7 साल में 153 नेताओं ने छोड़ी BSP: मायावती के वो ट्रंप कार्ड कहां हैं जिन्होंने बनवाई थी उनकी सरकार
लखनऊ, 12 सितंबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बसपा की मुखिया मायावती ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। बसपा का दावा है कि वह इस बार 2007 के करिश्मे को दोहराते हुए यूपी में अपने दम पर सरकार बनाएगी। लेकिन मायावती के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। मायावती के साथ बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्रा के अलावा और कोई बड़ा नेता मौजूद नहीं है वहीं दूसरी तरफ पिछले सात सालों में छोटे-बडे़ नेताओं को मिलाकर 150 से अधिक नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं उसमें भी खास यह है कि 2007 की जीत में जिन पिछड़े नेताओं ने अहम भूमिका निभाई थी वो आज मायावती का साथ छोड़ चुके हैं।

राम अचल राजभर, लालजी वर्मा
बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने अपने दो दिग्गज नेताओं पर सख्त कार्रवाई की है। विधानमंडल दल के नेता लालजी वर्मा (Lalji Verma) और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। पंचायत चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने को इसकी वजह बताया गया है। वर्मा और राजभर का पिछड़े वर्ग में बड़ा जनाधार माना जाता है। आइए समझते हैं इन दो नेताओं की विदाई पार्टी के लिए कितना बड़ा झटका है। साथ ही सियासत पर क्या असर पड़ सकता है।
2017 की प्रचंड लहर में भी बचाई थी सीट
राजभर और वर्मा दोनों ही मायावती के काफी करीबी थे। वर्मा अंबेडकरनगर के कटेहरी और राजभर अकबरपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। इनका निष्कासन लगातार कमजोर हो रही पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की लहर के बावजूद दोनों अपनी-अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे थे। दोनों ही कांशीराम के जमाने से बसपा से जुड़े थे। राजभर 1993 में पहली बार बसपा के टिकट पर विधायक बने। तब से उनकी जीत का सिलसिला जारी है। वर्मा 1986 में पहली बार एमएलसी बनाए गए। इसके बाद उन्होंने 1991, 1996, 2002, 2007 और 2017 का विधानसभा चुनाव भी जीता।

दारा सिंह चौहान एवं नसीमुद्दीन सिद्दीकी
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री और पूर्व सांसद दारा सिंह चौहान कभी बसपा के सच्चे सिपाही हुआ करते थे। मायावती के खास माने जाने वाले दारा सिंह को मायावती ने अनुशासनहीनता के आरोप में निकाल दिया था। बाद में चौहान ने बीजेपी का दामन थाम लिया। अब बीजेपी ने उनको कैबिनेट में जगह दी है और पिछले चार सालों से वह वन मंत्री बने हुए हैं। दारा सिंह चौहान दो बार राज्य सभा के सदस्य रहे और एक बार घोषी लोकसभा के सदस्य भी चुने गए थे।
इसके अलावा बसपा के कद्दावर नेताओं में शामिल रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी दारा सिंह की तरह ही मायावती के खास हुआ करते थे। मायावती ने मुस्लिम चेहरे के तौर पर नसीमुद्दीन का नाम आगे किया था। बसपा सरकार में मंत्री रहे नसीमुद्दीन पर भी पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगा था जिसके बाद मायावती ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं लगाई। बसपा से अलग होने के बाद नसीमुद्दीन ने कांग्रेस का दामन थाम लिया आज वो कांग्रेस के चुनावी सेल के अध्यक्ष बनाए गए हैं।

बाबू सिंह कुशवाहा और स्वामी प्रसाद मौर्य
वर्ष 2007 में जब मायावती की सरकार बनी थी तब बाबू सिंह कुशवाहा को कैबिनेट मंत्री बनाया था। वह मायावती के बेहद करीबियों में शामिल थे। लेकिन आरोप है कि मायावती शासनकाल के दौरान 2007 से 2012 के बीच लखनऊ और नोएडा में हुए कथित स्मारक घोटाले में बाबू सिंह कुशवाहा शामिल थे। इसकी जांच लोकायुक्त ने भी की थी और 1400 करोड़ रुपये के घोटाले का अनुमान लगाया था। उस समय बाबू सिंह कुशवाहा खनिज एवं भूतत्व मंत्री थे जबकि नसीमुद्दीन सिद्दीकी लोक निर्माण विभाग के मंत्री थे। हालांकि दोनों मंत्रियों के खिलाफ यह जांच चल रही है।
कुशवाहा के अलावा स्वामी प्रसाद मौर्य भी मायावती के सबसे करीबियों में शामिल थे। लेकिन मायावती जब सत्ता से बाहर हुईं तो स्वामी प्रसाद ने भी उनका साथ छोड़ दिया और भाजपा का दामन थाम लिया था। स्वामी प्रसाद ने मायावती पर काफी गंभीर आरोप लगाए थे। बाद में 2017 में भाजपा की सरकार बनी तो स्वामी प्रसाद को कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी दी गई।












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