अखिलेश की चूक की वजह से आजम-धर्मेंद्र का हुआ ये हश्र या अधूरी तैयारियों की वजह से हारी सपा ?
लखनऊ, 27 जून: उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा में समाजवादी पार्टी को 111 सीटें मिली थीं। चुनाव बीते महज तीन महीने ही हुए हैं लेकिन बीजेपी ने सपा को उसके गढ़ में ही पछाड़ने का काम किया है। उपचुनाव की तैयारियों में लापरवाही और अखिलेश की रणनीतिक चूक ससपा पर भारी पड़ गई। इससे सपा की छवि को काफी नुकसान पहुंचा है क्योंकि आजमगढ़ और रामपुर में सपा की हार का संदेश पूरे देश में गया है। अखिलेश की सबसे बड़ी चूक प्रचार में न निकलना और स्थानीय नेताओं पर हद से ज्यादा भरोसा करना रहा।

आधी अधूरी तैयारियों के साथ उपचुनाव में उतरी सपा
विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने सपा की तैयारयों पर काफी बारीकी से रखी थी। समय रहते उन्होंने ओम प्रकाश राजभर और जयंत चौधरी जैसे नेताओं से गठबंधन किया जिसका फायदा भी समाजवादी पार्टी को मिला था। विधानसभा के चुनावी नतीजों में सपा को पश्चिम और पूर्वांचल में अच्छा रिस्पॉस मिला और सीटें भी आईं थीं। लेकिन उपचुनाव में अखिलेश ने सधी हुई रणनीति पर काम नहीं किया और आधी अधूरी तैयारी के साथ सपा को मैदान में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसका खामियाजा सपा को भुगतना पड़ा और दोनों सीटों पर सपा की बुरी तरह से हार हुई है।

अखिलेश ने स्थानीय नेताओं पर हद से ज्यादा भरोसा किया
उपचुनाव में आधी अधूरी तैयारियों के साथ उतरे अखिलेश ने रही सही कसर उन्होंने स्थानीय नेताओं पर भरोसा करके पूरी कर दी। आजमगढ़ लोकसभा सीट पर तीन महीने पहले ही सपा को सभी पांचों विधानसभा सीटों पर जीत मिली थी लेकिन तीन महीने के बाद ही ऐसा क्या हुआ कि सारे समीकरण बदल गए और अखिलेश को हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह रामपुर में भी अखिलेश ने स्थानीय नेताओं पर ही भरोसा किया। आजम को ही अकेले प्रचार करना पड़ा जिसका ज्यादा असर नहीं पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों की माने किसी भी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को स्थानीय नेताओं की बजाए अपनी क्षमता पर भरोसा करना चाहिए था। स्थानीय नेताओं की अपनी लिमिट होती है।

रामपुर और आजमगढ़ में पार्टी का चुनाव प्रचार न करना
सपा की हार का सबसे बड़ा ठीकरा अखिलेश यादव पर ही फूट रहा है। विपक्ष के अलावा लोग भी इस बात को लेकर सवाल पूछ रहे हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद वो दोनों लोकसभा सीटों पर प्रचार के लिए क्यों नहीं निकले। क्या चुनाव जिताने की जिम्मेदारी अकेले आजम और धर्मेंद्र की ही थी या अखिलेश को भी राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते प्रचार के लिए जाना चाहिए था। यदि सारे समीकरण भी सपा के फेवर में थे तो भी अखिलेश यादव को प्रचार के लिए रामपुर और आजमगढ़ में जाना चाहिए था। इस स्तर पर अखिलेश से एक बड़ी चूक हुई जिसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा है।

आजम और धर्मेंद्र का पर कतरने की तो नहीं थी कोशिश ?
लोकसभा उपचुनाव में जिस तरह से रामपुर में आजम का तिलिस्म टूटा है उससे एक बड़ा सियासी संदेश गया है। लेकिन सूत्रों की माने तो इसके पीछे अखिलेश की एक सोची समझी रणनीति भी हो सकती है। सवाल ये उठता है कि क्या अखिलेश यादव आजम और धर्मेंद्र यादव का पर कतरना चाह रहे थे इसलिए चुनाव प्रचार में नहीं उतरे। जिस तरह से राज्यसभा और एमएलसी के चुनाव में अखिलेश को आजम के आगे झुकना पड़ा उससे अखिलेश खुश नहीं थे। अखिलेश ने आजम के राजनीतिक भविष्य का पता लगाने के लिए उन्हें अकेला छोड़ दिया। उसी तरह क्या वह धर्मेंद्र यादव को भी अलग थलग करना चाह रहे थे।
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