5 चुनाव में केवल 1 सीट तक कैसे सिमटी "बहनजी" की बसपा, जानिए 5 बड़ी वजहें
लखनऊ, 11 मार्च: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं और उसके नतीजे भी आ गए हैं। चुनाव में सबसे ज्यादा झटका बसपा की सुप्रीमो मायावती को ही लगा है। 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के दम पर पुर्ण बहुमत की सरकार बनााने वाली बसपा आज एक सीट पर सिमट कर रह गयी है। एक समय था जब दलित मायावती का कोर वोटर हुआ करता था लेकिन पिछले पांच चुनावों में मिल रही हार से ऐसा लग रहा है कि एक तरफ जहां मायावती की सोशल इंजीनियरिंग ध्वस्त हो गई है वहीं दूसरी ओर उनका कोर वोट बैंक भी छिटकता जा रहा है। आइए हम जानते हैं कि वो कौन सी वजहें हैं जिनकी वजह से मायावती को आज 206 सीट से केवल एक सीट तक सिमटना पड़ गया है।

यूपी में लगाातर पांच चुनावों में बसपा को मिली शिकस्त
यूपी में पार्टी के केवल एक विधायक ने चुनाव जीता है। हालांकि चुनाव में बसपा को 12 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं। लेकिन संख्या के आधार पर वह सिर्फ एक सीट ही जीत पाई है। खास बात यह है कि बसपा का गढ़ कहे जाने वाले जिलों में भी पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ रहा है और 2017 के बाद यह पार्टी की लगातार दूसरी हार है। यदि 2007 के बाद से ही देखें तो बसपा का 2012 के विधानसभा चुनाव, 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2014 में हुए आम चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन रहा है। बसपा का वोट बैंक लगातार खिसकता चला गया। कभी 30 फीसदी वोट पाकर बहुमत की सरकार बनाने वाली मायावती आज 12 फीसदी पर सिमट गई हैं।

दलित बाहुल्य सीटों पर भी पकड़ हुई ढीली
दरअसल, 2017 के चुनाव में बीजेपी की आंधी के बावजूद बसपा राज्य में 19 सीटें जीतने में सफल रही थी और इस दौरान उसने अंबेडकर नगर जिले में सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं। लेकिन इस चुनाव में वह अपना किला भी नहीं बचा पाईं और राजनीतिक रूप से हाशिए पर चली गई हैं। दरअसल मायावती पश्चिमी यूपी से आती हैं और बीएसएपी हमेशा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आगरा, और बिजनौर जैसे जिलों में जीती है और पार्टी ने यहां अधिक सीटें जीती हैं। अगर बात करें 2007 की तो बसपा ने राज्य में सरकार बनाई थी और इसमें पश्चिम उत्तर प्रदेश ने अहम भूमिका निभाई थी। किन 2012 से पार्टी का जनाधार घटने लगा और हालत यह है कि राज्य में बसपा एक सीट पर सिमट गई है।

नहीं चला मायावती का ब्राह्मण कार्ड
दलितों के अलावा मायावती की सबसे बड़ी यूएसपी ब्राह्मणों का साथ होना भी रही है लेकिन राष्ट्रीय फलक पर जैसे ही पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे रणनीतिकारों का उदय हुआ वैसे ही 2014 के बाद से ही बीजेपी ने दलित के साथ ही ब्राह्मण वोट बैंक में भी सेंध लगाने की कवायद शुरू कर दी थी। अब ऐसी स्थिति आ गई है कि मायावती के गढ़ आगरा मंडल में बीजेपी ने जाटवों में बड़ी सेंधमारी की है तो ब्राह्मण समुदाय में एक सकारात्मक मैसेज देने में सफल रही है। बसपा की मुखिया मायावती ने इस बार भी पूर्वांचल में ब्राह्मणों को काफी संख्या में टिकट दिया था लेकिन उसका भी फायदा उनको नहीं मिला है।

मुस्लिम के सपा में जाने से बसपा कमजोर हुई
इस चुनाव में भी बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले का इस्तेमाल किया था और इसी फॉर्मूले के आधार पर 2007 में सरकार बनाई थी। वहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी को वह समर्थन नहीं मिला जो पहले मिलता था। इसलिए पार्टी इन क्षेत्रों में पूरी तरह विफल साबित हुई है। आगरा में, बसपा एत्मादपुर, आगरा ग्रामीण, आगरा कैंट, फतेहपुर सीकरी और खेरागढ़ में चुनाव जीतती रही है लेकिन बसपा को इस चुनाव में बुरी हार का सामना करना पड़ा है। दलित-मुस्लिम और ब्राह्मण के गठजोड़ से सरकार बनाने वाली मायावती के पास अब इन तीन जातियों में से एक भी खड़ी नहीं दिख रही है। मुस्लिम इस बार लगभग सपा के साथ रहा। यही वजह है कि मायावती अब यह बयान दे रही हैं कि मुस्लिमों ने सपा के साथ जाने की बड़ी भूल की है। बीजेपी से केवल बसपा ही मुकाबला कर सकती है।

कई करीबी नेताओं ने भी छोड़ा साथ
बसपा में पहले भी कई नेता पार्टी को अलविदा कह चुके हैं जबकि ये नेता पार्टी के स्तंभ हुआ करते थे। वहीं, अंबेडकर नगर को बसपा का गढ़ कहा जाता था। लेकिन इस बार पार्टी को यहां सबसे बड़ा झटका लगा है. इस जिले में कुल पांच विधानसभा सीटें हैं और पिछले चुनाव में पार्टी कटेहरी, जलालपुर और अकबरपुर जीतने में सफल रही थी. 2017 के विधानसभा चुनाव में कटेहरी से लालजी वर्मा और अकबरपुर से जीते रामचल राजभर ने चुनाव जीता था. लेकिन इस बार इन दोनों नेताओं ने सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। वहीं, बसपा ने भी नए नेताओं पर दांव लगाया था। लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।












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