जब भतीजी इंदिरा गांधी ने लगाया था आपातकाल तो कवयित्री महादेवी वर्मा ने तोड़ा था रिश्ता
इलाहाबाद। कवयित्री महादेवी वर्मा और आयरन लेडी इंदिरा गांधी दोनों ही अलग विधा के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने वाली सशक्त महिलाएं थी। इनके बीच आज भले ही कोई समानताएं या घटनाओं का जिक्र ना होता हो। लेकिन अपने दौर में यह दोनों शख्सियत एक-दूसरे के बेहद ही करीब थीं। इंदिरा गांधी महादेवी वर्मा को बुआ कहा करती थीं और महादेवी वर्मा इंदिरा गांधी को भतीजी की तरह ही लाड़ दुलार भी किया करती थीं। लेकिन, एक घटना ने इन दोनों के रिश्ते को विखंडित कर दिया था। क्या थी वह घटना ? उसके बारे में वरिष्ठ साहित्यकार व महादेवी वर्मा के बेहद नजदीकी रहे प्रद्युम्न नाथ तिवारी करुणेश भावविभोर होकर बताते हैं।

ऐसे बन गई थी बुआ
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के घर आनंद भवन में साहित्यकारों की जमात हमेशा ही लगती रहती थी। देशभर के सुविख्यात साहित्यकार यहां आया करते थे और उन्हीं में से एक साहित्यकार महादेवी वर्मा भी थीं। लेकिन महादेवी वर्मा को नेहरू जी बहन कहकर बुलाते थे और महादेवी वर्मा उन्हें राखी बांधा करती थीं। साहित्यकार प्रद्युम्न नाथ तिवारी बताते हैं कि महदेवी प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी राखी बांधती थीं और दोनों ही उन्हें अपनी बहन मानते थे। नेहरू जी तो महादेवी वर्मा को कभी कभी राखी बहन भी कहकर बुलाते थे। बेहद ही पारिवारिक संबंध होने के कारण ही इंदिरा गांधी महादेवी जी को बुआ मानती थीं। लेकिन, इंदिरा गांधी से उनका रिश्ता आपातकाल के दौरान टूट गया। दरअसल जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तो महादेवी वर्मा बेहद ही खफा हुईं। उन्होंने इसका विरोध किया तो इंदिरा ने उन्हें अनसुना कर दिया। जिससे नाराज महादेवी वर्मा इंदिरा गांधी से अपने सारे संबंध समाप्त कर लिए।
अपनी रचना को लेकर क्या कहती थीं
1982 में कवित्री महादेवी वर्मा का इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार व लेखक पृथ्वीनाथ पांडे सवाल-जवाब के दौरान महादेवी वर्मा द्वारा अपनी कविता की रचना को लेकर दिए गए एक बयान का जिक्र करते हैं। साथ ही बताते हैं कि जब उन्होंने महादेवी वर्मा से पूछा कि आप पद्य रचती हैं और गद्य भी लिखती हैं। ऐसे में दोनों की भावभूमि कैसे रचती हैं? तब महादेवी ने जवाब दिया था कि जब कविता रचती हूं तब रागात्मक अभिव्यक्ति देती हूं। जब विचारों की गहराई में डूबने लगती हूं तब गद्यरचना करती हूं। यह तो आपको भी स्वीकार करना पड़ेगा कि व्यक्ति उसी क्षेत्र में अधिक से अधिक कार्य करना चाहता है, जिसमें उसे सफलता मिलती जाती है।
पत्रकार पृथ्वीनाथ पांडे के अनुसार महादेवी वर्मा ने अपनी मृत्यु को लेकर एक बेहद ही मार्मिक वक्तव्य उस इंटरव्यू के दौरान दिया था। उन्होंने कहा था "देखो भाई! अन्तिम समय अपने देश की धरती पर यह शरीर गिरे। अब विदेश जाकर क्या करूंगी, शरीर ढल ही चुका है। बता दें कि 11 सितम्बर, 1987 को इलाहाबाद में ही महादेवी वर्मा का देहांत हो गया था।
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