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Lok Sabha Election 2024: आसमान में कांग्रेस के 'अरमान'! कैसे महाराष्ट्र से बंगाल तक उलझ गया 'इंडिया'?

लोकसभा चुनावों के लिए इंडिया ब्लॉक में शामिल दलों के बीच फंसा सीट बंटवारे का पेच सुलझ नहीं रहा है। ममता बनर्जी के तेवर पहले ही विपक्ष के एकजुटता के हौसले को पस्त कर चुके हैं, उसपर से उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (यूबीटी) भी बदली हुई परिस्थितियों को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है।

लेकिन, इंडिया ब्लॉक में शामिल अन्य 27 दल चाहे जो भी तेवर दिखाएं कांग्रेस के सियासी 'अरमान' अभी भी आसमान पर नजर आ रहे हैं। चाहे हिंदी भाषी राज्यों के चुवावों में उसका जो भी हाल हुआ हो, दक्षिण भारत की जीत ने पार्टी नेताओं का हौसला बढ़ाकर रखा है।

india seat sharing

लगभग 300 सीटों पर लड़ना चाहती है कांग्रेस-रिपोर्ट
मीडिया रिपोर्ट की मानें तो कांग्रेस ने विभिन्न प्रदेश के अपने नेताओं के साथ जो सीटों के बंटवारे पर चर्चा की है, उसके हिसाब से आलाकमान को लगभग 300 सीटों पर चुनाव लड़ने के दावे के साथ अड़े रहने को कहा गया है।

यानी इंडिया ब्लॉक के अन्य 27 दल खुद को चाहे लोकसभा की 243 सीटों पर भले ही एडस्ट कर लें, बाकी सीटें कांग्रेस के लिए छोड़कर आगे की बात करें! जानकारी के मुताबिक कांग्रेस चाहती है कि सहयोगी दल उसे जीती हुई सीटों के अलावा वे सीटें भी दें, जिसपर वह दूसरे नंबर पर रही थी।

यही नहीं जानकारी के मुताबिक कांग्रेस सीट बंटवारे के फॉर्मूले का आधार भी विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को रखना चाहती है। सीट-शेयरिंग के मामले में सिर्फ कांग्रेस ही अड़ी हुई नहीं है। इसमें शामिल अन्य दल भी किसी से कम नहीं हैं।

महाराष्ट्र में 23 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही है उद्धव की पार्टी
जैसे महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (यूबीटी) अब मूल पार्टी का टुकड़ा भर रह गई है, लेकिन वह 2019 की तरह ही राज्य की 48 में से 23 सीटों पर ही चुनाव लड़ने का दावा ठोक रही है।

इतना ही नहीं, उद्धव की पार्टी मुंबई की भी अधिकतर सीटों पर खुद ही चुनाव लड़ना चाहती है, जिसे मानना कांग्रेस के लिए मुश्किल है। कांग्रेस को लगता है कि शिवसेना के टूटने से राजनीतिक हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। जानकारी के मुताबिक इस मुद्दे को सुलझाने के लिए उद्धव को दिल्ली आना पड़ सकता है।

यही वजह है कि सीटों के बंटवारे को लेकर इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) की दो डेडलाइन अबतक फेल हो चुकी है। टीएमसी चीफ और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की डेडलाइनल 31 दिसंबर की थी। सहयोगियों से उनकी नाराजगी के पीछे भी यही वजह बताई जा रही है।

बंगाल में 8 सीटें चाहती है कांग्रेस-सूत्र
जहां तक बंगाल की बात है तो ममता तो वहां के लिए एक तरह से गठबंधन की संभावनाएं खारिज ही कर चुकी हैं। लेकिन, कहा जा रहा है कि कांग्रेस अभी भी 8 सीटों की मांग कर रही है। जबकि, टीएमसी सुप्रीमो सार्वजनिक तौर पर कह चुकी हैं कि पार्टी सिर्फ मालदा और मुर्शिदाबाद जीत सकती है, जहां उसके सीटिंग एमपी हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने पार्टी नेतृत्व को बताया है कि उसके सहयोगी लेफ्ट फ्रंट का वोट शेयर जो हाल के चुनावों में बढ़ा है, उसके दम पर कांग्रेस का भी प्रदर्शन सुधर सकता है। लेकिन, यह दलील ममता को रिझा पाएगी, लग तो नहीं रहा है।

पंजाब, दिल्ली, हरियाणा से लेकर गुजरात तक में दिक्कत
जहां तक पंजाब और दिल्ली की बात है तो कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व लगातार आम आदमी पार्टी को गैर-भरोसेमंद बता रहा है। लेकिन, लगता है कि फिलहाल कांग्रेस आलाकमान के दिल में पार्टी जगह बना चुकी है।

वैसे आम आदमी पार्टी की नजरें हरियाणा पर भी टिक चुकी हैं और इससे कांग्रेस नेतृत्व की भी धड़कने बढ़ने की आशंकाएं पैदा हो गई हैं। कांग्रेस पंजाब में कम से कम 10 और दिल्ली में 2 सीटों की उम्मीदें पाले बैठी है, लेकिन आम आदमी पार्टी मानेगी, यह मानने का कोई कारण नहीं दिख रहा है।

आम आदमी पार्टी ने गुजरात में भी प्रदेश कांग्रेस नेताओं की चिंता बढ़ा रखी है। विधानसभा चुनावों के बाद आम आदमी पार्टी की यहां भी उम्मीदें बढ़ गई हैं।

यूपी में सीटों का बंटवार नहीं है आसान
इंडिया गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यूपी बन सकता है। यहां कांग्रेस अमेठी और रायबरेली जैसी परिवार की परंपरागत सीटें भी जीत लेगी, यह दावा अब वह नहीं कर सकती।

सपा इन दोनों सीटों पर तो फिर भी तैयार हो सकती है, लेकिन कहा जा रहा है कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी से 10 सीटें छोड़ने के लिए कह रही है।

सीट बंटवारे पर कांग्रेस के पास आखिरी कार्ड?
जानकारी यह मिली है कि कांग्रेस सहयोगी दलों को बताएगी कि अगर पार्टी देश में बीजेपी की तुलना में बहुत कम सीटों पर चुनाव लड़ी तो वह राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का विकल्प नजर नहीं आ पाएगी। ऐसे में विपक्षी दलों का इंडिया ब्लॉक बनाने का पूरा मकसद ही धाराशायी हो सकता है!

माना जा रहा है कि जब विपक्षी दलों के पल्ले यह बातें भी नहीं पड़ेंगी तो खुद सोनिया गांधी उन्हें समझाने, रिझाने, मनाने की एक अंतिम कोशिश करेंगी।

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