यूपी चुनाव: मुबारकपुर में ‘तीन’ की लड़ाई, क्या पहली बार खिलेगा कमल ?

लखनऊ, 23 फरवरी। आजमगढ़ जिले की मुबारकपुर सीट कभी अंडरवर्ल्ड डॉन अबु सलेम की वजह से चर्चा में आयी थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में यह सीट अन्य कारणों से चर्चा में है। पहला कारण ये कि इस सीट पर एक अन्य अखिलेश यादव सपा से चुनाव लड़ रहे हैं। दो चुनाव हारने के बाद वे तीसरी बार मैदान में हैं। दूसरा कारण ये है कि मौजूदा विधायक गुड्डू जमाली, ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम से चुनाव लड़ रहे हैं।

bjp in azamgarh mubarakpur seat in uttar pradesh assembly election 2022

तीसरा कारण ये है कि इस मुस्लिम बहुल इस सीट पर तीन मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। बसपा से अब्दुल सलाम, एआइएमआइएम से गुड्डू जमाली और कांग्रेस से परवीन मंदे। इसकी वजह से यहां सपा और बसपा का चुनावी समीकरण बिगड़ गया है। मुबारकपुर सीट बसपा का गढ़ रही है। 1996 से 2017 तक इस सीट पर बसपा का कब्जा रहा है। क्या बसपा 2022 में जीत का सिलसिला बरकरार रख पाएगी ?

मुबारकपुर में ओवैसी का ऐसे हुआ प्रवेश

मुबारकपुर में ओवैसी का ऐसे हुआ प्रवेश

2017 मुबारकपुर से बसपा के शाह आलम ऊर्फ गुड्डू जमाली जीते थे। 2012 में भी वे यहां से जीते थे। उन्हें मायावती का करीबी नेता माना जाता था। लेकिन 2021 में जमाली ने बसपा छोड़ दी। उन्हें सपा से टिकट मिलने की उम्मीद थी। लेकिन सपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। 2017 में सपा के अखिलेश यादव दूसरे स्थान पर रहे थे। 2022 में अखिलेश को फिर टिकट मिला। विधायक होने के बाद भी सपा ने गुड्डू जमाली को उम्मीदवार नहीं बनाया। तब असदुद्दीन ओवैसी ने इस मौके को लपक लिया। वे मजबूत उम्मीदवार की तलाश में थे। उन्होंने गुड्डू जमाली को अपनी पार्टी से खड़ा कर दिया। सीटिंग विधायक के पार्टी छोड़ देने से बसपा को नया उम्मीदवार खड़ा करने में कोई समस्या नहीं हुई। उसने पहले ही अब्दुल सलाम को प्रत्याशी बनाने की घोषणा कर दी थी। इस सीट पर एआइमआइएम की इंट्री से सपा और बसपा का खेल बिगड़ता हुआ दिख रहा है। अगर ऐसा हुई तो भाजपा को फायदा मिल सकता है। वैसे इस सीट पर आज तक भाजपा जीती नहीं है। लेकिन तीन मुस्लिम उम्मीदवारों के खड़ा होने से अगर मुस्लिम मतों का बंटवारा हुआ तो भाजपा के अरविंद जायसवाल को फायदा मिल सकता है।

2017 में मुश्किल से जीते थे गुड्डू जमाली

2017 में मुश्किल से जीते थे गुड्डू जमाली

2017 में बसपा के गुड्डू जमाली महज 688 वोटों से जीते थे। उन्हें 70705 मत मिले थे और सपा के अखिलेश यादव को 70017 वोट मिले थे। यानी अखिलेश यादव ने जोरदार टक्कर दी थी। गुड्डू जमाली किस्मत से जीत पाये थे। तब उन्हें दलित और मुस्लिम समुदाय का समर्थन मिला था। मुस्लिम-दलित समीकरण के कारण ही बसपा ने 21 साल से इस सीट पर कब्जा बनाये रखा। लेकिन अब हालात बन गये हैं। गुड्डू जमाली एइएमआइएम से चुनाव लड़ रहे हैं। वे उत्तर प्रदेश के सबसे अमीर विधायक माने जाते हैं। उनके पास 118 करोड़ रुपये की सम्पत्ति है। ओवैसी की पार्टी से लड़ने के कारण उन्हें सिर्फ मुस्लिम समुदाय के वोट पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इस बात की कम ही संभावना है कि मुस्लिम समुदाय एक मुश्त वोट दे कर गुड्डू जमाली की किस्मत संवार दे। वह इस लिए क्यों कि अब्दुल सलाम और कांग्रेस की परवीन मंदे भी मुकाबले में हैं। परवीन मंदे के पति जावेद मंदे कांग्रेस के नेता हैं। वे क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। प्रियंका गांधी की महिला नीति ने परवीन मंदे को चुनावी मैदान में उतार दिया है। अब्दुल सलाम अनुभवी नेता हैं और मुबारकपुर की राजनीति में उनका प्रभाव रहा है। वे 1991 में जनता दल के टिकट पर यहां से चुनाव जीत चुके हैं। सपा भी मुस्लिम मतों पर दावा करती रही है। यानी इस मत के कई तलबगार हैं।

क्या भाजपा को फायदा हो सकता है ?

क्या भाजपा को फायदा हो सकता है ?

भाजपा इस सीट पर जीत के लिए तरसती रही है। 2017 के चुनाव में भाजपा उम्मीदवार लक्ष्मण मौर्य को करीब 44 हजार वोट मिले थे। वे तीसरे स्थान पर रहे थे। 2012 में भाजपा के रामदर्शन यादव को 37 हजार वोट मिले थे। वे भी तीसरे स्थान पर रहे थे। 2017 में भाजपा और विजेता के बीच करीब 26 हजार वोटों का अंतर था। 2012 में यह अंतर करीब 13 हजार का था। यानी 2022 में भाजपा को इस सीट पर बहुत जोर लगाना होगा। उसकी सारी उम्मीद मुस्लिम मतों के विभाजन पर टिकी है। इस बार अरविंद जायसवाल मुबारकपुर से चुनाव लड़ रहे हैं। वे पहले कांग्रेस में थे और 2012 में सगड़ी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं। उस चुनाव में उन्हें करीब 29 हजार वोट मिले थे और वे तीसरे स्थान पर रहे थे। 2014 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर आजमगढ़ से चुनाव लड़ा था। चुनाव हारने के बाद वे भाजपा में शामिल हो गये। अब मुबारकपुर सीट पर कांटे की लड़ाई है। जीत हार का अंतर बहुत कम रहने की संभावना है। यहां अंतिम चरण में 7 मार्च को चुनाव है। चूंकि अभी समय है इसलिए कोई छोटा सा मुद्दा भी परिदृश्य बदल सकता है।

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