Fifa World Cup : अफ्रीका से ही ‘फुटबॉल पावर’ बना यूरोप, अब कैमरून मूल के एमबाप्पे चमका रहे फ्रांस को

Fifa World Cup 2022: 2022 के विश्वकप में भी फ्रांस की 26 सदस्यीय टीम में 16 खिलाड़ी अफ्रीकी मूल के हैं। इससे अफ्रीकी खिलाड़ियों क्षमता और य़ोग्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

Fifa World Cup 2022

Fifa World Cup 2022: पेले को फुटबॉल का भगवान कहा जाता है। इस महानतम खिलाड़ी ने 1977 में कहा था, सन 2000 के पहले कोई अफ्रीकी देश जरूर विश्वकप जीतेगा। पेले की यह भविष्यवाणी सच तो नहीं हुई लेकिन 22 साल बाद वह सच के नजदीक पहुंच गयी। 2022 के फुटबॉल विश्वकप प्रतियोगिता में मोरक्को का सेमीफाइनल में पहुंचना एक बहुत बड़ी घटना है। अफ्रीकी देशों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। लेकिन कई कारणों से वहां फुटबॉल का प्रोफेशनल ढांचा खड़ा नहीं हो पाया।

अफ्रीका के अधिकतर देश गरीबी और तानाशाही से त्रस्त हैं। वहां ऐसे साधनसम्पन्न फुटबॉल क्लब नहीं हैं जो खिलाड़ियों को आधुनिक तकनीक से प्रशिक्षित कर सकें। सबसे बड़ी बात ये कि उनके पास पैसा भी नहीं है। पैसा कमाने के लिए छोड़ देते हैं अफ्रीका मोरक्को हो या जिम्बाब्वे, यहां एक अच्छे फुटबॉलर को महीने में करीब 7 हजार पाउंड का वेतन मिलता है। जब कि औसतन यूरोपीय लीग में एक फुटबॉलर को करीब 2 लाख 50 हजार पाउंड का वेतन मिलता है। यानी यूरोप की तुलना में अफ्रीकी फुटबॉलरों का वेतन नहीं के बराबर है। दोनों के बीच जामीन आसमान का फर्क है।

इसलिए जैसे ही कोई अफ्रीकी फुटबॉलर अपने देश में नाम कमाता है वह पैसों के लिए यूरोपीय क्लबों से खेलने लगता है। 'फुटबॉल बेंचमार्क' के मुताबिक, अभी अफ्रीका के 10 देशों के कुल 500 खिलाड़ी यूरोप के 11 प्रमुख फुटबॉल लीग से अनुबंधित हैं। सबसे अधिक सेनेगल के 62 खिलाड़ी यूरोपीय लीग में खेलते हैं। मोरक्को के 55, नाइजिरिया के 54, आइवरी कोस्ट के 50, घाना के 45, अल्जीरिया के 32, माली के 32, कैमरून के 28, डीआर कांगो के 23 और गिनी के 13 फुटबॉल खिलाड़ी यूरोपीय लीग में खेलते हैं। फ्रांस की 26 सदस्यीय टीम में 16 अफ्रीकी मूल के फ्रांस ने जब 2018 में विश्वकप जीता था तब उसकी टीम के 23 खिलाड़ियों में से 14 अफ्रीकी मूल के थे।

2022 के विश्वकप में भी फ्रांस की 26 सदस्यीय टीम में 16 खिलाड़ी अफ्रीकी मूल के हैं। इससे अफ्रीकी खिलाड़ियों क्षमता और य़ोग्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अफ्रीकी मूल के खिलाड़ियों की वजह से यूरोपीय देश तो मजबूत होते गये लेकिन अफ्रीका का कोई देश विश्व स्तर पर अपना सिक्का नहीं जमा सका। मोरक्को से पहले तो कोई देश विश्वकप के सेमीफाइनल में भी नहीं पहुंचा था। फीफा के नियमों में संसोधन के चलते अफ्रीकी देशों के खिलाड़ियों के लिए यूरोपीय देशों की तरफ से खेलना आसान हो गया है। यूरोपीय लीग में खेलने के कारण अफ्रीकी खिलाड़ी संबंधित देश की नागरिकता ले लेते हैं।

