Lok Sabha election 2024: केंद्र में 'कमजोर' सरकार क्यों चाहती हैं मायावती, बसपा के इतिहास में छिपी है वजह?

बहुजन समाज पार्टी (BSP) की अध्यक्ष मायावती लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र में एक तरह से मिली-जुली या कमजोर सरकार देखना चाहती हैं। उनका कहना है कि इस तरह के गठबंधन से बनी सरकार को समाज की सभी जातियों और समुदायों का समर्थन हासिल होगा।

सीधे शब्दों में समझें तो मायावती केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार के पक्ष में नहीं हैं। मायावती की यह लाइन बसपा के संस्थापक और उनके राजनीतिक गुरु कांशीराम के विचारों से प्रभावित है। उनका मानना था कि बहुमत वाली सरकार बहुजन समाज के प्रति 'निरंकुश' हो जाती है।

mayawati bsp 2024

'कमजोर' सरकार के हिमायती थे कांशीराम
कांशीराम अक्सर कहते थे कि 'जबतक बहुजन समाज देश पर पूरी तरह से शासन के लिए तैयार नहीं हो जाता, हमें 'कमजोर', न कि 'मजबूत' सरकार बनानी चाहिए।'

इंडिया ब्लॉक को आगाह कर चुकी हैं मायावती
शायद इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर बसपा सुप्रीमो ने हाल ही में विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक के सहयोगियों को भविष्य की परिस्थितियों के लिए तैयार रहने की हिदायत दे डाली थी।

मायावती ने कहा था, '...कोई भी बेमतलब की टिप्पणी करना सही नहीं है...क्योंकि भविष्य में कब किसको, किसी की आवश्यकता पड़ जाए, कुछ भी नहीं कहा जा सकता....'

राजनीतिक बैसाखियों ने बसपा को किया है बुलंद
अगर बसपा के सियासी विकास पर नजर डालें तो यह राजनीतिक बैसाखियों का सहारा लेकर ही यहां तक पहुंची है। पार्टी 14 अप्रैल, 1984 को बनी थी। पांच साल कुछ खास नहीं हुआ।

सपा से गठबंधन से पलट गई किस्मत
1989 में इसने दम दिखाना शुरू किया और 1993 में जैसे ही समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन हुआ, इसकी चुनावी किस्मत चमकनी शुरू हो गई। पहले कांशीराम ने कांग्रेस के साथ तालमेल की कोशिश की थी। लेकिन, तब कांग्रेस ने भाव नहीं दिया था।

लेकिन, जैसे ही कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने कई दौर की गुप्त बैठकों के बाद चुनावी गठबंधन का ऐलान किया, यूपी की राजनीति में खलबली मच गई। 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद बीजेपी यूपी में बहुत बड़ी ताकत बन चुकी थी।

92 के नवंबर में ही बनी सपा और बसपा को जीतने लायक फॉर्मूले का इंतजार था। 1991 में अकेली लड़कर संयुक्त उत्तर प्रदेश की 425 सीटों पर बीएसपी 12 सीटें ही जीत पाई थी। बाबरी गिरने के बाद कल्याण सिंह की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार बर्खास्त कर दी गई।

अगले चुनाव में बीजेपी 177 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई थी। बाबरी के बाद बीजेपी अन्य पार्टियों के लिए 'अछूत' बन गई थी।

गठबंधन में 256 पर लड़कर सपा को 109 और 164 सीटों पर लड़कर बीएसपी को 67 सीटें मिली थी। कांग्रेस ने गठबंधन को बाहर से समर्थन दिया और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

मायावती को पहली बार सीएम बनने का मौका
आगे चलकर बहुत ही अप्रिय स्थिति में सपा-बसपा की गठबंधन सरकार गिर गई। मायावती ने मुलायम के 'स्वार्थी रवैए' को प्रयोग फेल होने का कारण बताया। फिर बीजेपी के बाहरी समर्थन से मायावती यूपी की पहली दलित सीएम बनीं।

