इलाहाबाद: फाफामऊ सीट पर जातिगत होगा जीत का आंकड़ा, कोई भी विधायक यहां नहीं जीत पाया है दुबारा
फाफामऊ विधानसभा में निर्दलीय उम्मीदवारों की दमदार मौजूदगी के बावजूद त्रिकोणीय लड़ाई की उम्मीद का निर्णय लगभग 4 लाख मतदाता करेंगे। आंकड़ों के मुताबिक इस सीट पर सबसे ज्यादा मतदाता यादव बिरादरी के हैं।
इलाहाबाद। फाफामऊ विधानसभा हमेशा से चर्चा में रही है। कई मंत्री देने वाली इस सीट पर हमेशा से जातिगत आंकड़े हार-जीत तय करते रहे हैं लेकिन कोई भी विधायक यहां लगातार दो चुनाव नहीं जीत सका है। पूर्व में यह विधानसभा नवाबगंज के नाम से जानी जाती थी लेकिन नए परिसीमन के बाद क्षेत्र का नाम फाफामऊ कर दिया गया। इस सीट की एक और दिलचस्प बात यह है कि यहां प्रत्याशी पार्टी बदलने के मामले में सबसे आगे रहते हैं।

यहां दिलचस्प है जाति का आंकड़ा
फाफामऊ विधानसभा में निर्दलीय उम्मीदवारों की दमदार मौजूदगी के बावजूद त्रिकोणीय लड़ाई की उम्मीद का निर्णय 3,51,300 मतदाता करेंगे। विक्रमाजीत मौर्य भाजपा-अद गठबंधन के बाद भगवा दल की बड़ी उम्मीद हैं। तो पिछले 17 सालों से राजनीतिक समीकरण को बदल रहे मनोज पाण्डेय इस बार बसपा की नैया पार लगाने के सबसे मजबूत दावेदार हैं। अभी तक के अनुमान में वो जातिगत समीकरण को अपनी तरफ मोड़ने में कामयाब रहे हैं। सही मायनों में बसपा ने पूर्व विधायक गुरू प्रसाद मौर्य का टिकट काट कर मास्टर स्ट्रोक चला है। हालांकि मौजूदा विधायक अंसार को कहीं से नुकसान होता नहीं दिखा है।

'यादव' की संख्या है सबसे ज्यादा
आंकड़ों के मुताबिक इस सीट पर सबसे अधिक 62 हजार मतदाता यादव बिरादरी के हैं। दूसरे नंबर पर ब्राह्मण मतदाता हैं। सवर्ण जातियों के साथ इनकी संख्या 70 हजार तक है। जबकि दलित मतदाता 40 हजार, मुस्लिम मतदाता 30 हजार, ओबीसी वर्ग में 28 हजार तो मौर्य 40 हजार और पटेल मतदाता भी यहां मौजूद हैं।

कौन है दमदार?
फाफामऊ सीट में इस बार भी कई पुराने खिलाड़ी नए निशान पर जोर आजमाइश कर रहे हैं। चारो बड़े दलों ने जीत के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा ने यहां प्रभाशंकर पाण्डेय के माध्यम से एक बार खाता खोल था। इस बार भाजपा ने अपना दल से गठबंधन कर दलबदलू विक्रमाजीत मौर्य को उतारा है। जबकि बसपा ने पूर्व विधायक गुरू प्रसाद मौर्य का टिकट काटकर पिछले चुनाव में निर्दलीय चुनाव लड़े मनोज पाण्डेय को मैदान में उतारा है। दूसरी ओर अपना दल से जीत दर्ज कर राजनीति में चमके अंसार अहमद सपा के मौजूदा विधायक हैं और फिर से मैदान में हैं।

क्या रही है प्रत्याशियों की कोशिश?
बसपा से चुनाव लड़ रहे मनोज पांडेय बसपा के फिक्स वोट बैंक के साथ ही ब्राह्मण वोटों को पूरी तरह साथ लेकर चल रहे हैं। साथ ही जमीनी नेता होने के चलते उनके साथ व्यक्तिगत वोटों की बड़ी संख्या है। सपा प्रत्याशी अंसार अहमद जातिगत आंकड़ों और अल्पसंख्यक वोटरों के भरोसे चुनाव में बने हुए हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन के बाद वोटों का बंटवारा रुकेगा और जीत होगी। भाजपा के प्रत्याशी विक्रमाजीत मौर्य ने सबका साथ-सबका विकास के नारे से मतदाओं को अपने पक्ष में मतदान करने का गणित समझाया है। लहर की बात अगर सच हुई तो यह भी प्रबल दावेदार होंगे।












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