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गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल हैं गयासुद्दीन, बनाते हैं बाबा विश्वनाथ की पगड़ी

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    वाराणसी। रंगभरी एकादशी जिसका काशी में खासा महत्व है और हो भी क्यों नहीं इस दिन बाबा विश्वनाथ अपने ससुराल माता पार्वती की विदाई जो करने जाते हैं। पुराणों की मान्यता के अनुसार इसी दिन से काशी में होली की परम्परा की शुरुआत हो जाती हैं। पर इस परम्परा में सबसे खास महत्व रखती है बाबा विश्वनाथ की वो पगड़ी जिसे पहन कर महादेव अपने ससुराल जाते हैं। दरसअल ये पगड़ी बीते कई वर्षों से नई सड़क के रहने वाले गयासुद्दीन बनाते हैं, और ये ही नहीं ये तीसरी पीढ़ी हैं जो बाबा की सेवा कर रही हैं।

    गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल हैं गयासुद्दीन, बनाते हैं बाबा विश्वनाथ की पगड़ी

    पूरे एक महीने के कठिन परिश्रम के बाद ये अनोखी पगड़ी बन कर तैयार होती है, जिसे पहना कर बाबा अपने गौना के लिए जाते हैं। इस गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करने वाली परम्परा को काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत वासुदेव कुटुम्बकम मानते हैं । गयासुद्दीन का कहना हैं कि मुझे अद्भुत शांति की प्राप्ति मिलती हैं और ऐसे ही काशी के राजा ये सेवा मुझसे कराते रहे।

    क्या हैं रंगभरी एकादशी के दिन काशी की परम्परा

    देवो के देव महादेव महाशिवरात्रि के दिन विवाह के बाद रंगभरी एकादशी के दिन माता गौरा की विदाई करने के लिए अपने ससुराल जाते हैं , इसी परम्परा को बीते कई वर्षो से श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत परिवार के घर से बाबा विश्वनाथ , माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की रजत प्रतिमा की पालकी यात्रा महंत आवास से निकल कर काशी विश्नाथ मंदिर के गर्भग्रह के विग्रह के ऊपर ले जाकर रखी जाती हैं। इस बारात के काशी वासी अबीर और गुलाल के साथ साथ हर-हर महादेव का नारा लगाते हुए बारात लेकर जाते हैं , और इसी दिन से काशी में होली खेलने की शुरू आता हो जाती हैं। 

    मुस्‍लिम बनाते हैं भोलेनाथ की पगड़ी, तब जाते हैं बाबा ससुराल

    क्या कहते हैं गयासुद्दीन

    विश्वनाथ की पगड़ी बनाने वाले कारीगर हाजी गयासुद्दीन पेशे के पगड़ी मेकर है और इसी से इनकी जीविका भी चलती हैं। इनसे पहले इन्ही के परिवार के तीव पीढ़ियां भोलेनाथ के इस बारात के लिए बाबा की सेवा करती आ रही हैं। जब हमें इनसे बात कि तो हाजी गयासुद्दीन से बताया की मेरा सौभाग्य है की मैं मुस्लिम होते हुए पुरे विश्व के नाथ के लिए कुछ कर पता हू , समय जाती धर्म की बात तो बाद में आती हैं। शमशान और कब्रिस्तान की राजनीत के मुद्दे पर जब हमने गयासुद्दीन से पूछा तो उन्होंने कहा की मारने के बाद किसे पता हैं की वो हिन्दू है या मुसलमान है एक बात जरूर है की जो इस दुनिया में आया हैं उसे ऐब दिन जरूर जाना है

    क्या कहते हैं श्री काशी मंदिर के महन्त

    श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के महन्त पंडित कुलपति तिवारी ने oneindia को बताया की गयासुद्दीन का परिवार कई पीढ़ियों से बाबा की सेवा करता है और जैसा बाबा पगड़ी लगते हैं ऐसा ही हमारे परिवार के लोगो भी लगते हैं। यही नहीं महन्त जी ने कहा की भगवान भोलेनाथ के मस्तक पर चन्द्रमा विराजमान होता है और इसी चन्द्रमा को देखकर मुसलमान अपना ईद मनाता हैं।

    मुस्‍लिम बनाते हैं भोलेनाथ की पगड़ी, तब जाते हैं बाबा ससुराल

    जब हमे उन्हें श्मशान और कब्रिस्तान की होने वाली राजनीती पर इनसे बात की तो इन्होंने कहा की काशी की परम्परा गंगा जमुनी तहजीब की कई मिसाले दे चूका हैं जिसका प्रमाण आप बिस्म्मिला खान को देख ले ये विश्वनाथ के दरबार से लेकर बाबाजी घाट तक ' गंगा द्वारे बधिया बाजे ' बजाते हैं और उन्हें इस गीत पर भारत रत्न भी मिला और जो आज श्मशान और कब्रितान की बात करते हैं उन्हें लगता हैं की वो अमृत का प्याला पीकर आये हैं उन्हें यही रखना है तभी ऐसे बात करते हैं।

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    English summary
    Muslims keep alive spirit of Ganga-Jamuni tehzeeb in Varanasi.

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