यूपी के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने इस बार कैसे मारी बाजी, चौंका देगी ये रिपोर्ट
लखनऊ, 13 जुलाई: मई महीने में उत्तर प्रदेश में पंचायतों के चुनाव हुए थे। उस चुनाव में सपा समर्थित उम्मीदवारों को भारी कामयाबी मिली थी। उस रेस में सत्ताधारी बीजेपी उससे काफी पिछड़ गई थी। दो महीने बाद पंचायत के उन्हीं चुने हुए सदस्यों के जरिए जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों के अप्रत्यक्ष चुनाव करवाए गए। इस चुनाव में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने समाजवादी पार्टी समर्थित प्रत्याशियों की लुटिया डुबो दी। सवाल है कि दो महीने से भी कम समय में ऐसा करिश्मा कैसे हो गया ? आइए समझने की कोशिश करते हैं कि यूपी में इसबार योगीराज में कोई 'खेला' हुआ है या वहां के स्थानीय निकाय चुनावों का यह पुराना ट्रेंड है।

जिला पंचायत अध्यक्ष-ब्लॉक प्रमुखों के चुनाव में भाजपा का परचम
यूपी में हाल में आए जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों के चुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी समेत सभी विपक्षी दलों को चारों खाने चित कर दिया है। सबसे बड़ी बात ये है कि बीजेपी समर्थित उम्मीदवारों ने बड़ी संख्या में निर्विरोध जीत का झंडा गाड़ा है और इसलिए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव उसपर धांधली का आरोप लगा रहे हैं। विपक्ष का दावा है कि 30 से 40 फीसदी सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन ही इस बात का सबूत है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए सरकारी मशीनरी का बेजा इस्तेमाल किया है। यही नहीं विपक्षी पार्टियां भाजपा पर हिंसा और दबाव का हथकंडा अपनाने के भी आरोप लगा रही हैं।

क्या है यूपी में स्थानीय निकाय चुनावों का पैटर्न
यूपी में जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों का चुनाव अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। यानी इसमें मतदाता सीधे वोट नहीं डालते, बल्कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि अपने नुमाइंदों का चुनाव करते हैं। सपा के आरोपों के पीछे की वजह यही है कि मई में हुए पंचायत चुनावों में जब वोटरों ने सीधे वोटिंग की थी, तब उसके समर्थित उम्मीदवारों को बीजेपी समर्थित प्रत्याशियों के मुकाबला बहुत ज्यादा सफलता मिली थी। गौरतलब है कि यूपी में स्थानीय निकाय चुनाव पार्टी के चुनाव चिन्हों पर नहीं लड़े जाते, लेकिन राजनीतिक दल उम्मीदवारों को पीछे से समर्थन देते हैं। लेकिन, सपा के दावों के उलट उत्तर प्रदेश में अगर हम पिछले स्थानीय चुनावों का रिकॉर्ड देखें, तो जो भी सत्ताधारी पार्टी होती है, अप्रत्यक्ष चुनावों में उसी का परचम लहराने का पैटर्न नजर आता है।

2016 में कैसे आए थे नतीजे ?
उदाहरण के लिए 2016 के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों को ही लेते हैं। तब समाजवादी पार्टी सत्ता में थी और अखिलेश यादव सूबे के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। उस समय भी यही पैटर्न नजर आया था, जो इस बार देखा गया है। पंचायत चुनावों में मायावती की बहुजन समाज पार्टी से कम सीटें जीतने के बावजूद सपा ने जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों की अधिकतर सीटों पर कब्जा कर लिया था। सच तो ये है कि सपा जिला पंचायत अध्यक्षों की 49 फीसदी या 36 सीटें निर्विरोध जीत गई थी। जबकि, इस साल भाजपा सिर्फ 21 यानी 28 फीसदी सीटें ही निर्विरोध जीती है।

2016 में निर्विरोध जीत का आंकड़ा क्या था
इसी तरह 2016 के ब्लॉक प्रमुखों के चुनाव में कुल 385 यानी 47 फीसदी सीटें निर्विरोध जीती गई थीं, जो कि इस बार बीजेपी को निर्विरोध मिली 334 (40%) सीटों से ज्यादा थी। हालांकि, 2016 का पार्टियों के मुताबिक सीटों का ब्रेकअप उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह मान लेने की पूरी गुंजाइश है कि समाजवादी पार्टी को ही उनमें से ज्यादातर सीटों पर सफलता हासिल हुई थी। जैसा कि पहले बताया गया है कि इसमें पार्टियां अपने चुनाव निशानों पर भाग नहीं लेतीं, इसलिए जो भी आंकड़े दिए गए हैं, वह राजनीतिक दलों के सीटों के विश्लेषण पर आधारित हैं।

यूपी में स्थानीय चुनाव में हिंसा का इतिहास
यूपी में इस बार ब्लॉक प्रमुख और जिला परिषद के चुनाव में हिंसा की घटनाओं पर भी खूब तूफान मचा हुआ है। लखीमपुर खीरी में सपा की एक महिला कार्यकर्ता से अभद्रता का कथित आरोप बीजेपी समर्थकों पर लगा है, जिसका वीडियो खूब वायरल हो रहा है। लेकिन, यूपी में लोकल बॉडी चुनावों में हिंसा की कहानी भी नई नहीं है। 2016 में तो ब्लॉक प्रमुख चुनाव में इलाहाबाद के बहादुरपुर गांव में लोग इतने गुस्से में थे कि तत्कालीन सपा विधायकों प्रशांत सिंह और सईद अहमद की गाड़ियां हीं फूंक डाली थी। अलबत्ता, राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी सहजता के मुताबिक उसपर दावे और आरोप-प्रत्यारोप जरूर करती रही हैं। चाहे, सपा की सरकार रही हो या बसपा की या फिर मौजूदा बीजेपी की। यूपी में स्थानीय चुनावों में हिंसा देखी जाती रही है। (अंतिम तस्वीर- 10 फरवरी, 2016, इलाहाबाद)












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