दो दशक से भी अधिक समय से गायों की सेवा कर रहे हैं नूर और अली
यूपी के मेरठ में नूर और अली गायों की ना सिर्फ सेवा करते हैं बल्कि उनकी पूजा भी करते हैं, दो दशक से अधिक समय से यह सिलसिला जारी है।
लखनऊ। यूपी में चुनाव के दौरान गोरक्षा बड़ा मुद्दा रहा, खुद पीएम मोदी भी वाराणसी में गोशाला गए और उसे चारा खिलाया, यही नहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्याथ भी गोरखपुर में गोशाला चलाते हैं। लेकिन मेरठ में 61 वर्षीय अली हसन एक अलग मिशाल कायम कर रहे हैं, वह हर रोज सुबह 6 बजे जग जाते हैं और घर के काम करने के बाद वह गोपाल गौशाला जाते हैं और यहां इनकी सेवा करते हैं।

बीफ विवाद से कोई मतलब नहीं
अली हसन अपने दोस्त नूर हसन के साथ गोशाला जाते हैं और गायों को नहलाते हैं, जिसके बाद वह यहां इनके लिए चारा काटते हैं और खिलाते हैं। अली हसन इस काम को तकरीबन 45 सालों से लगातार कर रहे हैं, जबकि नूर हसन इस काम को 20 साल से कर रहे हैं और उनकी उम्र 45 वर्ष है। इस गोशाला में कुल 800 गाएं हैं, जिनमें से कई गायों का जिम्मा नूर और अली के पास है और ये दोनों ही मौजूदा समय में चल रहे बीफ विवाद से बिल्कुल दूर हैं।
मौजूदा बहस से दूर नूर और अली ना सिर्फ इन गायों की सेवा करते हैं बल्कि इनकी पूजा भी करते हैं। तकरीबन 108 साल पुराने इस गोशाला में काम कर रहे अली अपने काम से पूरी तरह से संतुष्ट हैं, वह भगवा रंग का गमछा अपने कंधे पर रखते हैं, वह कहते हैं कि गोवर्धन पूजा में भी वह हिस्सा लेते हैं, वहीं नूर भी गायों को अपने परिवार का सदस्य मानते हैं।
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जो लोग सवाल उठाते हैं हम उनकी परवाह नहीं करते
नूर कहते हैं कि गाएं हमारे परिवार का हिस्सा बन गई हैं, जिस दिन मेरी तबियत ठीक नहीं होती और मैं यहां नहीं आ पाता तो मेरा बेटा इनकी देखरेख करता है। गोपाल गोशाला में 800 गाएं हैं और कई लोगों में इनकी जिम्मेदारी को बांटा गया है। इस गोशाला में कुल 60 देखरेख करने वाले हैं जिसमें नूर और अली भी शामिल हैं, यह गोशाला मेरठ के मोखमपुर में है। वहीं जब नूर और अली से पूछा गया कि क्या आपके काम को लेकर आपके परिवार में कोई आपत्ति नहीं करता तो नूर बताते हैं कि इससे किसी को मतलब नहीं है, इससे मैं पैसा कमाता हूं और यह मेरे लिए अल्लाह से कम नहीं है, कुछ लोग सवाल उठाते हैं लेकिन मैं उनकी परवाह नहीं करता हूं, मैं अपने काम में विश्वास रखता हूं।
हम मांस खाना छोड़ देंगे, यह कोई बड़ी बात नहीं
यूपी में कई गोशालाएं चलाई जाती हैं जिसमें से यह एक मेरठ में है जिसे 21 लोग मिलकर चलाते हैं, यहां गायों को रखने का एकमात्र कारण उनका दूध निकालना नहीं है। गोशाला के मैनेजर उमेश पांडे का कहना है कि 8000 गायों में से सिर्फ 100 गाएं ही दूध देती हैं, बाकी अन्य को या तो कत्लखानों से बचाकर लाया गया है या फिर जिन गायों को किसानों ने छोड़ दिया है उन्हें यहां लाया गया है। कत्लखानों पर चल रहे डंडे पर नूर का कहना है कि सच कहूं तो इसका कोई खास मतलब नहीं है, ज्यादा से ज्यादा क्या होगा हमें मांस मिलना बंद हो जाएगा, हम मांस छोड़ने को तैयार हैं, यह कोई बड़ी बात नहीं है।
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