Magh Mela 2026: Prayagraj में 'शंकराचार्य' पद पर संग्राम? अविमुक्तेश्वरानंद को थमाया नोटिस, क्या है पूरा विवाद
Prayagraj Swami Avimukteshwaranand Notice: संगम नगरी में जारी माघ मेले में मौनी अमावस्या के स्नान के दौरान शुरू हुआ विवाद अब "पद और गरिमा" की कानूनी जंग बन चुका है। प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को एक नोटिस जारी किया है।
जिसमें उनके 'शंकराचार्य' शब्द के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए उनसे पूछा है कि वह किस आधार पर खुद को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य बता रहे हैं। आइए विस्तार से जानते हैं क्या है पूरा विवाद...

Avimukteshwaranand Controversy: स्नान से इनकार और 36 घंटे का धरना-विवाद क्या है ?
विवाद की शुरुआत मौनी अमावस्या (18-19 जनवरी 2026) को हुई, जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने समर्थकों के साथ 'धर्म रथ' (पालकी) पर सवार होकर संगम स्नान के लिए निकल रहे थे। प्रशासन ने भारी भीड़ और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए रथ को आगे ले जाने से रोक दिया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का आरोप है कि पुलिस ने उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें अपमानित किया। इसके विरोध में उन्होंने स्नान त्याग दिया और पिछले 36 घंटों से अपने शिविर के बाहर पालकी पर ही धरने पर बैठे हैं। उन्होंने मांग की है कि जब तक प्रशासन माफी नहीं मांगता और उन्हें ससम्मान स्नान नहीं कराया जाता, वे वहीं बैठे रहेंगे।
मेला प्राधिकरण का नोटिस: "आप शंकराचार्य कैसे?"
धरने के बीच सोमवार देर रात (लगभग 12:18 बजे) मेला प्रशासन की ओर से कानूनगो अनिल कुमार नोटिस लेकर स्वामी जी के शिविर पहुंचे। हालांकि, समर्थकों ने समय का हवाला देते हुए नोटिस लेने से मना कर दिया, लेकिन प्रशासन ने इसे आधिकारिक तौर पर तामील मान लिया है।
Prayagraj Mela Authority नोटिस के मुख्य बिंदु:
नोटिस में सिविल अपील संख्या 3010/2020 और 3011/2020 का जिक्र किया है, जो ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य पद को लेकर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के बीच लंबित मुकदमे से जुड़ी हैं।
इस नोटिस में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2022 को आदेश दिया था कि जब तक इस मामले का अंतिम निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक कोई भी नया पट्टाभिषेक नहीं हो सकता।
प्रशासन का आरोप है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने शिविर में जो बोर्ड लगाए हैं, उन पर 'शंकराचार्य' शब्द का प्रयोग किया गया है, जो कोर्ट के आदेशों की सीधी अवहेलना है। प्राधिकरण के उपाध्यक्ष की ओर से जारी इस पत्र में 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है।
प्रशासन vs स्वामी की जंग तेज
प्रयागराज की मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल और पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पष्ट किया कि स्वामी जी को स्नान करने से कभी नहीं रोका गया। प्रशासन का कहना है कि उन्हें केवल पहिए वाली पालकी ले जाने से मना किया गया था क्योंकि करोड़ों की भीड़ में इससे दुर्घटना का खतरा था।
दूसरी ओर, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों का कहना है कि शंकराचार्य की अपनी परंपराएं होती हैं और वे हमेशा पालकी में ही स्नान के लिए जाते रहे हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मामले में सरकार को घेरते हुए इसे संतों का अपमान बताया है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकते हैं, जिसमें वे इस नोटिस का जवाब देंगे। यदि 24 घंटे के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो मेला प्रशासन उनके शिविर के बाहर लगे बोर्ड हटवा सकता है या कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ा सकता है। फिलहाल, संगम तट पर तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले संभावित कदम पर टिकी हैं।












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