लेकिन, 2 जून, 1995 को यह सरकार गिर गई और अगले ही दिन 3 जून, 1995 को वह फिर सीएम बन गईं। इस दौरान जितने दिन वह कुर्सी पर रहीं अपने दलित एजेंडा को आगे बढ़ाती रहीं। इससे उन्होंने राज्य में अपनी एक खास राजनीतिक शख्सियत कायम कर ली।

कांग्रेस के साथ लड़ी तो वोट शेयर में आया उछाल
1996 के चुनाव में बसपा ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। लेकिन, दोनों मिलकर (बसपा-67 और कांग्रेस-33) भी कुल 100 सीटें ही जीत पाए। लेकिन, बीएसपी का वोट शेयर 11.12% से बढ़कर 19.64% हो गया।

भाजपा बार-बार हुई झटके का शिकार
दो महीने बाद बीएसपी ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़कर बीजेपी से एक बार फिर से हाथ मिला लिया। 6-6 महीने सीएम वाले फॉर्मूले पर सरकार बनी और पहला मौका फिर से मायावती को दिया गया। भाजपा सिर्फ बहुमत से दूर रही थी, लेकिन उसे बीएसपी को पहला चांस देना पड़ा।

6 महीने बाद उन्होंने कल्याण सिंह को सत्ता तो सौंपी, लेकिन महीना खत्म होने से पहले ही समर्थन खींच लिया। भाजपा ने किसी तरह से इधर-उधर से बहुमत जुटाकर सरकार बचा ली, लेकिन मतभेदों का शिकार रही।

2002 के चुनावों में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में बीजेपी-बीएसपी फिर से साथ आ गए। इस बार बीएसपी को 98 सीटें मिली थीं और बीजेपी के सिर्फ 88 विधायक जीते थे।

बसपा का वोट शेयर भी बढ़कर 23.06% हो चुका था। मायावती फिर से सीएम बनीं। लेकिन, दोनों दलों में मतभेद की वजह उन्होंने 128 दिन बाद ही इस्तीफा दे दिया। भाजपा को राजनीतिक रूप से काफी नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन, बीएसपी का जनाधार बढ़ता गया।

पहली बार मायावती ने बनाई बहुमत की सरकार
2007 के चुनाव में बीएसपी ने पहली बार बहुमत की सरकार बना ली और मायावती पूरे पांच साल के लिए मुख्यमंत्री बन गईं। 2012 में सपा ने बसपा की कुर्सी पलट दी। लेकिन, बीएसपी का वोट शेयर बढ़कर 30.43% हो गया, जो अबतक का सबसे ज्यादा है। यहीं से बीएसपी का ग्राफ गिरना शुरू हो गया।

2019 में सपा की बैसाखी ने फिर किया बसपा के लिए कमाल
2014 के लोकसभा चुनावों में पूरी तरह से साफ होने के बाद मायावती ने 2019 में मुलायम सिंह यादव से सारे मतभेद भुलाकर हाथ मिला लिए।

पार्टी को फिर से सपा की बैसाखी की बदौलत सफलता मिली और सहयोगी से दोगुनी यानी 10 सीटें जीत गई। राजनीति के जानकारों का कहना है कि बसपा के वोट सपा के उम्मीदवारों को ट्रांसफर नहीं हुए।

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2024 में मायावती की क्या हो सकती है उम्मीद?
अगर बीएसपी 2024 में भी खंडित जनादेश की उम्मीद पाल रही है तो इसके पीछे की वजह ये हो सकती है कि कुछ पार्टी दलित प्रधानमंत्री का दांव चलेगी तो मायावती की किस्मत की लॉटरी लग सकती है। हालांकि, ममता बनर्जी कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का सियासी शिगूफा पहले ही छोड़ चुकी हैं।

तथ्य यह है कि 1989 के लोकसभा चुनावों के 2% से 2019 के लोकसभा चुनावों तक बसपा का वोट शेयर 20% तक हो गया था। लेकिन, 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में यह गिरकर 12.88% तक चला गया है। यह चुनाव वह बिना किसी बैसाखी के लड़ी थी।

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