UP MLC चुनाव में सपा को शून्य मिलने की 5 वजहें
लखनऊ, 12 अप्रैल: यूपी में एमएलसी चुनाव परिणाम ने जहां विधानसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत की तस्दीक कर दी है, वहीं समाजवादी पार्टी की हार की वजहों को और पुख्ता भी कर दिया है। राज्य में अभी विधान परिषद की कुल 36 सीटों के लिए चुनाव हुए हैं। इनमें से 9 सीटों पर सत्ताधारी भाजपा के प्रत्याशी पहले ही निर्विरोध चुन लिए गए थे। लेकिन, 9 अप्रैल को जो वोटिंग हुई थी और मंगलवार को जिन 27 सीटों का परिणाम आया है, उसमें भी 24 सीटें जीतकर बीजेपी कुल 33 सीटों पर विजयी रही है। प्रतापगढ़ की सीट पर राजा भैया की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक का उम्मीदवार जीता है और बाकी दो सीटें भी निर्दलीय उम्मीदवारों को मिली हैं, जिनकी स्थानीय स्तर पर अलग-अलग वजहों से अपनी शख्सियतें है। बाकी समाजवादी पार्टी, बसपा और कांग्रेस खाता खोलने के लिए भी तरस गई है। लेकिन,सपा की हार शर्मनाक है, क्योंकि विधानसभा में उसने 111 सीटें जीती थीं और उसकी गठबंधन को 126 सीटों पर सफलता मिली थी। विधानसभा चुनाव के नतीजे 10 मार्च को आए थे और 12 अप्रैल को एमएलसी चुनाव का परिणाम आया है। आइए जानते हैं कि एक महीने और दो दिनों में ऐसा क्या हो गया कि यूपी के मुख्य विपक्षी दल के सियासी किस्मत में जीरो बटा सन्नाटा आया है।

सपा के अंदर की गुटबाजी
समाजवादी पार्टी यूपी के एमएलसी चुनाव में जिस तरह से शून्य पर आउट हुई है, उसका सबसे बड़ा कारण आजमगढ़ की सीट के नतीजों में देखा जा सकता है। विधानसभा में यहां सपा 10 की 10 सीटें जीत गई थी। लेकिन, विधान परिषद चुनाव में यहां समाजवादी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार राकेश यादव न सिर्फ तीसरे नंबर पर रहे, बल्कि उन्हें सिर्फ 356 वोट हासिल हुए और वह जमानत भी नहीं बचा सके। यहां पर भाजपा ने फूलपुर पवई से सपा के सीटिंग और बाहुबली विधायक रमाकांत यादव के बेटे अरुण कांत यादव को उतारा था। वह 1262 वोट लेकर दूसरे नंबर पर रहे और जीत मिली विक्रांत सिंह रिशु को जिन्हें 4075 आए। चुनाव वाले दिन ही सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें सपा विधायक बीजेपी नेताओं के साथ दिखे थे।

गठबंधन में दरार की सुगबुगाहट
विधानसभा चुनावों के दौरान विपक्षी गठबंधनों को सपा मुखिया अखिलेश यादव के नेतृत्व को लेकर काफी उम्मीदें थीं। लेकिन, नतीजों में सत्ताधारी गठबंधन ने जिस अंदाज में सफलता हासिल की उसने समाजवादी पार्टी के सहयोगी दलों को भी भविष्य के लिए अपने विकल्प खुले रखने के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया। क्योंकि, चुनाव के बाद से ही सबसे बड़ी सहयोगी की ओर से बैठक में नहीं बुलाने के नाम पर अपना दल (के) और महान दल जैसी पार्टियों की नाराजगी की खबरें आने लगीं। कहीं ना कहीं इससे समाजवादी पार्टी के समर्थकों का हौसला भी कम हुआ और सत्ताधारी बीजेपी को इसका फायदा मिला है।

परिवार में फिर से उभरे मतभेद
विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद अखिलेश यादव के चाचा और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के नेता शिवपाल यादव ने सपा की बैठक से दूर रखे जाने के बाद अपना अलग रुख अख्तियार कर लिया है। उनकी ओर से जो संकेत दिया जा रहा है, उससे कयास लगाए जा रहे हैं कि वह अपना बाकी का राजनीतिक जीवन बीजेपी के साथ जुड़कर आराम से काटने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन, इससे अखिलेश यादव के नेतृत्व क्षमता पर सवालिया निशान लगा है। आजमगढ़ में जो कुछ हुआ, ये फैक्टर भी बहुत बड़ा कारण माना जा रहा है।

आजम खान के सहयोगी का बयान
सपा नेतृत्व की साख पर बट्टा लगाने का जो काम दल के वरिष्ठ नेता आजम खान के एक सहयोगी ने किया है, उतना किसी ने नहीं किया है। आजम के चहेते और मीडिया सलाहकार फसाहत अली खान ने अखिलेश यादव को मुसलमानों के सहयोग को लेकर इतनी बातें कह दी हैं कि इससे उनके भविष्य के सियासी करियर में भी परेशानी पैदा हो सकती है। फसाहत ने कहा है कि अब तो उन्हें भी ऐसा लगता है कि अखिलेश को मुसलमानों के कपड़ों से बू आती है और वह सिर्फ उसका इस्तेमाल करना जानते हैं। यही नहीं अपने गैर-जिम्मेदाराना बयान के लिए कुख्यात पार्टी सांसद शफीकुर्रहमान बर्क भी आरोप लगा चुके हैं कि सपा अध्यक्ष ने मुसलमानों के लिए पर्याप्त काम नहीं किए।

सपा के प्रति आकर्षण में कमी
इन सभी वजहों से समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के समर्थकों का पार्टी के प्रति आकर्षण कम हुआ है। पिछले चुनावों में उन्होंने सपा को जिस अभी नहीं तो कभी नहीं वाले अंदाज में समर्थन दिया था, वो हालात अब बदल चुके हैं। सबसे बड़ी बात कि एमएलसी चुनावों में अक्सर सत्ताधारी दल ही हावी होते रहे हैं। यही वजह है कि आजमगढ़ से जीतने वाले निर्दलीय ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ में अपना भरोसा जताकर अपना रुख साफ कर दिया है।
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