खतौली विधानसभा सीट: मतदाताओं के मन की थाह लेना सभी दलों के लिए चुनौती, जानिए ग्राउंड रिपोर्ट
लखनऊ, 4 फरवरी: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दल अपनी अपनी रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। सभी दलों की और से मतदाताओं को साधने की कोशिश हो रही है लेकिन मतदाताओं के मन की थाह लेना सभी के लिए काफी मुश्किल साबित हो रहा है। यही वजह है कि मुजफ्फरनगर की खतौली सीट का सियासी पारा तेजी से ऊपर नीचे हो रहा है। पिछले चुनाव में बीजेपी को यहां से जिले की सबसे बड़ी जीत मिली थी लेकिन पांच साल के भीतर यहां के राजनीतिक समीकरण में काफी बदलाव आया है जिससे बीजेपी के सामने चुनौती ज्यादा बढ़ गई है।

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के विक्रम सैनी समाजवादी पार्टी और आरएलडी के उम्मीदवार मदन चौहान को 31 हजार मतों से हराया था। इस बार भी बीजेपी ने विक्रम सैनी पर भी दाव लगाया है। बीजेपी जाट और गुर्जर मतों में सेंधमारी की कोशिश में जुटी हुई है वहीं दूसरी तरफ आरएलडी और सपा के गठबंधन ने पूर्व राज्यसभा सदस्य राजपाल सैनी को टिकट दिया है। मुस्लिम जाट मतदाताओं को साधने के साथ ही वो अपनी बिरादरी में भी पैठ बनाने में जुटी हुई है।
पिछले चुनाव में राजपाल सैनी के बेटे सिवान सैनी खतौली से ही चुनाव लडा था लेकिन चुनाव हार गए थे। राजपाल सैनी बीएसपी को छोड़कर सपा में शामिल हो गए थे और इस बार गठबंधन के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। आरएलडी के टिकट पर वो 2012 में यहां से विधायक बने थे लेकिन 2017 में वो बागपत सीट से चुनाव लड़े थे। कांग्रेस ने यहां युवा चेहरे गौरव भाटी पर दाव लगाया है।
क्या कहती है जातीय वोटों की गणित
खतौली विधानसभा सीट पर मुस्लिम की तादाद सबसे ज्यादा 90 हजार है। इसके बाद यहां दूसरे नंबर पर दलित मतदाता 47 हजार हैं। सैनी वोटरों की संख्या 35 हजार, जाट 25 हजार राजपूत 22 हजार और गुर्जर 23 हजार हैं। वहीं पिछले चुनावी नतीजों की बात करें तो बीजेपी के विक्रम सैनी को 94771 वोट मिले थे जबकि चंदन चौहान को सपा से 63 हजार वोट मिले थे। बीएसपी के शिवान सैनी को 37 हजार और आरएलडी के सहनावाज राणा को 12 हजार से ज्यादा वोट मिले थे।
ध्रुवीकरण पर टिकी बीजेपी की निगाहें
खतौली में हालाकि प्रत्याशियों के सामने चुनौती ही चुनौती है। किसान आंदोलन के बाद बदले हुए माहौल में बीजेपी के सामने चुनौती है। बीजेपी की पूरी गणित ध्रुवीकरण पर टिकी हुई है। पिछले चुनाव में बीजेपी का सीधा मुकाबला सपा के साथ हुआ था। बीएसपी तीसरे और आरएलडी चौथे स्थान पर थी। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो बीजेपी इस बार गैर मुस्लिम मतों में अपनी पैठ बनाने में जुटी हुई है। लेकिन बीजेपी की रह इस बार आसान नहीं होगी क्योंकि किसान आंदोलन के बाद जाटों की नाराजगी काफी बढ़ गई है।












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