इसकी वजह से उनके पास दो नागरिकता हो जाती है। अपने देश की और यूरोपीय देश की भी। वे या तो अपने अफ्रीकी देश से खेल सकते हैं या फिर नागरिकता वाले यूरोपीय देश से। यूरोप में क्यों खेलते हैं अफ्रीकी मूल के खिलाड़ी ? भूमध्य सागर जलमार्ग के कारण यूरोप और अफ्रीका बिल्कुल नजदीक हो जाते हैं। व्यापारिक और सामरिक कारणों से यूरोप के स्पेन, फ्रांस, पुर्तगाल, ब्रिटेन, बेल्जियम, जर्मनी और इटली जैसे देशों ने अफ्रीका महादेश के अधिकतर भूभाग को उपनिवेश बना लिया था। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इनको आजादी मिली तो इनका यूरोपीय देशों से संबंध बना रहा।

युद्ध से तबाह यूरोपीय देशों को पुनर्निर्माण के लिए सस्ते मजदूर चाहिए थे। इसलिए वे मोरक्को, ट्यूनिशिया, सेनेगल, लीबिया, अल्जीरिया जैसे देशों से मजदूर मंगाने लगे। इसके कारण स्पेन, फ्रांस, बेल्जियम, पुर्तगाल और अन्य यूरोपीय देशों में अफ्रीकी मूल के लोगों की एक बड़ी आबादी बस गयी। यूरोप में रहने वाले अफ्रीकी मूल के लोग फुटबॉल को अपने भविष्य निर्माण का सबसे बड़ा जरिया मानते हैं क्यों कि इसमें बेहिसाब दौलत है। इसलिए फ्रांस, इंग्लैंड, स्पेन जैसी टीमों में आज अफ्रीकी मूल के खिलाड़ी खेल रहे हैं।

टैलैंट हंट अभियान इंगलिश प्रीमियर लीग, ला-लीगा, बुंजेसलीगा, लीग-1 यूरोप की प्रमुख प्रमुख फुटबॉल लीग है। इन लीग में शामिल प्रमुख क्लब के प्रबंधक अफ्रीकी देशों में टैलैंट हंट अभियान चालते हैं। क्लबों के प्रतिनिधि अफ्रीकी दशों में घूम घूम कर उभरते हुए प्रतिभावान खिलाड़ियों की पहचान करते हैं। फिर इन्हें बचपन में ही क्लब से जोड़ कर प्रशिक्षण दिया जाता है। माता-पिता भी इस मौके को गरीबी से बाहर निकालने का रास्ता मानते हैं। बाद में इन बच्चों को संबंधित यूरोपीय देश की नागरिकता भी मिल जाती है।

विश्वकप में यूरोपीय देशों से खेलने वाले अफ्रीकी मूल के खिलाड़ी फ्रांस आज जिस किलियन एमबाप्पे के दम पर विश्वकप जीतने का सपना देख रहा है, उनके पिता कैमरून के रहने वाले थे। यानी कैमरून से संबंध रखने वाले खिलाड़ी एमबाप्पे फ्रांस को एक बार विश्वविजेता बना चुका है। दूसरी बार उन्होंने फिर फ्रांस को फाइनल में पहुंचा दिया। इसी तरह इंग्लैंड की तरफ से धूम मचाने वाले फॉरवर्ड बुकायो साका के माता-पिता अफ्रीकी देश नाइजीरिया के रहने वाले थे।

लोकतांत्रिक गणतंत्र कांगो से संबंध रखने वाले रोमेलू लोकाकू बेल्जियम के लिए खेल रहे हैं। जर्मनी के खिलाड़ी एंटोनियो रुडिगर अफ्रीकी देश सियेरा लियोन से संबंध रखते हैं। स्विटरजरलैंड के ब्रील इम्बेलो कैमरून मूल के हैं। नीदरलैंड के मेम्फिस डीपे के पिता घाना के रहने वाले थे। पुर्तगाल के मिडफील्डर विलियम कारवाल्हो का जन्म अफ्रीका के अंगोला में हुआ था। ऐसे खिलाड़ियों फेहरिस्त बहुत लंबी है।

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