Lok sabha Election 2024: राजभर-बीजेपी गठबंधन के बाद अखिलेश के लिए कठिन हुई पूर्वांचल की राह
यूपी का सियासी रण जीतने के लिए बीजेपी ने अभी से अपने दांव पेंच चलने शुरू कर दिए हैं। बीजेपी की चालें अब अखिलेश यादव को परेशान करने लगी हैं।
Akhilesh Yadav And Om Prakash Rajbhar: देश में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) कुनबा तैयार होने लगा है। एक दिन पहले ही ओम प्रकाश राजभर और बीजेपी के बीच गठबंधन का ऐलान हुआ है। इस गठबंधन के बनने के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव की टेंशन बढ़ेगी क्योंकि अब उनको पूर्वांचल की लड़ाई अकेले ही लड़नी होगी।
पूर्वांचल में बीजेपी-राजभर बिगाड़ेंगे अखिलेश की गणित
बीजेपी-ओम प्रकाश राजभर के गठबंधन के ऐलान के बाद हालांकि अखिलेश यादव का अभी कोई बयान नहीं आया है लेकिन सपा के नेताओं का यह भी दावा है कि जिस तरह से चुनाव से पहले बीजेपी ने ऐसे दल का समर्थन हासिल करने की कोशिश की जो उसको गाली देता रहा है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीजेपी किस कदर अंदरखाने डरी हुई है और उसको खुद की क्षमता और सरकार के काम पर विश्वास नहीं रह गया है।

राजभर की कमी कैसे दूर करेंगे अखिलेश
एक साल पहले यूपी में 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने अपनी सधी हुई रणनीति के तहत राजभर केा अपने साथ लाने में सफलता हासिल की थी। इसका फायदा भी अखिलेश को हुआ था और खासतौर से पूर्वांचल में। राजभर के गठबंधन की वजह से ही बीजेपी गाजीपुर, आजमगढ़ और अंबेडकर नगर जैसे जिलों में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।
अखिलेश के पास नहीं पूर्वांचल का बड़ा चेहरा
विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश ने ओम प्रकाश राजभर के साथ कई बार मंच साझा किया था। पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर रोड शो हो या मऊ में 27 अक्टूबर को हुई ऐतिहासिक रैली हो। बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में अखिलेश ने राजभर को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। अब वही हथियार बीजेपी के पाले में चला गया। ऐसे समय में अखिलेश अब पूर्वांचल के लिए नई रणनीति बनाने में जुटेंगे।
सपा के वरिष्ठ नेता प्रो सुधीर पंवार कहते हैं कि,
मोदी सरकार के 9 साल और योगी सरकार के 6 साल के कामकाज के बाद भी यदि बीजेपी को चुनाव जीतने के लिए दूसरे की मदद लेनी पड़ रही है तो इसका मतलब है कि जमीन पर जो हकीकत है उससे बीजेपी डरी हुई है। वह भी ऐसे व्यक्ति का सपोर्ट ले रही है तो मोदी सरकार की लगातार आलोचना करता रहा हो यह बीजेपी के अंदर बने हुए डर की कहानी को बयां कर रहा है।
पूर्वांचल की सियासत में चौतफा घिर रहे अखिलेश
वहीं राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो पूर्वांचल की सियासी बिसात पर अखिलेश चौतरफा घिरते नजर आ रहे हैं। राजभर और दारा सिंह चौहान जैसे दो दिग्गज नेताओं का साथ छोड़ना उनको भारी पड़ सकता है। इससे अखिलेश के पीडीए यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक अभियान को भी झटका लगा है। यूं कहें कि पिछड़ा वर्ग को साधने के लिए अब अखिलेश के पास केवल स्वामी प्रसाद मौर्य के रूप में ही बड़ा नाम मौजूद रह गया है।
पिछले दो चुनावों से अच्छा प्रदर्शन कर रही बीजेपी
पिछले लोकसभा चुनावों के परिणामों पर गौर करें तो 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यूपी में 80 में से 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि सहयोगी अपना दल को दो सीटों पर जीत मिली थी जिसकी वजह से यह आंकड़ा 73 तक पहुंच गया था। इसी तरह 2019 में बीजेपी ने यूपी में सहयोगी दलों को मिलाकर 64 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में बसपा-सपा के बीच गठबंधना हुआ था। बसपा को दस और सपा को पांच सीटें मिली थीं












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