इलाहाबाद: दलबदलुओं ने बदल दी किस्मत, जिनका हुआ विरोध वही जीते
टिकट वितरण के समय भाजपा ने दलबदलुओं की तरजीह दी थी जिसका पार्टी के भीतर भारी विरोध हुआ था। पार्टी का यह दांंव सही साबित हुआ और सभी दलबदलू जीत गए।
इलाहाबाद। इलाहाबाद में दल बदल कर आये नेताओं ने भाजपा की किस्मत खोल दी। 5 दलबदलुओं को टिकट मिला, सभी ने जीत दर्ज की। दो लोग बाहर से आये उन्होंने भी चुनाव जीता। पिछली विधानसभा में खाता न खोलने वाली भाजपा के दलबदलुओं ने सारी सीटे भगवा झोली में जीतकर डाल दी। मजेदार बात यह है कि यहां वही प्रत्याशी जीते जिनका जमकर विरोध हुआ था । फाफामऊ से विक्रमाजीत मौर्य, फूलपुर से प्रवीण पटेल, शहर उत्तरी से हर्ष बाजपेई, शहर दक्षिणी से नंद गोपाल गुप्ता नंदी, बारा से डॉ० अजय भारतीय। जबकि राष्ट्रीय राजनीति से चुनाव लड़ने शहर पश्चिमी आये सिद्धार्थ नाथ सिंह, राजनैतिक कैरियर का आगाज करने वाली मेजा से नीलम करवरिया, सबने जीत हासिल की। इतनी बड़ी जीत के बाद पूर्व में केशव मौर्य के उपर उठे सवाल व दलबदलुओं को वरीयता देने पर निशाने पर रहे नेतृत्व को न जवाब देने की जरूरत पड़ रही है, न कोई सवाल करना चाहता है।

बड़ी रणनीति का थे हिस्सा
यूपी विधान सभा चुनाव के लिये भारतीय जनता पार्टी ने प्रत्याशियों की जब सूची जारी की थी तो इसमें इलाहाबाद में प्रत्याशियों के नाम चौकाने वाले थे। यहां पार्टी के दावेदारों की जगह दलबदलू नेताओं को टिकट दे दी गई। जिसमें सपा, बसपा और कांग्रेस से आये नेता, विधायक और मंत्री शामिल रहे। सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि नामांकन से दो दिन पहले ही भाजपा का दामन थामने वाले नंद गोपाल गुप्ता नंदी को भी टिकट दे दिया गया । जबकि एक साथ भाजपा ज्वॉइन करने वाले हर्ष व विक्रमजीत को भी प्रत्याशी बना दिया गया । लेकिन यह सब केन्द्रीय नेतृत्व की रणनीति का हिस्सा था। क्योंकि सभी दलबदलू नेताओं ने भाजपा के टिकट पर प्रतिद्वंद्वी को चित किया। इन सब ने चुनाव में जीत दर्ज कर अपनी व भाजपा की किस्मत बदलते हुये जीत की इबारत लिखी।

इलाहाबाद शहर उत्तरी - हर्षवर्धन बाजपेई
सपा से बसपा फिर भाजपा में आये हर्ष इलाहाबाद की शहर उत्तरी से कमल खिला चुके हैं। विरासत में मिली राजनीति में हर्ष के लिये यह चुनाव कद बढ़ाने वाला रहा। हर्ष बाजपेयी ने शहर उत्तरी से 89191 वोट के साथ कांग्रेस के दिग्गज नेता अनुग्रह नारायण सिंह को पटखनी दी । खास बात यह है कि अनुग्रह लगभग इतने ही वोट पाकर पिछले चुनाव में जीते थे और हर्ष ने बसपा की तरफ से दूसरी पोजिशन पर रहे थे। लेकिन इस बार इतने ही वोटों से अनुग्रह को धूल चटाकर हर्ष ने एक और इतिहास बनाया।
हर्ष को युवाओं से जुड़ाव व राजनैतिक परिवार का लाभ मिला। मालूम हो कि कांग्रेस सरकार में हर्ष की दादी राजेंद्री कुमारी वाजपेयी मंत्री बनीं, बाद में राज्यपाल भी बनाई गई । जबकि हर्ष की मां रंजना कुछ दिन पहले तक समाजवादी महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर थी। उनके पिता अशोक वाजपेयी भी कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे हैं और एक समय इनकी इलाहाबाद में तूती बोलती थी।

