खत्म हो गया तब वह वापस लौट गए लेकिन अब उनका मन दोबारा इस रासलीला को देखने का कर रहा था।

इसके बाद प्रेमानंद महाराज जी उसी संत के पास गए जो उन्हें आमंत्रित करने आए थे। उनसे मिलकर महाराज जी कहने लगे, मुझे भी अपने साथ ले चलें, जिससे कि मैं रासलीला को देख सकूं। इसके बदले मैं आपकी सेवा करूंगा। संत ने कहा आप वृंदावन आ जाएं, वहां आपको हर दिन रासलीला देखने को मिलेगी। संत की यह बात सुनते ही, महाराजी को वृंदावन आने की ललक लगी और तभी उन्हें वृंदावन आने की प्रेरणा मिली। इसके बाद महाराज जी वृंदावन में राधारानी और श्रीकृष्ण के चरणों में आ गए और भगवद् प्राप्ति में लग गए।

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