केवल गंदगी नहीं, और भी हैं अमित शाह के भड़कने की वजहें
[अजय मोहन] भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपने वाराणसी दौरे के वक्त कार से उतरते ही बोले, "यहां गंदगी बहुत है, इसका कुछ करिये।" उनके चेहरे पर थोड़ा गुस्सा नज़र आया। बस इसी गुस्से को मीडिया ने सुर्खियों में बदल दिया- "गंदगी को लेकर यूपी सरकार पर भड़के अमित शाह", "वाराणसी के संकुल केंद्र में गंदगी देख कर भड़के अमित शाह", आदि...

पर सच पूछिए तो गंदगी के अलावा बहुत कुछ यूपी में है, जिसकी वजह से भाजपा अध्यक्ष कुछ खफ़ा-खफ़ा से हैं। इस पर हमने भाजपा के स्टेट लेवल के एक नेता से बात की, तो जवाब मिला, "संगठन इस वक्त सरकार से नाराज़ चल रहा है। सरकार के कामकाज से पार्टी आलाकमान खुश नहीं है। हम तो केवल सहयोग कर सकते हैं, बाकी निर्णय तो सरकार का रहता है।" पार्टी नेता ने अगर यह बात कही है, तो इसमें कोई शक नहीं कि यूपी में कुछ तो है, जो ठीक नहीं चल रहा है।
पार्टी के नजरिये से देखें, तो अमित शाह का गुस्सा जायज़ है। क्योंकि 2017 के चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने नहीं, बल्कि अमित शाह ने यूपी की जनता से वादे किये थे। 2019 में भी मोदी के दूत बनकर अमित शाह ही जनता के पास वोट मांगने जायेंगे। अब ऐसे में अगर जनता की नाराज़गी से रू-ब-रू होना पड़ा तो उससे पार्टी की छवि धूमिल हो सकती है। पार्टी द्वारा 2017 में किये गये कुछ बड़े वादों पर गौर करें, तो आपको समझ आ जायेगा की अमित शाह की नाराज़गी तर्कसंगत है या नहीं।
पहला वादा रोजगार का
अपने घोषणा पत्र में भाजपा ने 70 लाख नौकरियां / रोजगार देने का वादा किया था। साथ ही यह भी कहा था कि उनमें से 90 फीसदी नौकरियां स्थानीय युवाओं के लिये आरक्षित होंगी। इसे देखते हुए श्रम विभाग के वेब पोर्टल पर 15,92,163 (19 मई 2018 तक के आंकड़े) बेरोजगारों ने पंजीकरण करवाया। लेकिन अगर वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो कल ही राज्य सरकार ने अपने ऑफीशियल ट्वीट में लिखा "5 वर्ष में 50,000 करोड़ रुपये का होगा निवेश और 2.5 लाख रोजगार का होगा सृजन।"
वहीं मुख्यमंत्री रोजगार योजना का दायरा भी इतना छोटा है कि इसके अंतर्गत एक साल में केवल 1 लाख 19 हजार रोजगार ही सृजित किये जा सकते हैं। यानी अगर सरकार सफल रही तो 5 सालों में करीब 5.95 लाख बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। इसके अलावा श्रम विभाग द्वारा आयोजित रोजगार मेले में सरकार ने 60 हजार युवाओं को रोजगार दिये जाने का दावा किया। अगर ऐसे रोजगार मेले हर छह महीने में एक बार आयोजित किये जायें तो भी 5 सालों में केवल 6 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। यानी कुल मिलाकर वर्तमान परिस्थितियों में सरकार पांच वर्ष के कार्यकाल में 14.45 लाख लोगों को रोजगार देने में सक्षम है।
जरा सोचिये इतने प्रयासों के बाद भी अगर 70 लाख में से 55.55 लाख बेरोजगारों को रोजगार नहीं मिला तो अमित शाह की ज़ुबान का क्या होगा, जो उन्होंने चुनाव से पहले दी। फिलहाल राज्य सरकार की ओर से इस पर कोई स्पष्ट योजना तैयार नहीं है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति
अमित शाह ने वादा किया था कि उनकी पार्टी यूपी के हर गांव में उप-स्वास्थ्य केंद्र खोलेगी, जिसमें अत्याधुनिक तकनीक से युक्त मशीनें होंगी, जो त्वरित उपचार के काम आयेंगी। साथ ही 25 नये मेडिकल कॉलेज और विशेषज्ञ अस्पताल और प्रत्येक छह ब्लाक पर एक एम्स के जैसे अस्पताल खोलेंगे।
वर्तमान स्थिति- जनवरी 2018 में मुख्यमंत्री ने कहा था कि जुलाई तक रायबरेली एम्स में ओपीडी शुरू हो जायेगा। लेकिन फिलहाल न तो इस नये एम्स में ओपीडी शुरू हुई है और न ही एम्स जैसे अन्य नये अस्पतालों की नींव पड़ी है। अगले चार साल में हर छह ब्लॉक में एक स्पेशियलिटी हॉस्पिटल फिलहाल सपने जैसा ही है। हां कुछ योजनाएं जैसे 2000 डॉक्टरों की भर्ती, फ्री सीटी स्कैन, आदि की योजनाएं बनीं, लेकिन इसका ज्यादा प्रभाव देखने को नहीं मिला है।
यूपी की कानून व्यवस्था
भाजपा ने वादा किया था कि राज्य में अपराध को न्यूनतम स्तर पर ले आयेंगे। और कानून व्यवस्था को दुरुस्त कर देंगे। लेकिन फिलहाल यूपी100 सेवा के अलावा कुछ भी दुरुस्त नहीं दिख रहा है। यूपी 100 सेवा से आम जनता खुश है, लेकिन फिर भी अपराध घटने का नाम नहीं ले रहे हैं।
हम यहां रेप, मर्डर, आदि की घटनाओं को अलग कर दें तो भी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं योगी के शासन में पहले की तुलना में ज्यादा हुई हैं। एनएचआरसी के मुताबिक 2015 में 155, 2016 में 162 और 2017 में सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या बढ़ कर 195 रही। अगर जुडीशियल कस्टडी में मौतों की बात करें तो पूरे देश में 1530 घटनाएं हुईं, जिनमें से 365 केवल यूपी में हुईं। ऊपर से सुप्रीम कोर्ट ने योगी के ऑपरेशन क्लीन पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं।
भाजपा द्वारा किये गये ऐसे तमाम बड़े वादे हैं, जिन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी सीएम योगी आदित्यनाथ और उनके दो उपमुख्यमंत्रियों पर है। अप्रैल 2019 के पहले तक अगर सबकुछ दुरुस्त नहीं हुआ, तो अमित शाह का यूपी में 80 में से 75 सीटें जीतने का सपना टूट सकता है।
और जिस तरह से अमित शाह ने शहर की गंदगी को प्वाइंट आउट किया, उसी तरह से वो कभी भी, किसी भी खामी को प्वाइंट आउट कर सकते हैं। क्योंकि वो यूपी पर खास नज़रें बनाये हुए हैं। यूपी की छोटी-बड़ी उपलब्धियों की तुलना में यूपी की छोटी-छोटी खामियां अमित शाह के लिये ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि हर खामी में उन्हें वोट खोता हुआ नज़र आ रहा है।
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