फाफामऊ - विक्रमाजीत मौर्य
बसपा सरकार में मंत्री रहे विक्रमाजीत बसपा छोड़कर सही समय भाजपा में चले आए थे। दर्जन की संख्या में ब्राह्मण दावेदारों के बीच भाजपा ने विक्रमाजीत मौर्य को फाफामऊ से टिकट दिया था । इसी विधानसभा से बसपा के टिकट पर विक्रमाजीत मौर्य ने चुनाव पहले भी जीता था और मायावती के मंत्रीमंडल मंडल में जगह बनाई थी और एक बार फिर जीत दर्ज कर असेंबली पहुंच गये हैं। मौर्य बिरादरी के वोट आसानी से बटोरने के साथ ब्राह्मणों को मनाने में विक्रमाजीत कामयाब रहे और 83239 वोटों के साथ मौजूदा सपा विधायक अंसार अहमद को पटखनी दी।

फूलपुर - प्रवीण पटेल
बसपा से विधायक रहे प्रवीण पटेल भी बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये । भाजपा ने टिकट दिया तो विरोध के बावजूद पटेल की तेज तर्रार छवि और मिलनसार स्वाभाव ने जनता के बीच पैठ बना ली। इलाहाबाद में यह सीट भाजपा के लिये क्लियर मानी जा रही थी। बीते विधानसभा चुनाव में प्रवीण को 64998 वोट मिले थे और यह सपा के सईद अहमद से हारे थे। लेकिन इस बार प्रवीण सिंह पटेल ने 93912 वोटों के साथ जीत हासिल की थी। यहां सपा के मंसूर आलम को हार का सामना करना पड़ा । प्रवीण पटेल ने अपने वोट बैंक में सेंध नहीं लगने दी और कमल खिला दिया ।

इलाहाबाद शहर पश्चिमी - सिद्धार्थ नाथ सिंह
सिद्धार्थ नाथ सिंह लोकल राजनीति में कभी चुनाव नहीं लड़े। अचानक से विधायकी के लिये पीएम ने इन्हें इलाहाबाद भेजा तो जमकर विरोध हुआ।
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव व प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे सिद्धार्थ नाथ पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाती हैं। साथ ही आन्ध्र प्रदेश व पश्चिम बंगाल के भी सह प्रभारी रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति से उतर कर चुनाव लड़ना बड़ा एक्सपेरिमेंट था। लेकिन सिद्धार्थ एक्सपेरिमेंट में खरे उतरे और भाजपा की परंपरागत शहर पश्चिमी सीट को वापस भाजपा के खाते में ले आये। सिद्धार्थ नाथ सिंह को 85518 वोट मिले और सपा की ऋचा सिंह व विधायक पूजा पाल को बड़े अंतर से हराया।

इलाहाबाद शहर दक्षिणी - नंद गोपाल गुप्ता नंदी
बसपा से कांग्रेस और अब भाजपा का दामन थामने वाले नंद गोपाल गुप्ता नंदी मंत्री रह चुके हैं। नामांकन से ठीक दो दिन पहले नंदी पत्नी मेयर अभिलाषा गुप्ता के साथ भाजपा में आये। केशव के टिकट देते ही भूचाल आ गया। नेताओ ने बगावत कर दी, पुतला दहन, नारेबाजी, प्रदर्शन सबकुछ हुआ। यहां तक की नंदी के भाई ने भी बसपा ज्वॉइन कर ली । लेकिन नंदी ने हार नहीं मानी और शहर दक्षिणी से सपा विधायक परवेज अहमद को हरा कर सरताज बन गये। नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने 92263 वोट के साथ जीत हासिल की ।

बारा - डॉ० अजय भारतीय
सपा छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले बारा विधायक अजय भारतीय ने सही समय पर पाला बदला और एक बार फिर से बारा के विधायक बन गये। एक बड़ा वोट बैंक और लोगों से अच्छा जुड़ाव का पूरा फायदा उठाते हुये डा अजय ने बारा में कमल खिला दिया । डॉ. अजय को बतौर बारा से भाजपा प्रत्याशी 79209 वोट मिले। जबकि सपा के अजय को 45156 व बसपा के अशोक कुमार को 37052 वोट से संतोष करना पड़ा ।

मेजा - नीलम करवरिया
भाजपा की सबसे आखिरी लिस्ट में नीलम को टिकट मिला तो अंदर ही अंदर बगावत व कलह शुरू हो गई । लेकिन करवरिया टाइटिल जुड़ा होने के कारण कोई भी खुल कर विरोध करने नहीं आया। नीलम का यह पहला चुनाव था, इससे पहले वह किसी दल में नही थी। भाजपा विधायक रहे उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया का भाजपा प्रत्याशी बनना आसान नहीं था। क्योंकि नीलम सियासी परिवार से जरूर थी लेकिन राजनीति से अंजान थी। उदयभान समेत करवरिया बंधु जेल में थे और भाजपा समेत राजनीति में करवरिया बंधुओ का वर्चस्व खत्म हो रहा था। लेकिन मेजा से भाजपा प्रत्याशी बनकर नीलम ने जीत की इबारत लिखी और 67807 के साथ पहले स्थान पर रही। जबकि दूसरे स्थान पर सपा के राम सेवक सिंह रहे।












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