HC ने क्यों कहा ? 'FIR कोई पॉर्न साहित्य नहीं है, जिसमें चित्रमय विवरण दिया जाए'
लखनऊ, 16 जून: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद के एक मामले में दर्ज प्राथमिकी में इस्तेमाल की गई भाषा पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि एफआईआर तो संज्ञेय अपराध के मामले में सिर्फ सूचना दर्ज कराने का एक जरिया है, जिसके आधार पर कार्रवाई शुरू की जा सके। लेकिन, इसकी भाषा किसी भी सूरत में अमर्यादित नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में कई बार बढ़ा-चढ़ाकर आरोप लगा दिए जाते हैं, लेकिन पुलिस को सामान्य मामलों में कूलिंग पीरियड के दौरान किसी की भी गिरफ्तारी से बचना चाहिए।

ससुर-देवर पर यौन उत्पीड़न का लगाया था आरोप
इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने एक ऐसा वैवाहिक विवाद आया, जिसमें अदालत को बहुत ही सख्त टिप्पणी करनी पड़ गई। शिकायत करने वाली महिला ने अपने पति, ससुर और देवर पर यौन उत्पीड़न और दहेज के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया था। उसने एफआईआर में अपनी सास का भी नाम दर्ज करवाया था। मामला उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के पिलखुआ थाने का है, जहां वह महिला रहती है। एफआईआर में आरोपियों पर आईपीसी की धारा 498-ए, 307 (हत्या की कोशिश), 120-बी (आपराधिक साजिश) और 323 (जानबूझकर नुकसान) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

पति पर लगाया था अप्राकृतिक संबंध बनाने का आरोप
अपनी शिकायत में महिला ने आरोप लगाया था कि उसके ससुर ने उससे यौन सुख की मांग की थी। जबकि, अपने देवर के खिलाफ उसने 'शारीरिक तौर पर उसे बर्बाद' करने की कोशिश का आरोप लगाया था। यहां तक कि महिला ने अपनी सास और ननद पर भी गर्भपात के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया था। एफआईआर में उसने अपने पति पर अप्राकृतिक और जबरन यौन संबंध बनाने का भी आरोप लगाया था। महिला का आरोप था कि उससे लगातार अतिरिक्त दहेज की मांग की जा रही थी और इनकार करने पर उसकी पिटाई की गई और अपमानित किया गया।

प्राथमिकी कोई पॉर्न साहित्य नहीं है- इलाहाबाद हाई कोर्ट
लेकिन, एफआईआर में दर्ज भाषा इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज को बहुत ही अटपटी लगी। जस्टिस राहुल चतुर्वेदी ने अपनी टिप्पणी में कहा, 'प्राथमिकी वह स्थान है जहां सूचना देने वाला संज्ञेय अपराध के बारे में राज्य तंत्र को लामबंद करने के लिए जानकारी देता है। यह कई पॉर्न साहित्य नहीं है, जहां चित्रमय विवरण दिया जाना चाहिए।' सत्र न्यायालय में सुनवाई के दौरा इस मामले की जांच में आरोपों क निराधार पाया गया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में समीक्षा याचिका डाला था।

'कूलिंग पीरियड' में गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए-कोर्ट
जज ने कहा कि 'सूचना देने वाले की ओर से इस्तेमाल की गई इस तरह की भाषा पर अदालत कठोर शब्दों में अपवाद दर्ज करता है। एफआईआर की भाषा शालीन होनी चाहिए और सूचना देने वाले के द्वारा सामना किए गए अत्याचारों की कोई भी मात्रा, इस तरह की कटू अभिव्यक्ति को उचित नहीं ठहराएगी।' हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों में कई बार दहेज संबंधी उत्पीड़न के आरोपों को 'कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर' पेश किया जाता है। इसको लेकर अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद दो महीने के 'कूलिंग पीरियड' के दौरान ऐसे मामलों में कोई भी गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए।

आरोपों को साबित नहीं कर पाई थी महिला
जस्टिस चतुर्वेदी ने कहा कि 'दिलचस्प बात तो ये है कि जांच के दौरान भी वो उन आरोपों को साबित नहीं कर पायी; और ये आरोप झूठे पाए गए, जिसके चलते इससे जुड़ी धाराओं को हटा दिया गया था।' अदालत ने कहा कि दो महीने के कूलिंग पीरियड के दौरान मामले को तत्काल फैमिली वेलफेयर कमिटी को सौंपा जाना चाहिए, ताकि वैवाहिक विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाया जा सके। साथ ही अदालत ने ये भी साफ किया कि वेलफेयर कमिटी को वही मामला भेजा जाना चाहिए, जिसमें 10 साल की कम की सजा का प्रावधान हो और महिला को कोई शारीरिक चोट न पहुंचाई गई हो। अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया है।












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