बीएसपी को यूपी में गठबंधन से फायदा नहीं होता, मायावती के दावे में कितना दम?
बीएसपी प्रमुख मायावती ने एक बार फिर से ऐलान किया है कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में अगला लोकसभा चुनाव अकेले लड़ेगी। इसके पीछे उनकी दलील है कि प्रदेश में गठबंधन से उन्हें चुनावी फायदा नहीं होता।
बसपा सुप्रीमो का दावा है कि यूपी में जब भी इसने दूसरे दलों के साथ चुनावी गठबंधन किया है, उनकी पार्टी का वोट सहयोगी दलों को तो ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन इनके पक्ष में दूसरों का वोट नहीं आ पाता।

यूपी में गठबंधन से बीएसपी को फायदा नहीं होता- मायावती
बीएसपी चीफ के मुताबिक यह 'कड़वी सच्चाई' है, जिसके चलते उनके पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ता है। इसलिए उन्होंने संसदीय चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया है।
उन्होंने कहा, 'यूपी में गठबंधन करने से बीएसपी को फायदे से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा.... क्योंकि इसके वोट तो गठबंधन सहयोगी को ट्रांसफर हो गए, लेकिन दूसरे दलों में हमारे उम्मीदवार को अपना वोट ट्रांसफर करने का सही इरादा या क्षमता नहीं है।'
यूपी में बीएसपी का गठबंधन में ट्रैक रिकॉर्ड:
पहली बार
1993 के विधानसभा चुनावों में बहुजन समाजवादी पार्टी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। 422 सीटों पर चुनाव हुए थे, जिसमें सिर्फ 164 सीटों पर लड़कर बीएसपी ने 67 सीटें जीती थीं। जबकि, उसे कुल मिलाकर 11.12% ही वोट मिले थे। इस तरह से 1991 की 12 सीटों के मुकाबले वह पांच गुना से ज्यादा सीटें जीती और उसे करीब 2% वोट भी ज्यादा मिले।
दूसरी बार
फिर 1996 में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। पार्टी 296 सीटों पर लड़ी और उसकी 67 सीटें कायम रहीं। लेकिन, बसपा का वोट शेयर बढ़कर 19.64% हो गया।
तीसरी बार
मायावती की पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों में सारे मतभेद भुलाकर मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा के साथ फिर से गठबंधन में चुनाव लड़ा। पार्टी 10 सीटें जीत गई और अखिलेश यादव की पार्टी को 5 सीटें ही मिलीं, जितनी 2014 में मिली थी। बीएसपी का वोट शेयर भी ज्यादा रहा।
गठबंधन के बिना क्या हुआ?
2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी अकेले दम पर लड़ी थी और एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद मायावती ने फिर से समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन तोड़ लिया। 2022 विधानसभा चुनावों में बसपा ने फिर से अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। सिर्फ 1 सीट जीती और 287 पर जमानतें जब्त हो गईं।
क्यों अकेले चुनाव लड़ना चाहती हैं मायावती?
इस तरह से साफ है कि गठबंधन में चुनाव लड़ने से बीएसपी को फायदा नहीं मिलने का मायावती के दावे में पूरी दम नहीं लग रहा है। फिर वह एनडीए या इंडिया गठबंधन के साथ चुनाव नहीं लड़ना चाहती हैं, इसकी क्या वजह हो सकती है? जानकारों की मानें तो उत्तर प्रदेश के मौजूदा राजनीतिक माहौल में बीएसपी सुप्रीमो गठबंधन की राजनीति के लिए मोल-भाव करने की ताकत नहीं जुटा पा रही हैं। क्योंकि, 2022 में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा है।
दरअसल, मायावती अपनी लाइन तय करने वाली नेता हैं। लेकिन, इस समय वह समाजवादी पार्टी के रहते न तो इंडिया गठबंधन में उतनी प्रभावी भूमिका निभा पाएंगी और न ही एनडीए में जाकर वह अपनी पार्टी की राजनीतिक हैसियत के अनुसार सीटों की मांग रख सकती हैं। हालांकि, अभी भी कांग्रेस और आरएलडी के साथ बीएसपी के तालमेल की चर्चाएं खत्म नहीं हुई हैं।












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