मुजफ्फरनगर की महापंचायत क्यों है योगी सरकार के लिए 'रेड सिग्नल', जानिए वेस्ट यूपी का ये खास गणित

मुजफ्फरनगर, 06 सितंबर। केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों का किसान पिछले कई महीनों से विरोध कर रहे हैं और तीनों ही कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। अपनी इसी मांग को लेकर लाखों किसानों ने उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में महापंचायत का आयोजन किया है। उत्तर प्रदेश में अब विधानसभा चुनाव को कुछ ही महीने का समय रह गया है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले जिस तरह से किसानों ने आक्रामक रुख अपनाना शुरू किया है वह भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किल का सबब बन सकती है।

महापंचायत का इतिहास

महापंचायत का इतिहास

मुजफ्फरनगर में किसानों की महापंचायत का इतिहास बेहद दिलचस्प है। इससे पहले 2003 और 2013 के बीच मुजफ्फरनगर में किसानों की महापंचायत जब भी हुई तो उस वक्त सरकार चली गई थी। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार किसानों की महापंचायत सत्ता में बदलाव करेगी। भारतीय किसान यूनियन के नेता लगातार एक-एक करके सरकार के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। जब भी ये नेता एकजुट हुए हैं तो उन्होंने सरकार को सत्ता से बेदखल किया है।

2003 में महेंद्र सिंह टिकैट ने खोला था मोर्चा

2003 में महेंद्र सिंह टिकैट ने खोला था मोर्चा

इससे पहले जब 4 फरवरी 2003 में जीआईसी मैदान में भारतीय किसान यूनियन की महापंचायत हुई थी तो उस वक्त प्रदेश में मायावती की सरकार थी। भाकियू के तत्कालीन अध्यक्ष चौधरी महेंद्र सिंह टिकैट ने कलेक्ट्रेट के बाहर जिस तह से पुलिस ने लाठीचार्ज किया था उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। आलम यह हुआ कि मायावती को अगले चुनाव में सत्ता से बाहर होना पड़ा।

2008 में मायावती को गंवानी पड़ी थी कुर्सी

2008 में मायावती को गंवानी पड़ी थी कुर्सी

2003 के बाद 8 अप्रैल 2008 में भी जीआईसी मैदान में बसपा सकार के खिलाफ महापंचायत का आयोजन किया गया। उस वक्त भी भाकियू अध्यक्ष चौधरी महेंद्र सिंह टिकैट को उनके एक बयान के बाद गिरफ्तार कर लिया गया था। उनकी गिरफ्तारी के बाद मुजफ्फरनगर में किसान महापंचायत का आयोजन हुआ और जैसा कि इतिहास रहा, 2012 में फिर से सत्ता परिवर्तन हुआ और बसपा को कुर्सी से हाथ धोना पड़ा।

2017 में भी हुआ था सत्ता परिवर्तन

2017 में भी हुआ था सत्ता परिवर्तन

मुजफ्फरनगर में कवाल कांड के बाद एक बार फिर से 2013 में 7 सितंबर को राकेश टिकैत ने नंगला मंदौड में पंचायत बुलाई। हालांकि इस महापंचायत के बाद दंगे भड़क गए जिसके बाद लोगों में सरकार के प्रति गुस्सा भड़क गया। आलम यह हुआ कि समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा और प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी। ऐसे में एक बार फिर से 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनाव से ठीक पहले किसानों की इस महापंचायत ने सियासी गलियारों की हलचल को बढ़ा दिया है। बहरहाल अब हर किसी की नजर आगामी चुनाव पर होगी कि क्या एक बार फिर से मुजफ्फरनगर में महापंचायत का इतिहास सत्ता परिवर्तन को दोहराएगा।

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